संजय शर्मा
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने बीज विधेयक 2025 को जनता की राय के लिए जारी किया है. इसे संसद के आने वाले बजट सत्र में पेश किए जाने की संभावना है. यह विधेयक 1966 के बीज अधिनियम और 1983 के बीज (नियंत्रण) आदेश की जगह लेगा. 1966 का बीज अधिनियम हरित क्रांति के दौर में बनाया गया था, जब बीजों की गुणवत्ता, उत्पादन और आपूर्ति सुनिश्चित करना मुख्य रूप से सरकार की जिम्मेदारी मानी जाती थी. लेकिन नए मसौदा विधेयक में बीजों के उत्पादन और बिक्री के लिए जो कानूनी ढांचा पेश किया गया है, वह किसानों की बीज संप्रभुता और आजीविका से जुड़े जायज सवालों को नजरअंदाज करता है.
हालांकि जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी लगातार घट रही है, फिर भी देश की बहुसंख्य आबादी आज भी खेती पर निर्भर है. कृषि केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि भारतीय समाज की जीवन-शैली और संस्कृति का अहम हिस्सा है. इसके बावजूद यह ड्राफ्ट बिल किसानों को मुख्य हितधारक मानने के बजाय चालाकी से उन्हें केवल बीजों का उपभोक्ता बना देता है. इस मसौदा विधेयक में किसानों के इस अधिकार को तो मान्यता दी गई है कि वे अपने खेत के बीज को उगा सकते हैं, बो सकते हैं, फिर से बो सकते हैं, बचा सकते हैं, इस्तेमाल कर सकते हैं, अदला-बदली कर सकते हैं, साझा कर सकते हैं या बेच सकते हैं, लेकिन साथ ही बड़े बीज निगमों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत के बीज और बीज बाजार पर नियंत्रण का खुला रास्ता भी दे दिया गया है.
इस प्रस्तावित कानून के तहत ग्रामीण समुदायों और बीज संरक्षण से जुड़े कई गैर-सरकारी प्रयासों जैसे एफपीओ, एनजीओ और स्थानीय बीज समूहों को भी पंजीकरण कराना होगा. ये पहलें देसी किस्मों को बचाने और जैव-विविधता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती रही हैं. लेकिन नया विधेयक इन्हें व्यावसायिक बीज कंपनियों के बराबर रख देता है, जिससे इनके सामाजिक और सामुदायिक चरित्र को नजरअंदाज किया जाता है.
यह मसौदा विधेयक यह भी अनिवार्य करता है कि बिक्री के लिए रखे जाने वाले सभी बीजों का पंजीकरण ‘खेती और उपयोग मूल्य’ यानी वीसीयू परीक्षणों के आधार पर किया जाए, जो कई जगहों पर किए जाएंगे. इसे गुणवत्ता सुनिश्चित करने के नाम पर पेश किया जा रहा है, लेकिन यह शर्त बेहद खतरनाक है. स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कई देसी और जैविक रूप से विविध किस्में, जो अपने इलाके की जलवायु के अनुकूल हैं और जिनकी पहचान स्वाद, खुशबू और पोषण जैसी खासियतों से है, ऐसे मानकीकृत परीक्षणों में फेल हो सकती हैं. इसका नतीजा यह होगा कि ये किस्में कानूनी तौर पर बाजार से बाहर हो जाएंगी, जैव-विविधता को नुकसान पहुंचेगा और किसानों की बीज पर स्वायत्तता और भी कमजोर होगी.
किसानों और ग्रामीण समुदायों के इस बुनियादी अधिकार को कि वे अपने बीज बिना ज्यादा सरकारी दखल और कॉरपोरेट नियंत्रण के बचा सकें, इस्तेमाल कर सकें, आपस में बांट सकें और बेच सकें – इस मसौदा विधेयक में हाशिये पर धकेल दिया गया है. बीजों को जैव-विविधता और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए साझा विरासत मानने के बजाय, उन्हें केवल एक बाजारी वस्तु माना गया है, जिस पर बेचने वाली कंपनियों के बौद्धिक संपदा और मालिकाना अधिकार होते हैं. प्रस्तावित मसौदा व्यावसायिक बीज बाजार के नियमन का ऐसा ढांचा देता है, जो बीज बाजार पर एकाधिकार जमाने वाली कंपनियों के हितों को प्राथमिकता देता है.
कृषि राज्य सूची का विषय है और मौजूदा 1966 का बीज अधिनियम सभी राज्यों के प्रतिनिधित्व के साथ एक केंद्रीय बीज समिति का प्रावधान करता है. वैज्ञानिक, तकनीकी, राजनीतिक और सामाजिक बदलावों को देखते हुए कानून में संशोधन की जरूरत से कोई इनकार नहीं है. लेकिन यह भी सच्चाई है कि सरकार द्वारा गठित एक समीक्षा समूह ने 1995 में ही राष्ट्रीय बीज बोर्ड बनाने का सुझाव दिया था. इसके बावजूद नया मसौदा एक ऐसी केंद्रीय बीज समिति का प्रस्ताव करता है, जिस पर नौकरशाही का दबदबा होगा और राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व महज नाममात्र का रहेगा. सभी राज्यों को पांच बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में बांट दिया गया है. इस समिति को बीजों की योजना, उत्पादन, भंडारण, प्रसंस्करण, निर्यात-आयात समेत तमाम फैसले लेने का अधिकार होगा. यही समिति पंजीकरण, प्रमाणन और परीक्षण के मानक भी तय करेगी
राज्य स्तर पर राज्य बीज समितियों का प्रावधान जरूर किया गया है, जो राज्य की बीज किस्मों के पंजीकरण को देख सकती हैं और बीज उत्पादकों, विक्रेताओं व वितरकों के पंजीकरण पर राज्य सरकारों को सलाह दे सकती हैं. ये समितियां अपने-अपने राज्यों में बीजों की बिक्री, भंडारण और कीमतों की निगरानी भी करेंगी.
बाजार में बिकने वाले हर बीज को वीसीयू यानी खेती और उपयोग मूल्य के परीक्षण के बाद पंजीकृत करना अनिवार्य होगा. अभी तक ऐसे परीक्षण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि विश्वविद्यालयों और इसी तरह की संस्थाओं द्वारा किए जाते हैं. लेकिन ड्राफ्ट बिल में अब ‘अन्य संगठनों’ को भी शामिल किया गया है, जो तय पात्रता शर्तें पूरी करते हों. यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि निजी कंपनियों के लिए निजी संस्थानों को प्रभावित करना कहीं ज्यादा आसान होता है. इतना ही नहीं, मसौदा विधेयक भारत से बाहर स्थित किसी भी संगठन को वीसीयू परीक्षण करने की मान्यता देने का प्रस्ताव करता है. इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को गुणवत्ता मानकों से छेड़छाड़ करने की खुली छूट मिल जाएगी. बिना भारतीय जमीन पर परीक्षण किए विदेशी धरती पर हुए परीक्षणों को मान्यता देना देश की पारिस्थितिकी के लिए भी खतरा पैदा करता है.
‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर यह मसौदा विधेयक कई राज्यों में काम करने वाली कंपनियों के लिए केंद्रीय मान्यता प्रणाली का प्रावधान करता है. ऐसी मान्यता प्राप्त कंपनियों को अपने आप राज्य रजिस्टर में पंजीकृत मान लिया जाएगा. उनके पंजीकरण आवेदन को तकनीकी, वित्तीय या बुनियादी ढांचे के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकेगा. इसके उलट, गैर-मान्यता प्राप्त बीज उत्पादकों, यानी छोटे बीज उत्पादकों को तमाम तकनीकी, वित्तीय और ढांचागत शर्तें पूरी करनी होंगी.
किसानों को अच्छे बीज उपलब्ध कराने के नाम पर लाया गया यह विधेयक, बीजों की कीमतों को काबू में रखने के लिए कोई ठोस व्यवस्था तक नहीं करता. सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि बीज कंपनियां मनमानी और लूट की कीमतें न वसूल सकें. लेकिन बिल में सिर्फ इतना कहा गया है कि केंद्र सरकार ‘आपात स्थितियों’ में बीजों की बिक्री कीमत को नियंत्रित कर सकती है – जैसे बीजों की कमी, कीमतों में असामान्य बढ़ोतरी, एकाधिकार या मुनाफाखोरी की स्थिति में. यह प्रावधान बेहद नाकाफी है और साफ तौर पर बड़ी बीज कंपनियों के हित में झुका हुआ है.
अगर किसान द्वारा खरीदे गए बीज वादा के मुताबिक फसल नहीं दें, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? अलग-अलग राज्यों से घटिया या खराब बीजों की बिक्री की शिकायतें आम हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में किसानों को आज तक कोई मुआवजा नहीं मिला है. इस गंभीर खामी को दूर करने के लिए इस विधेयक में किसानों के लिए मुआवजे की एक साफ, तर्कसंगत और प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए थी. लेकिन किसी मजबूत कानूनी ढांचे के अभाव में कंपनियां फसल बर्बादी का सारा दोष किसानों पर ही डाल देती हैं.
यह मसौदा इस संवेदनशील मुद्दे पर लगभग खामोश है. इसमें मुआवजे की कोई व्यवस्था नहीं है, बल्कि सिर्फ सजा का प्रावधान रखा गया है. नकली या घटिया बीज बेचने पर दस लाख रुपये तक का जुर्माना और बार-बार अपराध करने पर इसे दोगुना या तिगुना करने की बात कही गई है. लेकिन बड़ी बीज कंपनियों के लिए दस या तीस लाख रुपये कोई बड़ी रकम नहीं है. यह न तो उनके लिए डर पैदा करता है और न ही उन्हें जवाबदेह बनाता है.
मुआवजे की स्पष्ट व्यवस्था न होने की वजह से किसान उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत लंबी, जटिल और समय लेने वाली कानूनी प्रक्रिया में फंसने को मजबूर होते हैं. वहीं दूसरी ओर, बीज नाकामी के मामलों में सख्त दंडात्मक प्रावधान न होने से यह विधेयक एक तरफ कॉरपोरेट जवाबदेही को कमजोर करता है और दूसरी तरफ किसानों पर जोखिम बढ़ा देता है, जिससे उनकी स्वायत्तता और आजीविका दोनों खतरे में पड़ जाती हैं.
यह विधेयक पौध किस्मों और किसानों के अधिकार संरक्षण अधिनियम (पीपीवीएफआर एक्ट), 2001 के कई प्रावधानों को या तो कमजोर करता है या उन्हें दरकिनार कर देता है, जिनमें किसानों को मुआवजा देने से जुड़ा प्रावधान भी शामिल है.
मसौदा विधेयक में केंद्रीय बीज पोर्टल (साथी) के जरिए डिजिटल ट्रेसबिलिटी और हर बीज पैकेट पर अनिवार्य क्यूआर कोड लगाने का प्रावधान किया गया है. बिना किसी सरकारी सहायता व्यवस्था के, यह प्रावधान छोटे बीज उत्पादकों, एफपीओ और ग्रामीण समुदायों के बीज संरक्षकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालता है और उन्हें असमान स्थिति में खड़ा कर देता है.
कुल मिलाकर, निजी बीज कंपनियों को नियंत्रित करके किसानों के हितों की रक्षा करने के बजाय यह विधेयक मूल रूप से किसानों के अपने बीजों और खेती पर अधिकारों पर हमला करता है.

