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*सत्य की खोज जीवन- अस्तित्व के रहस्यों की खोज* 

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     डॉ. विकास मानव

जीवन है, जगत है, अस्तित्व है, होश है, इन्द्रियां हैं.

    अर्थात् सब कुछ है लेकिन इन सबके होते हुए भी जीवन के सत्य से मनुष्य अपरिचित है। 

      जीवन का यह अपरिचय, अज्ञान मनुष्य के लिए पीड़ादायी है। अभी तक जीवन-प्रवाह में मनुष्य विकास की जिस स्थिति में पहुंचा है, वह वास्तव में अपर्याप्त है। विराट की संभावना की तुलना में मनुष्य एक बीज मात्र है। लेकिन उस बीज में गुप्त रूप से बहुत कुछ छिपा हुआ है। उसी ‘बहुत कुछ’ को प्रकाश में लाना कुण्डलिनी-योगतंत्र का लक्ष्य है।

      मनुष्य के अस्तित्वगत अन्तर्विकास व अन्तर्यात्रा की जो प्रक्रिया जानी-समझी गयी और खोजी-पहचानी गयी, उसी से ‘धर्म’ का निर्माण हुआ है। जैसे विज्ञान ने पदार्थ- जगत और स्थूल जीवन-जगत की खोज की है।

     उसी प्रकार एक अस्तित्वगत आत्मजगत व अन्तश्चेतना- जगत की भी खोज की गई है जिसके पराविज्ञान को धर्म ने विकसित किया है। इसी खोज को धर्म ‘साधना’ कहता है और उसकी अंतःप्रक्रियाओं को ‘योगतंत्र’ कहता है।

   ध्यानतंत्र के जितने भी आयाम हैं, उनमें कुण्डलिनी योगतंत्र सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। कुण्डलिनी की अन्तर्यात्रा स्थूलतम आधार से शुरू होकर सूक्ष्म से सूक्ष्म होती हुई सूक्ष्मातिसूक्ष्म का भी अतिक्रमण कर परम सत्य तक मनुष्य को पहुंचाती है। कुण्डलिनी-साधना अपने विकास की ऊंचाइयों में योगतंत्र के अनेक आयामों को और विभिन्न प्रक्रियाओं को अपने में समाहित कर लेती है। 

      इसीलिए हम इस साधना को ‘सिद्ध ध्यानतंत्र’ या ‘महा योगतंत्र’ का नाम देते हैं। सच पूछा जाय तो कुण्डलिनी साधना या आतंरिक रूपांतरण और जागरण की वैज्ञानिक प्रक्रिया है।

         कुण्डलिनी-योगतंत्र की यात्रा सप्त शरीर सप्त चक्रों के भेदन की यात्रा है। इस यात्रा में प्रथम चार शरीर और चार चक्र की साधना को ‘बिन्दु- साधना’ कहते हैं। इसलिए कि प्रथम चार शरीर और चार चक्र की साधना का आधार एकमात्र ‘बिन्दु’ होता है। बिन्दु का मतलब है….. ‘शुक्र’ या ‘रज’। उसके बाद साधना का आधार होती है आत्मा।

    ” पंचकोष उन तत्वों के कोष हैं जिनके द्वारा सप्त शरीरों का निर्माण होता है। अन्नमय कोष का सारांश वीर्य, शुक्र धातु या शुक्रबिन्दु और राजोबिन्दु है। प्राणमय कोष का सारांश ओजस, तेज, कान्ति, आभा, लावण्य, प्राण आदि है। इसी प्रकार मनोमय कोष का सारांश मनस्तत्व या मन है। अन्नमय कोष से स्थूल शरीर और वासना शरीर का, प्राणमय कोष से सूक्ष्म शरीर का, मनोमय कोष से मनः शरीर का, विज्ञानमय कोष से आत्मशरीर का और आनन्दमय कोष से ब्रह्म शरीर या ब्रह्माण्ड शरीर का निर्माण होता है।

      कुण्डलिनी-योगतंत्र के अनुसार शुक्रबिन्दु पुरुष तत्व है और रजो बिन्दु स्त्री तत्व है। शिव और शक्ति विश्व के मूलाधार तत्व हैं। शिवतत्व और शक्तितत्व का पर्याय पुरुषतत्व और स्त्रीतत्व है। शिवतत्व शक्तितत्व के साथ सामंजस्य स्थापित करता है तो ‘बिन्दुरूप’ धारण करता है। इसी प्रकार शक्तितत्व शिवतत्व से सामंजस्य स्थापित करता है तो ‘नादरूप’ धारण करता है। आगे बिन्दु और नाद आपस में संयुक्त होकर मिश्रित रूप धारण करते हैं। इसी मिश्रित रूप का नाम “काम” है। यह मिश्रित रूप देवपरक और देवीपरक दोनों है। इसमें दोनों तत्वों का तादात्म्य है।

      शिव तत्व का वर्ण श्वेत है और शक्ति तत्व का वर्ण रक्त (लाल) है। इन दोनों वर्ण बिन्दुओं के मिश्रित रूप को “कला” की संज्ञा दी गयी है। पुनः इन वर्ण बिन्दुओं के साथ उस मिश्र बिन्दु की संयुक्ति से एक अति विलक्षण तत्व की रचना होती है जिसे  “कामकला” कहते हैं। इस प्रकार इन चार प्रकार की शक्तियों से सृष्टि आरम्भ होती है। इस सम्बन्ध में कवि कालिदास का एक श्लोक अत्यन्त मार्मिक है-

   वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।

 जगतः पितरौ बन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।।

       अर्थात वाक (वाणी) और उसके अर्थ की प्रतिपत्ति (उत्पत्ति) के लिए उसी प्रकार संयुक्ति आवश्यक है जिस प्रकार पार्वती और शिव अर्धनारीश्वर की भाँती सँयुक्त हैं। जैसे पुरुष तत्व से स्त्री तत्व को अलग नहीं किया जा सकता है, उसी प्रकार शब्द से भी अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता। यह अभेद होना ही ही ‘अद्वैत’ है।

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