पवन कुमार ‘ज्योतिषाचार्य
वेद में अशनि शब्द आया है। अशनि का अर्थ है विद्युत् इसे वज्र भी कहते हैं। इसकी गति अचिंत्य है, अत्यन्त तीव्र। शनैः शनैः (धीरे-धीरे) जो चलता है, वह शनिश्चर है। संक्षेप से शनि है। जो धीरे-धीरे नहीं चलता वह अशनि है। नवग्रहों की श्रेणी में सब से कम गति वाला ग्रह होने से इस का नाम शनि पड़ा है।
यह सूर्य से बहुत दूर है। ढाई वर्ष में एक राशि को पार करता है। पूरा राशि चक्र पार करने में इसे लगभग ३० वर्ष का समय लगता है.
व्रत उपष्टिशत् योजनलक्षद्वयात् प्रतीयमानः शनैश्चर:
एकैकस्मिन् राशौ त्रिंशन् मासान् विलम्बमानः सर्वेनेवानुपर्येति तावद्भिरनुवत्सरैः प्रायेण हि सर्वेषामशान्तिकरः।
~ श्रीमद्भागवत (५।२३।१६)
बृहस्ति से दो लोख योजन कर शनैश्चर दिखायी देते हैं ये तीस-तीस महीने तक एक-एक राशि में रहते हैं। अतः इन्हें सब राशियों को पार करने में तीस वर्ष लग जाते हैं। ये प्रायः सभी के लिये अशांति करने वाले हैं।
शनि के पर्यायछापात्मज, पंगु, यम, अर्कपुत्र, कोण, असित, सौरि, नील क्रूर, कुशांग, कपिलाक्ष, दीर्घ, तरणितनय, छायासून, आर्कि, मन्द।
छायात्मज अर्थात् छाया का पुत्र इस संबंध में एक आख्यान प्रस्तुत है। कश्यप तनय विवस्वान् को त्वष्टा तनया संज्ञा देवी भार्या के रूप में मिली। विवस्वान (सूर्य) के तीव्र ताप तेज दीप्ति से संज्ञा अप्रसन्न रहती थी। सूर्य के निकट रहने से संज्ञा की काया संतप्त होती थी। संज्ञा के गर्भ से सूर्य के द्वारा तीन सन्तानों का जन्म हुआ- २ प्रजापति तथा १ कन्या। उनमें से एक प्रजापति वैवस्वत मनु तथा दूसरे प्रजापति श्राद्धदेव यम थे।
कन्या का नाम यमुना हुआ जब सूर्य का तेजस्वी रूप संज्ञा के लिये असह्य हो गया तो उसने अपने हो समान एक स्त्री को अपनी छाया से रच दिया। यह मायामयी स्त्री संज्ञा के तद्रूप थी। इस का नाम छाया हुआ। सूर्य की सेवा में छाया को छोड़ कर संज्ञा अपने पिता त्वष्टा के पास चली गई। त्वष्टा ने उसे अपने पास नहीं रखा तो वह अश्विनी का रूप धर कर विचरने लगी। उधर छाया, संज्ञा की तीनों संतानों के साथ रहती हुई सूर्य की भार्या के रूप में रहने लगी। इस दूसरी संज्ञा को संज्ञा समझते हुए सूर्य भगवान् ने उसके गर्भ से दो पुत्र उत्पन्न किया।
पहलापुत्र अपने बड़े भाई वैवस्वत मनु के समान वर्ण शक्ति वाला होने से सावर्ण मनु कहलाया। उस छाया से जो दूसरा पुत्र हुआ वह शनि के नाम से जाना गया।
मनुरेवाभवन्नाम्ना सावर्ण इति चोच्यते।
द्वितीयो यः सुतस्तस्याः स विज्ञेयः शनैश्चरः।
~महाभारत (८।२०)
आगे चल कर सूर्य को यह तथ्य मालूम हुआ तो वे संज्ञा को पाने के लिये अपने श्वसुर त्वष्टा के पास गये। त्वष्टा ने सूर्य के तेज को कम करने तथा सुरूष देने हेतु उनका बहुत सा तेज निकाल कर सुदर्शन चक्र रचा। जिसे भगवान् धारण कर चक्रपाणि कहे जाते हैं। पहले की अपेक्षा सूर्य का रूप सौम्य एव आकर्षक हो गया।
इसके बाद सूर्य ने अश्विनी बन कर चरती हुई संज्ञा के गर्भ में वीर्य का आधान कर दो (जुड़वाँ) संतानों को जन्माया। ये अश्विनी कुमार नासत्य एवं दस्त नाम से जाने जाते हैं। ये देवताओं के वैद्य हैं।
यह आख्यान ज्ञान की गुत्थी है। इसे कोई-कोई ही समझता है। संज्ञा का नाम संध्या एवं सुरेणु भी है। वास्तविक संज्ञा से तीन संतानें, संज्ञा की छाया से दो संतानें तथा अश्विनी संज्ञा से भी दो संताने अर्थात् ३+२+२ = ७ सात संतानों के पिता होने से सूर्य को सप्ति कहते हैं.
सप्तसप्तिर्मरीचिमान्। भ्राता शनैश्वरश्वास्य ग्रहत्वमुपलब्धवान्। नसत्यी यी समाख्याती स्ववैद्यौ तौ बभूवतुः।
शनि की प्रतिष्ठापना ग्रह के रूप में हुई। द्वितीय मनु (आठवें मनु) के भ्राता शनिश्चर महाराज हैं। ये लोक पूज्य ग्रह हैं। वर्तमान में सातवें मनु स्वायम्भुव का शासन है।
द्वितीयो यः सुतस्तस्य मनोभ्रता शनैश्वरः । ग्रहत्वं स च लेभे वै सर्वलोकाभिपूज:I
छाया का रंग होता है-काला। संज्ञा कहते हैं, ज्ञान को ज्ञान का रंग है- शुक्ल। दिन को कहते हैं-संज्ञा। रात को कहते हैं। छाया सूर्यास्त के बाद संध्याकाल प्रारंभ होता है। यही रात्रि वा छाया का शैशव रूप है। छाया = रात = अप्रकाश = अज्ञान अश्विनी को भी संध्या कहते हैं।
अश्विनी संधि नक्षत्र है- मेषराशि का प्रारंभ एवं मीन राशि का अन्त। संधि (गण्ड) नक्षत्र होने से अश्विनी की संज्ञा संध्या है। यहाँ सूर्य (काल) की पत्नी (काली) के तीन रूप है संज्ञा दिन प्रकाश ज्ञान, छाया रात अन्धकार अज्ञान, सन्ध्या अश्विनी दिन-रात (ज्ञान- अज्ञान) से परे की स्थिति।
जब छाया अज्ञान है तो उससे उत्पन्न होने वाला पुत्र भी अज्ञान रूप हुआ। छाया कृष्णकाय है, शनि वर्ण हुआ। वास्तव में उदयास्त सूर्य का गोला गहरे लाल वर्ण का दिखता है। गहरे रक्त वर्ण में कृष्णता होती है। पाप का रंग काला माना गया है। सूर्य अल्पपापी है किन्तु उसका पुत्र शनि अतिपापी है। क्योंकि शनि सुनील वर्ण है। सूर्य की पत्नी संज्ञा सात रूपों में वर्तमान है- दिवा, उषा, निशा, छाया, संध्या, सुरेणु और अश्विनी (नक्षत्र विशेष) इसलिये भी सूर्य को ‘सप्तसप्तिः’ कहते हैं। शनैः शनैः चरति, शनैश्चरः।
कृष्ण भी शनि को मार्तण्ड कहते हैं। सूर्य का नाम मार्तण्ड होने से ऐसा है। इससे सम्बन्धित एक कथा है। कश्यप की पत्नी अदिति गर्भवती थीं। बुध ने उनसे भिक्षा माँगा। गर्भ के कारण वे शीघ्रता से चल कर भिक्षा न दे सर्कों। तब बुध ने अदिति को शाप दिया कि तेरा गर्भ मृत हो जाय। यह सुन कर अदिति व्याकुल हो गई।
कश्यप ने अपनी शक्ति से बुध के शाप का निवारण कर दिया। कश्यप ने कहा यह मरा नहीं है, अण्ड (गर्भ) में स्थित है। तब से सूर्य का नाम मार्तण्ड हुआ।
न खल्वयं मृतोऽण्डस्थ इति स्नेहादभाषत। अज्ञानात् कश्यपस्तस्यान्मार्तण्ड इति चोच्यते॥
मार्तण्डस्य सुतः मार्तण्डिः शनिः।
मार्तण्ड का मृत अंश शनि में अवस्थित है। शनि इसी मृतांश से प्राणियों को मारता (कष्ट देता है। यह दुःखरूप है। इसलिये, यह मारक है। मारकत्व इसका गुण है। यह उसे बुध के शाप के कारण है। अतः बुध उसका मित्र है।
शनि आयु का कारक है। महामारक है। स्नायु संस्थान पर इसका प्रभाव रहता है। आलसी, काना, पिंगल नयन, अंधी देह पर बड़े मोठे निकले दाँत कड़े रोम, उभरी शिराएँ, लंगड़ा, लूला, निम्न, चिपटी आँखें, दुबला शरीर, स्थूल भद्दे नख, बेवाई फटा पैर, झुर्रीदार फटो त्वचा, कृश एंव कृच्छ्र अंगांग, अमांसलता दोर्घता अस्थिमयता से शनि के प्रभाव का बोध होता है।
शनि स्थविर मह है। दयारहित, मूर्ख, धूर्त, ढंग, चोर, उठाईगीर, लुच्चा, लफंगा, अवारा, मुगुलखोर, झगडालु हेराफेरी करने वाला कृतघ्नी विश्वासघाती दीर्घसूत्री अपवादी दृष्ट बुद्धि, कुटिल छिद्रान्वेषी, स्वार्थी, तृष्णालु, ईर्ष्यालु, समाज विरोधी, बन्धु विरोधी, नौच कर्मी, व्यक्ति शनि प्रधान होते हैं।
शनि वृत्ति कारक है। उद्योग धंधे में लगाता है, शारीरिक श्रम वाले कार्यों में लगाता है। जन आन्दोलनों में अग्रणी भूमिका निभाता है। मर्मभेदी बात कहना, असंतोष व्यक्त करना, मनमाना करना, आत्मशंसा चाहना, अपवाद फैलाना, हाथ की सफाई दिखाना, दास वृत्ति से उपजीविका चलाना, द्रव्यापहरण करना, हिंसा पर उतारू हो जाना और अविचारपूर्वक कर्म में उद्यत होना- शनि की विशेषताएँ हैं। जीर्ण घर वा असुन्दर निवास, कृषि कर्म, भार वा बोझा ढोना इस की नियति है।
शनि अशुभ ग्रह है। परपोड़ा, पराक्रम, परदेश वास, परसेवा में इस की अभिरुचि रहती है। यह ठंडा ग्रह है, क्योंकि सूर्य से बहुत दूर है। इसलिये शुभ प्रभाव होने पर शनि प्रधान व्यक्ति उच्च कोटि के विचारक एवं तत्ववेत्ता होते हैं।
शनि और सूर्य दोनों परस्पर पुत्र एवं पिता हैं। दोनों का आमने सामने होना अथवा दोनों का एक साथ होना अशुभ प्रभाव उत्पन्न करता है।
तुला में सूर्य-शनि एक साथ हैं तो सूर्य एवं शनि (पिता एवं पुत्र) में से एक उच्च का होगा तो दूसरा नीच का होगा।
शनि के साथ सूर्य + मंगल का योग सदा घातक है। इसमें मृत्यु, अपघात, भयंकर रोग, बन्धन, भारी संकट, अनपेक्षित विपत्ति तथा आयु के अंत के समय का नैराश्यपूर्ण होना, निश्चित है। शनि एवं चन्द्र को युति कम घातक है। शनि द्वारा रोहिणी नक्षत्र का पार करना शकट भेदन कहा जाता है। क्यों कि रोहिणी नक्षत्र का आकार शकट जैसा है। यह शकट भेदन लोक संहारक होता है। बुध, गुरु वा शुक्र के साथ शनि हो तो अच्छा फल देता है। परन्तु मन्द गति होने से कंजूसी से (अल्प) फल देता है। वक्री वा चन्द्र के साथ होने से शनि चेष्टा वली होता है। चेष्टाबल युक्त शनि शुभ होता है।
शनि पुत्र चिन्ता उत्पन्न करता है। समय की अपेक्षा अति विलम्ब से प्रसूत होना शनि का धर्म है। १,५,९ स्थान में शनि इस प्रकार का प्रभाव उत्पन्न करता है।
शनि और गुरु का दशम केन्द्र योग जातक को राज्याधिकार के योग्य बनाता है। शनि का प्रभाव सूर्य द्वारा घटता है, परन्तु मंगल के आगे जा कर। सूर्य की दृष्टि होने से शनि का प्रभाव न्यून होता है। शनि प्रधान व्यक्ति निर्लज्ज एवं निश्चय ही दुर्गुणी होता है।
मिथुन, तुला, कुंभ राशियों में शनि का विशेष महत्व है। यदि शनि बली हो तो बहुत सम्पत्ति देता है। १,४,५,८,९ राशियों में अनिष्ट फल देता है। यह जिस राशि में होता है, उसके आगे एवं पीछे की राशियों को पीड़ित करता है। यह विशेष कर चन्द्र को पीड़ा देता है। इसे साढ़े साती कहते हैं। साढ़े साती का विचार चन्द्र राशि से होता है। चन्द्र की साढ़े साती का परिणाम शरीर एवं कुटुंबी मनुष्यों पर पड़ता है। जन्म काल में यदि चन्द्रमा तथा सूर्य के मध्य में शनि हो तो यह अतीव दुःस्थिति है। १,४,५,८,९ राशि पर सूर्य चन्द्र एकत्रित हो तो शनि की साढ़े साती भयंकर एवं विशेष कष्टप्रद होती है। शनि दम्भ और मत्सर दे करके अमंगल करता है। यह दरिद्रता देता है, आयु का नाश करता है, वातरोग देता है, बुद्धि भ्रमित करता है, जीर्णशीर्ण वस्तुओं की प्राप्ति कराता है, नीचों की संगति कराता है तथा निकृष्ट निवास देता है।
शनि के बलहीन होने से भाग्यहीनता होती है। यह पैर में व्रण करता है। अधिक श्रम कराता है, थकान से शैथिल्य देता है तन्द्रा भ्रान्ति, भीति तथा पिशाच से पीड़ा देता है भयानक ज्वर एवं अपंगता का कारक है।
शनि का धनुषाकार मण्डल है। अंगुल २, कश्यप गोत्र तथा कृष्ण रंग है। इसका वाहन गीध है, है समिधा शमी है।
दान द्रव्य नीलम, लोहा, सोना, काली उड़द, कुलथी, तेल कडुवा, काला कम्बल, नौलावस्त्र, नीला फूल, काली गौ भैंस कस्तूरी खड़ाऊ एवं उपानह।
दान-समय- शनिवार सायंकाल।
जड़ी-विच्छोल की जड़ कपित्थ मूल।
ध्यान मंत्र :
नीलाञ्जन समाभसं रविपुत्र यमाग्रजम् छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।
जो मनुष्य सत्य और धर्म में तत्पर रह कर चिन्ता रहित हो धर्म के अनुष्ठान में लगे हुए हैं, उनकी ओर अकाल मृत्यु आँख उठा कर देख भी नहीं सकती।
शनि संन्यासी ग्रह है। एक स्थान पर अधिक समय तक टिकने नहीं देता। यह सब कुछ छीन लेता है अथवा सर्वस्व दान करा देता है। यह दरिद्रता एवं अकिञ्चनता की साक्षात् मूर्ति है। स्वयं ऐसा होकर दूसरों को सम्पन्न बनाता है। यह दुःख के कोष का स्वामी है। दुःख देता है तथा दुःख लेता है।
*शनि की साढ़े साती :*
भारतीय ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से एक ग्रह, शनि की साढ़े सात वर्ष चलने वाली एक प्रकार की ग्रह दशा होती है। ज्योतिष एवं खगोलशास्त्र के नियमानुसार सभी ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में भ्रमण करते रहते हैं। इस प्रकार जब शनि ग्रह लग्न से बारहवीं राशि में प्रवेश करता है तो उस विशेष राशि से अगली दो राशि में गुजरते हुए अपना समय चक्र पूरा करता है।
शनि की मंथर गति से चलने के कारण ये ग्रह एक राशि में लगभग ढाई वर्ष यात्रा करता है, इस प्रकार एक वर्तमान के पहले एक पिछले तथा एक अगले ग्रह पर प्रभाव डालते हुए ये तीन गुणा, अर्थात साढ़े सात वर्ष की अवधि का काल साढ़े सात वर्ष का होता है। भारतीय ज्योतिष में इसे ही साढ़े साती के नाम से जाना जाता है।
अवधि : साढ़े साती के आरम्भ होने के बारे में कई मान्यताएं हैं। एक प्राचीन मान्यता के अनुसार जिस दिन शनि किसी विशेष राशि में होता है उस दिन से शनि की साढ़े साती शुरू हो जाती है। एक अन्य मान्यता यह भी है कि शनि जन्म राशि के बाद जिस भी राशि में प्रवेश करता है, साढ़े साती की दशा आरम्भ हो जाती है और जब शनि जन्म से दूसरे स्थान को पार कर जाता है तब इसकी दशा से मुक्ति मिल जाती है। ज्योतिषविद शनि के आरम्भ और समाप्ति को लेकर एक गणितीय विधि का आकलन करते हैं, जिसमें साढ़े साती के आरम्भ होने के समय और समाप्ति के समय के अनुमान हेतु चन्द्रमा के स्पष्ट अंशों की आवश्यकता होती है।
चन्द्रमा को इस विधि में केन्द्र मान लिया जाता है। इस प्रकार साढ़े साती की अवधि में शनि तीन राशियों से निकलता है, तो तीनों राशियों के अंशों के कुल समय को दो भागों में विभाजित कर लिया जाता है। इस प्रक्रिया में चन्द्र से दोनों तरफ एक-एक अंश की दूरी बनती है। शनि जब इस अंश के आरम्भ बिन्दु पर पहुंचता है तब साढ़े साती का आरम्भ माना जाता है और जब अंतिम अंश को पार कर जाता है तब इसका अंत माना जाता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अलग अलग राशियों के व्यक्तियों में इसका प्रभाव भी अलग अलग होता है। कुछ व्यक्तियों को साढ़े साती आरम्भ होने के कुछ समय पूर्व ही इसके संकेत मिल जाते हैं और अवधि समाप्त होने से पूर्व ही उसके प्रभावों से मुक्त हो जाते हैं, वहीं कुछ लोगों को देर से शनि का प्रभाव दिखाई पड़ता है और साढ़े साती समाप्त होन के कुछ समय बाद तक इसके प्रभाव समाप्त होते हैं। उनके अनुसार साढ़े साती के संदर्भ में कुण्डली में जन्म चन्द्र से द्वादश स्थान का विशेष महत्व है। इस स्थान का महत्व अधिक इसलिये हैं कि द्वादश स्थान चन्द्र रशि के निकट होता है। ज्योतिष में द्वादश स्थान से काल पुरूष के पैरों का विश्लेषण किया जाता है तो दूसरी ओर बुद्धि पर भी इसका प्रभाव होता है।
*साढ़े साती के तथ्य :*
शनि साढ़े साती तीन हिस्सों में होती है. हर एक हिस्सा लग भग २ वर्ष ६ माह का होता है। अगर तथ्यों पर ध्यान दे, तो शनि का मकसद व्यक्ति को जीवन भर के लिए सिख देने का होता है. इसलिए पहले २ वर्ष ६ माह के हिस्से में शनि व्यक्ति को मानसिक रूप से परेशान करता है. दूसरे हिस्से में आर्थिक, शारीरिक, विश्वास इत्यादि रूप से क्षति पहुंचाता है, और तीसरे और आखिरी हिस्से में शनि महाराज, अपने कारण जो जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करवाते है। यह वो समय होता है, जब व्यक्ति को सत्य का ज्ञान होता है।
*लक्षण और उपाय :*
कुछ विशेष प्रकार की घटनाएं होती हैं जिनसे साढ़े साती चालू होने के संकेत मिलते हैं। इस दौरान असामान्य घटानाओं से आभास हो सकता है कि अवधि चालू है।
कहते हैं कि शिव की उपासना करने वालों को इससे राहत मिलती है। अत: नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा व अराधना करनी चाहिए। पीपल वृक्ष शिव का रूप माना जाता है, वैसे इसमें सभी देवताओं का निवास मानते हैं, अतः पीपल को अर्घ्र देने से शनि देव प्रसन्न होते हैं।अनुराधा नक्षत्र में अमावस्या हो और शनिवार का योग हो, उस दिन तेल, तिल सहित विधि पूर्वक पीपल वृक्ष की पूजा करने से मुक्ति मिलती है।
शनिदेव की प्रसन्नता हेतु शनि स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। इसके अलावा हनुमान जी को भी रुद्रावतार माना जाता है। अतः उनकी आराधना भी इसके निवारण हेतु फ़लदायी होती है। मान्यता अनुसार नाव के तले में लगी कील और काले घोड़े का नाल भी इसमें सार्थक उपाय होते हैं। इनकी अंगूठी बनवाकर धारण कर सकते हैं।
शनि से संबंधित वस्तुएं, जैसे लोहे से बने बर्तन, काला कपड़ा, सरसों का तेल, चमड़े के जूते, काला सुरमा, काले चने, काले तिल, उड़द की साबूत दाल, आदि शनिवार के दिन दान करने से एवं काले वस्त्र एवं काली वस्तुओं का उपयोग करने से शनि की प्रसन्नता प्राप्त होती है।इसके अलावा अन्य उपाय भी बताये जाते हैं। शनि की दशा से बचने हेतु किसी योग्य पंडित से महामृत्युंजय मंत्र द्वारा शिव का अभिषेक कराएं तो भी मुक्ति मिलना संभव होता है।
*साढ़े साती शुभ भी :*
शनि की ढईया और साढ़े साती को प्रायः अशुभ एवं हानिकारक ही माना जाता है। विद्वान ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार शनि सभी व्यक्ति के लिए कष्टकारी नहीं होते हैं। शनि की दशा में बहुत से लोगों को अपेक्षा से बढ़कर लाभ, सम्मान व वैभव की प्राप्ति होती है।
हालांकि कुछ लोगों को शनि की दशा में काफी परेशानी एवं कष्ट का सामना करना होता है। इस प्रकार शनि केवल कष्ट ही नहीं देते बल्कि शुभ और लाभ भी प्रदान करते हैं। इस दशा के समय यदि चन्द्रमा उच्च राशि में होता है तो अधिक सहन शक्ति आ जाती है और कार्य क्षमता बढ़ जाती है जबकि कमज़ोर व नीच का चन्द्र सहनशीलता को कम कर देता है व मन काम में नहीं लगता है। इससे समस्याएं और बढ़ जाती हैं।
जन्म कुण्डली में चन्द्रमा की स्थिति का आंकलन करने के साथ ही शनि की स्थिति का आंकलन भी आवश्यक होता है।
अगर लग्न, वृष, मिथुन, कन्या, तुला, मकर अथवा कुम्भ है तो शनि हानि नहीं पहुंचाते हैं वरन उनसे लाभ व सहयोग मिलता है शनि यदि लग्न कुण्डली व चन्द्र कुण्डली दोनों में शुभ कारक है तो किसी भी तरह शनि कष्टकारी नहीं होता है।
कुण्डली में स्थिति यदि इसके विपरीत है तो साढ़े साती के समय काफी समस्या और एक के बाद एक कठिनाइयों का सामना होता पड़ता है। यदि चन्द्र राशि एवं लग्न कुण्डली उपरोक्त दोनों प्रकार से मेल नहीं खाते हों अर्थात एक में शुभ हों और दूसरे में अशुभ तो साढ़े साती के समय मिला-जुला प्रभाव मिलता है।

