–निर्मल कुमार शर्मा
आदिकाल से ही मानव अपनी पृथ्वी जैसे जीवन की खिलखिलाहट और स्पंदन से युक्त ग्रहों के बारे में उत्सुक रहता आया है,इसके लिए वह सदा आकाश के सुदूर कोने-कोने को निहारता और खंगालता रहा है,लेकिन प्राचीन काल में बेहतरीन दूरबीनों के अभाव में ग्रहों-उपग्रहों को केवल देख लेना ही बड़ी उपलब्धि हुआ करती थी,परन्तु आज के आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के काल में अंतरिक्ष के सुदूर कोने-कोने में झांकने और परखने के लिए रेडियो दूरदबीनों ( Radio Telescopes ) और अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहे हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी (Hubble Space Telescope ) तथा जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरदर्शी (James Webb Space Telescope ) जैसे आधुनिकतम् दूरदर्शी उपकरणों के अविष्कार हो जाने तथा लाखों किलोमीटर प्रति घंटे की द्रुत गति से यात्रा करने वाले अंतरिक्ष यानों के विकास हो जाने से अब प्राचीन काल की तुलना में सौरमंडल में स्थित ग्रहों-उपग्रहों का अवलोकन करना अब प्राचीन काल के समय से तुलनात्मक रूप से बहुत ही आसान और सुगम हो गया है।
अभी कुछ दिनों पहले से हमारे सौरमंडल से परे सुदूर अंतरिक्ष की अंतहीन विस्तारित गहराइयों में पृथ्वी जैसे जीवन के स्पंदन से युक्त ग्रहों की खोज करने की मानो होड़ मची हुई है,अभी हाल ही में कुछ खगोल-वैज्ञानिकों के एक समूह ने घोषणा की है कि उन्होंने तीन ऐसे ग्रह खोज निकाले हैं जिनका वातावरण ठीक हमारी धरती के पर्यावरण की तरह ही है,लेकिन इन ग्रहों की हमारी पृथ्वी से दूरी 39 प्रकाश वर्ष है ! इसका मतलब प्रकाश की गति से भी हमारे अंतरिक्ष यान उन ग्रहों की यात्रा करें तब भी उन अंतरिक्ष यानों को उन ग्रहों तक पहुंचने में 39वर्ष लग जाएंगे ! जबकि वास्तविकता में अभी वर्तमान समय में किसी मानव निर्मित किसी भी अंतरिक्ष यान को प्रकाश की गति से यात्रा करना संभव ही नहीं है !
मानव निर्मित अंतरिक्ष यान,पार्कर सोलर प्रोब जिसे 12अगस्त 2018 को प्रक्षेपित किया गया था,वह लगभग 7लाख किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से सूर्य की ओर तेजी से बढ़ा जा रहा है,यह मानवनिर्मित किसी भी अंतरिक्ष यान की अभी तक की तीव्रतम् रफ्तार है,को भी अगर हमारी पृथ्वी से 39 प्रकाशवर्ष दूरस्थ स्थित ग्रहों तक पहुंचने के लिए उपयोग किया जाय तो उस स्थिति में भी उन ग्रहों तक पहुंचने में हमें 60171 मतलब साठ हजार एक सौ इकहत्तर वर्ष का असीम लम्बा समय लग जाएगा ! ध्यान रहे डार्विन के सुप्रसिद्ध जीवों के विकास के सिद्धांत के अनुसार हमारी पृथ्वी पर मानव प्रजाति का आगमन ही मात्र 2 लाख वर्षों पहले से हुआ है ! इस विकट और असंभव सी स्थिति में हम मानवों द्वारा वर्तमान टेक्नोलॉजी की मदद से यात्रा करके उन 39प्रकाशवर्ष दूरवर्ती ग्रहों तक पहुंच पाना अभी फिलहाल बिल्कुल असंभव सा ही है ! इसलिए इस धरती के वैज्ञानिकों ने खरबों किलोमीटर दूर स्थित पृथ्वी के पर्यावरण जैसे इन ग्रहों पर अब ध्यान देना छोड़कर यह निर्णय लिया है कि हमें अपने सौरमंडल परिवार स्थित ग्रहों और उपग्रहों पर ही गंभीरता पूर्वक जीवन की तलाश करनी चाहिए ।
इसी क्रम में खगोल वैज्ञानिकों ने हमारे सौरमंडल के सबसे अद्भुत,अद्वितीय और खूबसूरत वलयधारी शनि ग्रह के 82चंद्रमाओं में से सबसे अद्भुत और दिलचस्प टाइटन उपग्रह का चयन किया है,जो ठीक हमारी पृथ्वी जैसे ही दिखता है। टाइटन शनि का सबसे बड़ा चंद्रमा और सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक उपग्रह है । टाइटन एकमात्र ऐसा चन्द्रमा है जो घने वातावरण के लिए जाना जाता है और पृथ्वी के अलावा अंतरिक्ष में एकमात्र ज्ञात वस्तु है जिस पर सतही तरल के स्थिर पिंडों के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। वैज्ञानिकों ने टाइटन पर नया शोध करके यह पता लगाया है कि टाइटन ठीक हमारी पृथ्वी जैसे ही दिखता है ! यही नहीं वहां भी हमारी पृथ्वी जैसी बारिश होती है,जिससे वहां की नदियां, झीलें,केनियन्स और समुद्र आदि भी ठीक हमारी पृथ्वी जैसे ही दिखाई देते हैं,लेकिन वहां के ये प्राकृतिक जलस्रोत पानी से नहीं भरे होते,अपितु इसके ठीक उलट वे सभी तरल मीथेन गैस से भरे हुए होते हैं ! टाइटन की बर्फीली सतह को भी वहां बहुतायत में उपस्थित मीथेन ही बनाती है ! नाइट्रोजन की तेज हवाओं और आंधियों से वहां पृथ्वी जैसे बड़े-बड़े टीले बनते-बिगड़ते रहते हैं !
आज से ठीक 18 वर्ष पूर्व अमेरिकी अंतरिक्ष यान हायगन्स 16 जनवरी 2004 को टाइटन के धरातल पर उतरा था,उसने टाइटन के धरातल पर उपस्थित भूरे-नारंगी रंग की नदियों,टीलों,तालाबों और झीलों आदि का चित्र भेजा था,टाइटन का वायुमंडल बहुत ही घना है,वहां के वायुमंडल में 98.4 प्रतिशत मीथेन गैस तथा 1.6प्रतिशत तक ही अन्य गैसें हैं ! इसका घना वायुमंडल पृथ्वी के वायुमंडल के ठीक विपरीत एक ऐसा विलोम ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करता है कि सूर्य की अधिकांश किरणें अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती हैं,जिससे इसकी सतह लगातार ठंडी होती चली जाती है,आपको यह जानकर बहुत अद्भुत आश्चर्य होगा कि टाइटन की सतह का औसत तापमान शून्य से 180डिग्री सेल्सियस तक नीचे है,मतलब हमारी धरती के सबसे ठंडे साइबेरिया की कड़कड़ाती ठंड से भी तीन गुनी ज्यादा ठंड ! शनिग्रह के इस उपग्रह टाइटन को नीदरलैंड के मशहूर खगोल वैज्ञानिक क्रिस्टियान हायगन्स ने 25 मार्च 1655 को ढूंढा था,यह सौरमंडल का सबसे बड़ा चांद है,इसका व्यास हमारे चांद से 1624 किलोमीटर बड़ा मतलब इसका व्यास 5150 किलोमीटर है,अमेरिकी अंतरिक्षयान हायगन्स 24 जनवरी 2005 को वहां की सतह के एक पथरीले,उबड़-खाबड़ जगह पर उतरा था,हायगन्स द्वारा भेजे गये फोटो से यह पता चला कि वहां बहुत तेज हवाएं चल रहीं हैं, वहां की हवाओं के विश्लेषण से यह पता चलता है कि वहां की हवा मुख्यत: मीथेन गैस से बनी हुई है,वहां की बादलें हमारी धरती के उलट पानी की जगह मीथेन गैस ही तरल पदार्थ के रूप में बरसातीं हैं !
टाइटन पर सक्रिय ज्वालामुखी भी हैं, वहां नदियां और उन नदियों के पाट भी हैं,लेकिन वहां पृथ्वी की तरह ऊंचे पहाड़ नहीं हैं,वहां की सतह भी हमारे चन्द्रमा की तरह जगह-जगह क्रेटरों से भरी हुई है ! वहां का वातावरण एकदम ठंडा और निरभ्र शांत है,वहां की सतह पर जीवन का स्पंदन ही नहीं है,वहां की हवा में प्रतिध्वनि भी पैदा होती है ! वहां भी हमारी धरती की तरह तरंगें पैदा होतीं हैं !
अमेरिका के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के भूवैज्ञानिक मैथ्यू लैपोट्रे ने टाइटन पर बने टीलों,मैदानों और उबड़-खाबड़ इलाकों के बारे में गहन अध्ययन और शोध किया है। उन्होंने अपने शोध पत्र में बताया है कि हमारी धरती पर टीले सिलिकेन चट्टानों और खनिजों से बनते हैं,जो हवाओं द्वारा सेडिमेंट्स के परतों के रूप में जमा होते रहते हैं,जो बाद में भारी भूगर्भीय दबाव,भूगर्भीय जल और उच्च तापमान से कठोर चट्टानों में बदल जाते हैं,लेकिन टाइटन उपग्रह पर ठीक इसी प्रकार की प्रक्रिया से वहां भी टीले, मैदान तथा ऊंची-नीची जगहें बनतीं-बिगड़ती रहतीं हैं,लेकिन टाइटन पर ये सेडिमेंट्स हमारी पृथ्वी की तरह सिलिकेन और खनिजों से न बनकर ठोस आर्गैनिक कंपाउंड्स या Solid Organic Compounds से मिलकर बनते हैं !
खगोल और भूवैज्ञानिक टाइटन पर हो रही इन प्रक्रियाओं को शोध करके समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर वहां के मूल तत्व आर्गेनिक कंपाउंड्स के दानों में कैसे बदल जाते हैं,इसके लिए उन्होंने हमारी धरती पर बहामास देश के पास उष्णकटिबंधीय समुद्रों में पाए जाने वाले सेडिमेंट्स,जिन्हें ओइड्स या Ooidsभी कहते हैं,जो छोटे-छोटे,गोल-गोल दाने सदृश्य होते हैं,पर शोध किया,ये सेडिमेंट्स तब बनते हैं,जब कैल्शियम कार्बोनेट को पानी के कालम से खींच कर इन दानों के ऊपर क्वार्ट्ज जैसे एक परत बना दिया जाता है !
खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार टाइटन की सतह पर भी ठीक हमारी धरती जैसे लैंडस्केप्स मौजूद हैं,वायुमंडलीय माडलिंग और कैसिनी मिशन Cassini Mission के डेटा के विश्लेषण से यह पता चलता है कि टाइटन के भूमध्य रेखा के आसपास का वातावरण ठीक हमारी पृथ्वी जैसे ही उसके अन्य जगहों के बनिस्बत तुलनात्मक रूप से गर्म है। टाइटन पर भी हमारी पृथ्वी की तरह सक्रिय सेडिमेंट्री सायकल Active Sedimentary Cycle है। यह बहुत ही विलक्षण और दिलचस्प बात है कि हमारे सौरमंडल में शनि के एक उपग्रह टाइटन पर भी ठीक हमारी पृथ्वी जैसा वातावरण मौजूद है !
जियोफिजिकल रिसर्च लेटर जर्नल में इस शोधपत्र को अभी हाल ही में प्रकाशित किया गया है,खगोल वैज्ञानिक अब टाइटन पर जीवन की तलाश कर रहे हैं,शोध वैज्ञानिकों ने टाइटन के पर्यावरण से संबंधित डेटा और अपने माडल को एक साथ जोड़कर आब्जर्व किया तो पाया कि टाइटन की सतह पर भी लैंडस्केप्स मौजूद हैं ! शनिग्रह के उपग्रह टाइटन पर ठीक हमारी पृथ्वी जैसे वायुमंडल भी उपस्थित है। कितनी आश्चर्यचकित करनेवाली बात है कि हमारे समस्त सौरमंडल में शनिग्रह का टाइटन ही एकमात्र उपग्रह या चंद्रमा है,जिसकी सतह ठीक हमारी पृथ्वी जैसी नहरों,नदियों,झीलों और समुद्रों आदि से भरी हुई है !
हमारी धरती से शनिग्रह की दूरी बदलती रहती है,क्योंकि दोनों ग्रह गतिशील हैं,शनि की हमारी धरती से निकटतम दूरी करीब 1.2 अरब किलोमीटर है। यह दूरी पृथ्वी की सूर्य से दूरी से लगभग आठ गुना ज़्यादा है। शनि का उपग्रह टाइटन उससे लगभग 12लाख किलोमीटर दूरी पर है,इस प्रकार हमारी धरती से टाइटन की दूरी लगभग 1.2अरब +12लाख किलोमीटर है। अमेरिका द्वारा बनाए गए संयुक्त कैसिनी-ह्यूजेंस अंतरिक्ष यान को टाइटन पर जाने के लिए 15 अक्टूबर 1997 को पृथ्वी से प्रक्षेपित किया गया था। ह्यूजेंस 25 दिसंबर, 2004 को कैसिनी ऑर्बिटर से अलग हो गया और 14 जनवरी, 2005 को वह टाइटन के अदिरी क्षेत्र के पास उतरा। इस प्रकार उसे पृथ्वी से टाइटन तक जाने में 7वर्ष 2माह 29 दिन का समय लगा। अब उम्मीद करिए कि हूबहू हमारी पृथ्वी जैसा टाइटन हम मानव प्रजाति के लिए पृथ्वी के विकल्प के रूप में कितना खरा उतरता है ? यह भी भविष्य के गर्भ में है,लेकिन उम्मीद रखिए कि हमारी धरती के अतिविलक्षण मस्तिष्क के धनी हमारे वैज्ञानिक असंभव लगने वाली समस्या को भी हल करने में पूर्णतया सक्षम होने की ताकत,बुद्धि,विवेक और माद्दा रखते हैं ! आशा है कुछ दशकों बाद अरबों किलोमीटर दूर शनि ग्रह के इस अद्भुत अद्वितीय अतुलनीय सौंदर्य से युक्त टाइटन उपग्रह पर मानव बस्तियों को बसाने के लिए हमारे धरती के उच्च मेधा शक्ति वाले वैज्ञानिक पूर्णतः सफल होंगे ! तो उस सुखद घड़ी और क्षण का इंतजार करिए ।
-निर्मल कुमार शर्मा 'गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के सुप्रतिष्ठित समाचार पत्र-पत्रिकाओं में वैज्ञानिक,सामाजिक,राजनैतिक, पर्यावरण आदि विषयों पर स्वतंत्र,निष्पक्ष,बेखौफ, आमजनहितैषी,न्यायोचित व समसामयिक लेखन,संपर्क-9910629632,

