शशिकांत गुप्ते
गीतकार आनंद बक्षी रचित निम्न पंक्तियों का स्मरण हुआ
सच्चाई छुप नहीं सकती, बनावट के उसूलों से
कि खुशबू आ नहीं सकती, कभी कागज़ के फूलों से
इन पंक्तियों में सैद्धांतिक कथन हैं। सैद्धांतिक कथन सिर्फ ग्रंथो और किताबों में कैद होकर रह गया हैं।
वास्तव में सच्चाई का सामना करने के बजाए, सच्चाई से मुंह मोड़ना और सच्चाई पर पर्दा डालकर सच्चाई को छिपाया जाता है।
गीतकार इंदीवरजी रचित ये पंक्तियां आज प्रासंगिक हैं।
देते हैं भगवान को धोखा
इन्सां को क्या छोड़ेंगे
काम अगर ये हिन्दू का है
मंदिर किसने लूटा है
मुस्लिम का है काम अगर ये
खुदा का घर क्यूँ टूटा है
जिस मज़हब में जायज़ है ये
वो मज़हब तो झूठा है”
आश्चर्य तो इस बात का है मध्यप्रदेश की व्यापारीक राजधानी कहलाने वाली अहिल्या की नगरी जिसने स्वच्छता में कीर्तिमान स्थापित किया ऐसे महान नगर के प्रतिनिधि पांच लाख मतों से विजयी हुए हैं। इसी नगर में लगभग चालीस लोग लापरवाही का शिकार होकर स्वर्गीय हो गए?
सबसे बड़ा आश्चर्य “अ”वेध तरीके भगवान का मंदिर निर्मित किया गया। जहां फुलवारी में फूलों की खुशबू फैलना चाहिए,वहां शोकाकुल लोगों के रूदन की चीख सुनाई दी।
आश्चर्य गुजरात के मोरबी में भी मच्छू नदी पर झूलता पुल जंग लगे लोहे के कमजोर होने से टूटा था। 141 लोगों को जल समाधि का पुण्य मिला था।
केदारनाथ के घटना की भी विस्मृति नहीं होती है।
आश्चर्य इतना सब होने के बाद कीचड़ में फलने फूलने वाला गुल खिल ही रहा है?
अब व्यंग्यकारों का दायित्व है वे अपने व्यंग्य में हास्य पैदा करने के बजाए,लोगों में दूषित व्यवस्था के विरुद्ध में आक्रोश पैदा करें।
उपर्युक्त हादसे के बाद सन 1954 प्रदर्शित फिल्म नास्तिक के गीत की निम्न पंक्तियां एकदम सटीक और प्रासंगिक हैं।
इस गीत लिखा है गीतकार प्रदीपजी और स्वरबद्ध भी किया है।
गीत की पंक्तियां प्रस्तुत है।
राम के भक्त,रहीम के बन्दे,रचते आज फरेब के फंदे,
कितने ये मक्कार ये अंधे,देख लिए इनके भी धंधे,
इन्हीं की काली करतूतों से हुआ ये मुल्क मशान,
कितना बदल गया इंसान..कितना बदल गया इंसान ||
आज प्रदीप जीवित होते तो निश्चित ही सच बोलने की सजा पाते।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

