पुष्पा गुप्ता
बीते 16 सितम्बर को सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय द्वारा 16 दो मीडिया संस्थानों और कई यूट्यूब चैनलों को नोटिस भेजकर अडाणी और उनकी कम्पनियों का ज़िक्र करने वाले कुल 138 वीडियो, 83 इंस्टाग्राम पोस्ट और प्रकाशित लेखों को हटाने के लिए नोटिस जारी किया गया। इनमें न्यूज लॉण्ड्री, अभिसार शर्मा, ध्रुव राठी, रवीश कुमार ऑफिशियल, द देशभक्त, दीपक शर्मा, प्रज्ञा का पन्ना, अजीत अंजुम, एचडब्ल्यू न्यूज इंग्लिश और परंजॉय ऑनलाइन प्रमुख रुप से शामिल हैं।
यह नोटिस अडाणी एण्टरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) की ओर से दायर मानहानि के मामले में रोहिणी कोर्ट के सिविल जज के अन्तरिम आदेश के आधार पर दिया गया था। अदालत के एकतरफ़ा अन्तरिम आदेश में उन लेखों, सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो से कथित मानहानि करने वाली सामग्री हटाने का आदेश दिया गया था, जिन्हें अडाणी समूह की प्रतिष्ठा के लिए हानिकारक माना गया था।
इसे तत्काल संज्ञान में लेते हुए सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय ने पाँच दिनों के भीतर सामग्री हटाने के लिए नोटिस जारी किये थे, लेकिन कई वीडियो और पोस्ट ऑनलाइन मौजूद रहे। इसके बाद मन्त्रालय ने 36 घण्टों के भीतर कार्रवाई करने का अल्टीमेटम दिया।
न्यायलय द्वारा दिये गये ऐसे एकतरफ़ा आदेश आश्चर्यचकित करने वाले नहीं हैं। ऐसे आदेशों से न्यायपालिका का असल चरित्र भी सामने आ जाता है और स्पष्ट हो जाता है कि न्यायपालिका की स्वायत्तता और निष्पक्षता एक छलावा है। बीच-बीच में न्यायपालिका निष्पक्षता और स्वायत्तता का ढ़ोंग-पाखण्ड करके लोगों की आँखों में धूल झोंकती है, ताकि लोगों का इस पूँजीवादी व्यवस्था में भरोसा बना रहे, पर अन्ततः वह भी बड़ी पूँजी की ही सेवा करती है।
साथ ही यह राज्यसत्ता, सरकार व न्यायपालिका के सभी निकायों में आरएसएस-भाजपा द्वारा पिछले कई दशकों में की गयी घुसपैठ को भी दर्शाता है।
बता दें कि यह आदेश सूचना प्रौद्योगिकी (इण्टरमीडियरी गाइडलाइन्स एण्ड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 के तहत दिया गया था, जो प्रमुख डिजिटल समाचार प्रकाशकों, पत्रकारों, व्यंग्यकारों पर भी लागू होता है।
साथ ही यह क़ानून के अदालती आदेश पर सामग्री हटाने में सरकार की भूमिका को प्रमुख बना देता है। ऐसे क़ानूनों के माध्यम से मोदी सरकार अपने और अपने आकाओं के ख़िलाफ़ उठने वाले हर विरोध को दबाने की तैयारी कर चुकी है, ताकि अडाणी-अम्बानी जैसे बड़े पूँजीपतियों की खुलेआम और क़ानूनी तौर पर रक्षा की जा सके।
ऐसे ही कार्य करने के लिए आर्थिक संकट से कराह रहे पूँजीपति वर्ग ने फ़ासीवादी मोदी सरकार को सत्ता में पहुँचाया था। सत्ता में आने के बाद से मोदी सरकार ने पूरे लगन के साथ पूँजीपति वर्ग और विशेष तौर पर बड़े पूँजीपति वर्ग के हितों की सेवा की है और पूँजी की नग्न तानाशाही को स्थापित किया है।
बहरहाल, अदालत के उपरोक्त आदेश पर रोहिणी कोर्ट के ही ज़िला जज ने रोक लगा दी है क्योंकि आदेश बिना दूसरे पक्ष को सुने, एकतरफ़ा पारित किया गया था। हालाँकि रोहिणी कोर्ट के ज़िला जज का ये आदेश सिर्फ़ चार पत्रकारों रवि नायर, अबीर दासगुप्ता, आयुषकान्त दास और आयुष जोशी के लिए है, जिन्होंने इस बारे में ये याचिका दायर की थी।
मोदी सरकार अपने और अपने आका पूँजीपतियों के ख़िलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ को चुप कराने पर तुली हुई है। ये जगज़ाहिर है कि मोदी के सत्ता में आने के बाद से अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले बहुत तेज़ी से बढ़े हैं। सरकारी नीतियों की आलोचना करने वाले न्यूज़ पोर्टल्स पर लगातार हमले हो रहे हैं।
आपको याद होगा कि मोदी सरकार ने इससे पहले न्यूजक्लिक, न्यूजलॉण्ड्री जैसे स्वतन्त्र मीडिया संस्थानों पर भी कार्रवाई की थी। गोदी मीडिया के अलावा बाक़ी सभी स्वतन्त्र मीडिया संस्थान फ़ासीवादी मोदी सरकार की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं। आज कुछ गिने-चुने स्वतन्त्र मीडिया चैनल हैं, जो यूट्यूब और अलग-अलग सोशल साइटों के ज़रिये भाजपा और पूँजीपतियों के गठजोड़ को दिखाते हैं।
अडाणी और सेबी के घोटाले का पर्दाफ़ाश करने से लेकर, अडाणी के तमाम फ़र्ज़ीवाड़े को इन स्वतन्त्र पत्रकारों ने ही पूरे देश के सामने रखा था और इसका ही ख़ामियाज़ा अब उन्हें भुगतना पड़ रहा है।
पूँजीवादी मीडिया, जिसे वैसे तो पूँजीवादी जनतन्त्र का चौथा खम्भा कहा जाता है, आज सार्विक तौर पर नंगा हो चुका है। मौजूदा दौर में गोदी मीडिया तो बस झूठी ख़बरें, फूहड़ विज्ञापन, साम्प्रदायिक-अन्धराष्ट्रवादी उन्माद की ख़ुराक दिखाने का तन्त्र रह गया है। बढ़ती बेरोज़गारी, महँगाई जैसे मुद्दे बाहर न आ सकें इसलिए भाजपा सरकार लगातार तमाम न्यूज़ चैनलों, अख़बारों का इस्तेमाल कर अपने फ़ासीवादी सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रचार को बढ़ावा देने का काम कर रही है।
साम्प्रदायिकता, उन्माद और अन्धराष्ट्रवाद के प्रचार के ज़रिये ये आम जनता की ज़िन्दगी के भौतिक और आर्थिक प्रश्नों को गोल कर जाते हैं। और इनके इस एजेण्डे के ख़िलाफ़ बोलने वाली हर आवाज़ इनके निशाने पर है।
इसलिए आज यह ज़रूरी है कि स्वतन्त्र पत्रकारिता पर हो रहे हमले का हमें पुरज़ोर विरोध करना चाहिए।

