डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’
आज जब यूक्रेन में संकट आने पर नागरिकों को शस्त्र बांटे जा रहे है, तब सामान्य जन के मानस में एक सवाल कौंधता है कि जिन्हें हथियार बांटे जा रहे हैं वे उन्हें सही तरीके से पकड़ने में भी सक्षम हैं या संकट के समय और संकट खड़ा करेंगे। लोगों में जज्बा है, उत्साह है, देशभक्ति है, साधन भी हैं, लेकिन यदि वह साधन उपयोग करना न आये तो सारे प्रयास निर्रथक हो जाते हैं। किसी एक के संकटकाल की परिस्थितियों से दूसरे अवश्य सबक लेते हैं। यूक्रेन के लोगों को हथियार वितरित करता देख मुझे छात्रजीवन के वे पल याद आ गये जब वाराणसी में हमें नगर पालिका द्वारा अग्नि-समन-सेवा की ट्रेनिंग दी जाती थी और उस अवधि का मानदेश भी दिया जाता था। यदि यूक्रेन में वर्तमान आपात स्थितियों की सोच रखते हुए उपयुक्त नागरिकों को शस्त्र चलाने की एक सप्ताह की भी ट्रेनिंग दी होती तो मंजर कुछ तो अलग होता।
दुनिया में केवल भारत के पास लाखों की संख्या वाली द्वितीय स्तर की सेना है, जिसे अधिकतर लोग केवल झंडा लगाकर खेल खेलने वाला संगठन समझते हैं, वह है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ। संघ हमारी सेना के बाद द्वितीय स्तर का कर्मठ और देशभक्त स्वयंसेवकों-रूप सैनिकों वाला लाखों की सदस्य संख्या युक्त सबसे बड़ा संगठन है, जो केवल एक घंटे की अल्पावधि की सूचना पर किसी भी आपातकालीन मोर्चे पर तैनात हो सकता है। इसकी शक्ति और खूबी को संघ के पदाधिकारियों के अतिरिक्त कुछ बुद्धिजीवी और वरिष्ठ राजनैतिक नेतागण समझते हैं। संबंधित पार्टी की विचारधारा से मेल नहीं खाने वाले नेतागणों की मजबूरी रहती है कि यदा-कदा इस संगठन की आलोचना करना पड़ती है।
संघ के स्वयंसेवकों को दण्ड और तलवार चलाना सिखाया जाता है, अन्य अस्त्र संचालन की हमारा कानून अनुमति नहीं देता। संघ की स्थापना-काल सन् 1925 में तलवारबाजी का महत्व रहा होगा, वर्तमान में उसका महत्व अधिक नहीं रह गया है। यदि हम अपने देश का हित चाहते हैं और किसी बाहरी संकट-काल में सेना के अतिरिक्त या सेना के सहयोग के लिए द्वितीय पंक्ति के सैनिकों के योद्धाओं की आवश्यकता समझते हैं तो इन लाखों स्वयंसेवकों को सेना के अस्त्र-संचालन की ट्रेनिंग की सुविधा भी देना चाहिए। संघ के स्वयंसेवको को केवल अभ्यास के समय के लिए खड्ग उपलब्ध कराया जाता है, शेष समय वह भण्डार में रखा होता है। राइफल की भी व्यवस्था इसी तरह की जा सकती है, आखिर होमगार्ड को सरकार तैयार करती ही है।
संघ सबसे बड़ा और सर्वाधिक अनुशासित संगठन है। किसी कार्यक्रम स्थल के बाहर जूते उतरे हुए देखकर लोग समझ जाते हैं कि एक पंक्ति में व्यवस्थित जूते रखें हैं, इसका मतलब संघ का कार्यक्रम चल रहा है। इन स्वयंसेवकों का सूचना तंत्र इतना तगड़ा है कि जब मोबाइल क्या टेलीफोन भी गिने-चुने लोगों के पास होता था तब भी एक-डेढ़ घंटे की अल्पावधि की सूचना में हजारों की संख्या में एकत्रित हो जाते थे। आज के मोबाइल के समय की तो बात ही अलग है। अभी इनके अधिकारियों से पूछा जाय कि तत्काल गिनती करके बतायें- देश में कुल कितने नियमित स्वयंसेवक हैं? हमें 10 मिनिट में बिलकुल सटीक संख्या मिल जायेगी। किसी कार्यक्रम में लाखों स्वयंसेवक हों, केवल दो मिनिट में उपस्थिति की सही संख्या मिल जायेगी, न एक कम, न एक ज्यादा। इस संगठन में पहले महिलाओं का प्रवेश नहीं था, अब महिलाओं को भी सम्मिलित किया जाता है। ऐसे संगठनों को हमें आज के संदर्भों में योग्य, सुदृढ़ और शक्तिशाली बनाना होगा, जिससे आपातकाल में उचित सेवा ली जा सके।
22/2, रामगंज, जिन्सी, इन्दौर

