शशिकांत गुप्ते
क्रांतिकारियों का कहना है कि, धारा के विपरीत चलना साहस का काम है। यहाँ धारा से तात्पर्य है।
दकियानूसी और अलोकतांत्रिक सोच,साथ ही यथास्थितिवाद से।
क्रांतिकारियों का कहना है कि, धारा के साथ तो तिनका भी बह जाता है।
इतना लिख ही पाया था,उसी समय सीतारामजी का आगमन हुआ,पूछने लगे आज क्या लिख रहे हो।
मैने जो लिखा वह बताया तो कहने लगे इनदिनों कानूनी धाराओं का उल्लंघन करने वालों के लिए कहावत वाले सँया ज्यादा ही कोतवाल हो रहें है। नीति को साइड में रख कर एक राज की बात बताता हूँ।
मैने कहा इनदिनों नीति तो गायब ही है,सिर्फ राज ही राज है। सत्ता प्राप्त करने का राज भी इविम मशीन में छुपा है। ऐसा कुछ लोगों का आरोप है।
सीतारामजी ने मेरी बात सुनकर अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि, कानूनी धारा को तोड़ने वाले प्रायः तीन सौ और एक सौ बीस नंबर का जर्दा पान में डलवाकर पान भी चार सौ बीस का ही खातें हैं। जैसा आहार वैसा ही विचार।
मैने कहा सिर्फ कानूनी धारा का उल्लंघन ही करतें हैं,कानूनी धाराओं को तोड़ने वालें माहिर आदमियों के भी रसूखदार आदमी होतें हैं। जब से मोबाइल आया है तब से तो बहुत ही आसान हो गया है। शान से कानून तोड़ते ही किसी कानून के रक्षक पुलिस कर्मी ने रोकने की कोशिश की तो,मोबाइल पर बात हो जाती है।
दूसरी ओर से रसूखदार की बहुत ही गर्व के साथ कहा जाता है, अपना ही आदमी है छोड़ दो।
मैने कहा ये कानून की धारा तोड़ने वाले ना सिर्फ कानून ही तोड़तें हैं,बल्कि नदियों की बहती धारा को रोक कर नदियों के साहिल पर आशियानें भी शामियानों की तरह खड़े कर देतें हैं।
इन आशियानों में ठहरने की व्यवस्था होती है। इन्हें लॉज कहतें हैं। ऐसे कृत्य करने वालों के जहन में लाज तो होती ही है।
जिस किसी नदी के किनारों पर उक्त निर्माण कार्य होता है,वह नदी जब अपना रौद्ररूप दिखती है। तब यह कहावत चरितार्थ होती है,हम तो डूबेंगे सनम तुम्हे भी ले डूबेंगे।
डूबने वाले सम्भवतः पुण्यवान होतें होंगे कारण वे अपने परिजनों को अंतक्रिया का अवसर देतें ही नहीं हैं,सीधे जल समाधि ही ले लेतें हैं। ऐसी लोगों की आत्मा फिल्मी गीत की ये पंक्तियां गुनगुनाती है।
दिखला के किनारा हमें मल्लाह ने लूटा
कश्ती भी गई हाथ से पतवार भी छुटा
जो विचारक,चिंतक होतें हैं वे सच में यथास्थितिवादी धारा के विपरीत चलतें हैं।
ऐसे लोगों के लिए शायर जनाब
हनीफ़ साजिद फरमातें हैं।
इंकलाब-ए-सुबह की कुछ कम नहीं है दलील
पत्थरों को भी दे रहें हैं आईने खुल कर जवाब
धारा के विपरीत चलने वालों के लिए किसी अज्ञात शायर ने कहा है।
दुनिया में वही शख़्स है ताज़ीम के क़ाबिल
जिद शख़्स ने हालात का रूख़ मोड़ दिया हो
(ताज़ीम का मतलब सन्मान)
इनदिनों दुर्भाग्य से कानून की धारा का उल्लंघन करने वालों का सन्मान हो रहा है,ऐसे लोग को संस्कारित होने का तमगा दिया जा रहा है।
सीतारामजी ने कहा समय को ध्यान में रखते हुए चर्चा को विराम देना ही उचित होगा।
रामजी का नाम लो सब ठीक होगा।
राम राम जी कहते हुए सीतारामजी ने निम्न दोहा सुनाया।
कानूनी धारा सब कोई जाने,
पर धारा पर चले न कोई।
जो तोड़े धाराओं को,
समाज में रसूखदार होए सोई
शशिकांत गुप्ते इंदौर

