डॉ. विकास मानव
_सम्मोहनविद जब किसी को सम्मोहित करता हैं तो वह उसे अपनी आंखों में या किसी एक चमकते हुए बिंदु पर केन्द्रित होने को, एकाग्र होने को कहता है। सम्मोहनविद यदि संकल्प में आपसे गहरा होगा तो ही आपको अपनी आंखों में देखने को, एकाग्र होने को कह सकता है नहीं तो वह किसी बिंदु पर ही एकाग्र होने को कहता है।_
अचेतन के तल पर अपने से गहरे व्यक्ति या साधक को सम्मोहनविद सम्मोहित नहीं कर सकता है। क्योंकि वह जागा हुआ है, उसे सुलाना मुश्किल ही नहीं असंभव भी है।
वह सोने का, या नींद में चले जाने का अभिनय करके अपनी बात हमारे भीतर डाल सकता है क्योंकि सम्मोहनविद भी निर्विचार यानी चौथे तल पर ही होता है लेकिन दोनों में बहुत फर्क है।
सम्मोहनविद ने चौथे तल पर प्रवेश किया है सिर्फ किसी को सम्मोहित करने के समय, लेकिन गहरे तल पर खड़े व्यक्ति का तो चौथे तल पर प्रवेश हो चुका है वह भी हमेशा के लिए!
इसलिए वह उथले तल पर खड़े सम्मोहनविद को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लेता है। संभवतः तो सम्मोहनविद अपने से गहरे अचेतन पर खड़े व्यक्ति को सम्मोहित करने से पहले ही उसके प्रभाव क्षेत्र में आ जाता है क्योंकि उसका प्रभाव चुंबक की तरह खींचता है।
हमारी दोनों आंखें हमारे विचारों के साथ गतिमान होती रहती है। क्रोध का विचार यदि आता है तो हमारा शरीर आंखों की पलकें पूरी खोलकर आंखों को बड़ा दिखाकर सामने वाले को डराने की कोशिश करता है।
अपने से छोटों को हम आंखें दिखाकर और अपने से बड़ों के आगे आंखें झुकाकर हम अपने विचारों को उन तक प्रेषित करते रहते हैं। यानी हम अपने विचारों को आंखों के द्वारा अभिव्यक्ति देते हैं। अपने विचार को, अपनी बात को आंखों की भाषा में समझा देते हैं।
इस तरह हमारी आंखों का हमारे विचारों से गहरा अंतर्संबंध निहित हो जाता है। अर्थात हमारी आंखें हमारे विचारों की अभिव्यक्ति बन जाती हैं और हमारे विचार आंखों को संचालित करने लगते हैं।
यानी आंखें और विचार एक – दूसरे के साथ गतिमान होते हैं। अर्थात एक सिरे को पकड़ो तो दूसरा सिरा आसानी से पकड़ में आ जाए।
यही कारण है कि यदि हमारा मन शांत होगा तो ही हमारी आंखें शांत होंगीं, ठहरी हुई होंगीं और यदि हमारा मन शांत नहीं होगा तो हमारी आंखें भी शांत नहीं होंगी, ठहरी हुई नहीं होंगीं, गतिमान होंगीं, इतनी गतिमान कि नींद आने में बाधक होगी।
_यदि हमारे विचार शांत होंगें तो हमारी आंखें भी शांत और ठहरी हुई होंगी। और इसके उलट यदि हमारी आंखें शांत और ठहरी हुई होंगीं तो हमारे विचार भी शांत होंगें, ठहरे हुए होंगें। यानी घटना दोनों ओर से घट सकती है।_
इसका मतलब यदि हम आंखों को ठहराते हैं तो हमारे विचार ठहर जाएंगे। और यदि हम विचारों को ठहरा लेते हैं तो हमारी आंखें ठहर जाएंगी.
ध्यान में हम शरीर को ठहराते हैं, शिथिल कर विश्राम में ले जाते हैं ताकि हमारा मन ठहर जाए यानी विचार ठहर जाए और विचारों के ठहरते ही हमारी आंखें भी ठहर जाए और हमारा ध्यान में या कहें अचेतन में प्रवेश हो जाए?
सम्मोहन में हम आंखों को एक बिंदु पर ठहराते हैं ताकि विचार ठहर जाए और विचारों के ठहरते ही हमारा चेतन मन सो जाए और चेतन मन के साथ ही शरीर भी सो जाए और सम्मोहनविद का हमारे अचेतन से संपर्क हो जाए और हमारे अचेतन में सम्मोहनविद प्रवेश कर जाए।
_ध्यान में और सम्मोहन में, दोनों ही स्थितियों में हमारा अचेतन में प्रवेश होता है जिसे निर्विचार यानी चौथा तल कहा गया है। ध्यान में हम सजगता से, होश पूर्वक प्रवेश करते हैं जहां हमारा चेतन मन खो जाता है, शिथिल हो जाता है और हमारा अचेतन मन जाग जाता है और हम साक्षी हो जाते हैं।_
साक्षी इसलिए हो जाते हैं क्योंकि जो साक्षी विचारों में खोया हुआ था, विचारों के रुकते ही विचारों से जाग जाता है और अपने आप पर लौट आता है। स्वयं को अपने शरीर का साक्षी हुआ पाता है।
सम्मोहन में हमारा चेतन मन शरीर के साथ ही सो जाता है और हमारा अचेतन मन जाग जाता है। चूंकि चेतन मन सम्मोहनविद के संपर्क में रहता है तो ज्यों ही हमारा चेतन मन सोता है और अचेतन जागता है तो हमारा अचेतन सीधे सम्मोहनविद के संपर्क में आ जाता है ठीक उसी तरह जिस तरह से हम अपनी गाड़ी को एक गियर से दूसरे गीयर में डालते हैं और गाड़ी गति में आ जाती है।
_चेतन मन का दूसरा सिरा अचेतन है। ज्यों ही शरीर के साथ चेतन मन वाला पहला सिरा सोता है, दूसरा सिरा अचेतन सम्मोहनविद के संपर्क में आ जाता है, जैसे हम फोन पर बात करते हैं और पहली कॉल को होल्ड करके दूसरी काॅल रीसिव कर लेते हैं उसी भांति सम्मोहनविद का हमारे सोने के बाद, चेतन मन के सोते ही हमारे अचेतन से संपर्क हो जाता है।_
क्योंकि उसने अब तुम्हें नींद आ रही है… अब तुम्हें नींद आ रही है… अब तुम्हें नींद आ रही है… कहते हुए हमारे चेतन मन को सुला दिया और अचेतन को जगा दिया है।
अचेतन चेतन मन की जगह ले लेता है जैसे नौकरी में हमारी ड्यूटी बदलती है।
चेतन मन पर चल रहे विचार नींद में प्रवेश करने पर अचेतन में स्वप्न बन जाते हैं। लेकिन यहां सम्मोहित होने वाले व्यक्ति यानी हमारे मन में कोई भी विचार नहीं है क्योंकि सम्मोहनविद ने हमारी आंखों को एक बिंदु पर ठहराकर हमारे विचारों को भी ठहरा दिया है।
विचारों के ठहरते ही निर्विचार यानी अचेतन हमारे सामने आ खड़ा होगा। चूंकि अचेतन की डोर सम्मोहनविद के हाथ में हैं। हमारा साक्षी तो सो गया है हम तो नींद में चले गए हैं। हमारे अचेतन को तो सम्मोहनविद निर्देशित कर रहा है।
यदि जागते में सम्मोहनविद हमें कहता कि धूम्रपान ठीक नहीं है। इससे केंसर होता है। तो हम तर्क कर टालते हुए कहते हैं कि एक दिन मरना ही तो है… और क्या होगा? लेकिन हमारा अचेतन जो इससे नौ गुना बड़ा है वह तर्क नहीं करता है।
सम्मोहनविद उससे यदि कहे कि धूम्रपान ठीक नहीं है। इससे केंसर होता है। तो वह स्वीकार कर लेता है और धूम्रपान की तलब ही नहीं लगने देगा। धूम्रपान की जगह होगी उसकी अनुपस्थिति की मीठी – मीठी खुमारी।
यहां चेतन मन के सोते ही हमारा सजग होना, साक्षी होना भी खो जाता है। क्योंकि हमारे साक्षी को तो पहले से ही सम्मोहनविद ने हमारे शरीर के साथ ही सुला दिया होता है।
इसलिए सम्मोहनविद हमारे अचेतन से क्या – क्या बातें पूछता है यह केवल वह जानता है और उसके आसपास जो हमारे परिजन उपस्थित होते हैं, वे जान पाते हैं।
जिसे सम्मोहित किया जाता है वह, यानी हम यहां पर एक प्रकार की तंद्रा में होते हैं, जहां न तो कोई विचार होता है और न ही कोई स्वप्न होता है। तंद्रा में यदि विचार होगा तो हमारा चेतन मन जागा हुआ होगा और हम सम्मोहन के बाहर होंगें और यदि स्वप्न होगा तो सम्मोहनविद का हमारे अचेतन से संपर्क टूट जाएगा यानी सम्मोहनविद की बात का हमारा अचेतन कोई जवाब नहीं दे पाएगा क्योंकि अचेतन तो हमारे चेतन मन को तंद्रा से खींचकर स्वप्न दिखाने में व्यस्त होगा न कि सम्मोहन में होगा?
अतः सम्मोहन में हम एक गहरी तंद्रा में होंगे जहां हमारे साथ क्या घटा है या सम्मोहनविद ने हमारे अचेतन से क्या पूछा है और हमारे अचेतन को क्या कहा है, हमारे अचेतन में क्या बात डाली है हमें इसकी कोई जानकारी नहीं होती है।
सम्मोहन के बाहर आने के बाद भी हमें कुछ याद नहीं रहता है। लेकिन हम अपने को अधिक ताजा अनुभव करते हैं।
हम लाख कोशिशों के बाद भी नींद नहीं ला पाते हैं और सम्मोहन में ऐसी क्या घटना घटती है कि सम्मोहनविद हमें बड़ी आसानी से नींद में ले जाते है? सम्मोहनविद कैसे हमें नींद में ले जाकर हमारे अचेतन से संपर्क करते हैं?
जब सम्मोहनविद हमें सम्मोहित करते हैं तो पहले वह हमें गहरी श्वास लेकर अपने शरीर को शांत और शिथिल करने को कहते हैं।
जब हम गहरी श्वास लेकर अपने शरीर को शांत और शिथिल कर लेते हैं तो हमारी श्वास गहरी हो नाभि तक चलने लगती है, जैसी शरीर के नींद में चले जाने पर चलती है वैसी चलने लगती है।
अर्थात हमारा शरीर तुरंत नींद में जाने की तैयारी में आ जाता है बाकी सम्मोहनविद का सुझाव काम करता है कि “तुम्हें नींद आ रही है… तुम्हें नींद आ रही है… तुम्हें नींद आ रही है… ” और बिंदु को अपलक देखते – देखते हम तुरंत नींद में चले जाते हैं।
सम्मोहनविद का सुझाव कैसे काम करता है?
सम्मोहनविद जैसे ही हमें एक बिंदु पर केंद्रित होने को कहता है। और हम अपलक यानी कि पलकों को झपकाए बिना उस बिंदु पर केंद्रित होते हैं तो हमारी दोनों आंखें एकाग्र होकर उस बिंदु पर ठहर जाती है, कोई गति नहीं करती है।
जब हमारी दोनों आंखें एक बिंदु पर थींर हो जाती है, ठहर जाती है तो हमारे विचार भी ठहर जाते हैं। और ज्यों ही विचार ठहरते हैं शरीर और भी शिथिल हो जाता है और शरीर के शिथिल होने के साथ ही हमरा चेतन मन भी शिथिल हो जाता है और सो जाता है।
दूसरे, सम्मोहनविद का सुझाव भी उसे सुलाने में मदद करता है कि “तुम्हें नींद आ रही है… तुम्हें नींद आ रही है… तुम्हें नींद आ रही है…।” बार बार एक ही बात को दोहराने से कि “तुम्हें नींद आ रही है…” मन उबने लगता है इसलिए भी नींद में चला जाता है।
अचेतन जागते ही सम्मोहनविद के संपर्क में आ जाता है। क्योंकि हमारे मन की डोर उसी के हाथ में है। अब सम्मोहनविद के मन में एक ही भाव होता है, कि इस व्यक्ति को स्वस्थ होने में मदद कैसे की जाए? इस व्यक्ति को ध्यान में प्रवेश करने में कैसे मदद की जाए?
यहां सम्मोहनविद हमारे अचेतन को जो भी सुझाव देगा उसका हमारे शरीर पर प्रभाव होगा और हमारे दैनिक जीवन पर भी होगा। यदि हम किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं तो सम्मोहनविद हमारे अचेतन को कह देगा कि तुम्हें कोई बिमारी नहीं है और अचेतन इस बात को स्वीकार लेगा और हम धीरे – धीरे उस बिमारी से बाहर आने लगेंगे।
क्योंकि अचेतन बहुत भोला है, तर्क नहीं करता है, हर बात को स्वीकार लेता है। जब वह बेतुके सपने को स्वीकार लेता है तो फिर हमारे सुझाव को क्यों नहीं स्वीकारेगा?
यहां इसका दुरुपयोग भी संभव है। सम्मोहनविद चाहे तो सम्मोहित व्यक्ति को जिस तरह बिमारी से बाहर लाता है उसी तरह से बिमारी में डाल भी सकता है। वह अचेतन से कह सकता है कि तुम्हें अमुक बिमारी है और हमारा अचेतन इसे स्वीकार लेगा और हम उस बिमारी से पीड़ित होते चले जाएंगे।
यह सम्मोहन का दुरुपयोग होगा लेकिन… ऐसा बहुत कम होगा, क्योंकि अचेतन भोला है लेकिन मूर्ख नहीं है। क्या उसके भीतर गहरा है और क्या उसके लिए उथला है! वह जानता है। अचेतन के सारे निर्णय सही होते हैं इसलिए अचेतन नकारात्मक निर्णय नहीं लेगा यानी गलत विचार के सुझाव के समय वह सम्मोहन के बाहर आ जाएगा।
सम्मोहन के प्रयोग में सम्मोहनविद पर भरोसा और अपनों की उपस्थिति में ही किसी को अपने अचेतन में प्रवेश देना चाहिए।

