शशिकांत गुप्ते
सिगड़ी पर रखे केटली में भरा हुआ पानी गरम हुआ,पानी गर्म होने से भाप बनी,भाप के कारण केटली का ढक्कन ऊपर नीचे होने लगा, यह देख एक वैज्ञानिक ने भाप की शक्ति को भांप लिया।
सम्भवतः ढ वर्णाक्षर से ढक्कन शब्द की खोज भाप की शक्ति को भांपने के पूर्व हुई होगी? यह प्रश्न भाषाविदों पर छोड़ना उचित होगा?
ढ वर्णाक्षर व्यंजन है। ढ से ढपली, ढक्कन, और ढाक मतलब पलाश भी होता है। पलाश एक वृक्ष है,इसके पत्तों से पत्तल और दोने बनाए जातें हैं। दोने की सतह यदि समतल नहीं होती है तो दोने में परोसा हुआ रायता फैलता है।
ढाक शब्द का कुश्ती के खेल में भी प्रयोग होता है। कुश्ती के मुकाबले में उपयोग में आने वाले दांव को भी ढाक कहतें हैं।
बहरहाल मुद्दा है, ढक्कन और भाप का है। यदि भाप की शक्ति को वैज्ञानिक ने भांपा नहीं होता तो हमारे लिए लोह पथ गामिनी(रेल) में यात्रा करना असंभव था।
वैज्ञानिकों का कर्म खोज करना है।
उपर्युक्त भूमिका बनाने के पीछे तात्पर्य यही है कि हरक्षेत्र में वैज्ञानिक खोज करतें रहतें हैं।
क्या कोई ऐसी खोज हो सकती है। जिससे आदमी स्वयं के अंदर छिपे इंसान को खोज सके?
चिंतकों का कहना है कि,अपने अंदर के इंसान की खोज के लिए किसी वैज्ञानिक की आवश्यकता ही नहीं है।
सन 1963 में प्रदर्शित फ़िल्म कण कण में भगवान के इस गीत की पंक्तियों को ध्यान से सुने और इस भजन रूपी गीत के भावार्थ को गहराई से समझने की कोशिश करेंगे तो स्वाभाविक ही खोज हो जाएगी। यह गीत लिखा है,गीतकार भरत व्यासजी ने।
नदिया ना पिए कभी अपना जल, वृक्ष ना खाए कभी अपने फल
अपने तन का मन का धन का दूजों को दे जो दान है,
वो सच्चा इंसान, अरे इस धरती का भगवन है
धर्म है जिस का भगवत गीता, सेवा वेद कुरान है,
वो सच्चा इंसान, अरे इस धरती का भगवन है
चाहे कोई गुण गान करे, चाहे करे निंदा कोई
फूलों से कोई सत्कार करे, कांटे चुभो जाए कोई
मान और अपमान ही दोनों, जिसके लिए सामान है,
आदमी में इंसान की खोज के लिए मानस पटल पर जो संकीर्णता का ढक्कन रखा गया है,उसे खोलना पड़ेगा। खोज पूरी हो जाएगी।
इस संदर्भ में प्रसिद्ध शायर अकबर इलाहाबादी
का यह शेर याद आता है
मजहबी बहस मैंने की ही नहीं
फ़ालतू अक़्ल थी ही नहीं
अपने अंदर के इंसान को खोजने के पूर्ण यह शेर भी पढ़ लिया जाए।
प्रख्यात सहाय बशीर बद्र का यह शेर है।
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
किसी विचारक ने साधारण भाषा में क्या खूब कहा है।
इंसानियत तो हमने ब्लड बैंक से सीखी साहब
जहाँ बोतलों पर मजहब लिखा नहीं होता
खोज आसान है सिर्फ आदमी को अपनी सोच व्यापक बनाना है। आदमी को इंसान होने का एहसास खुद में जगाना है। इंसानियत अपने आप जाग जाएगी।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

