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वतन को बेचने वाले

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मुनेश त्यागी

गुनाहों को छिपाते हैं
कई चेहरे लगाते हैं
वतन को बेचने वाले।

कई नारे लगाते हैं
ना वादे ही निभाते हैं
वतन को बेचने वाले।

जनता को घुमाते हैं
बेगुनाहों को फंसाते हैं
वतन को बेचने वाले।

बेरोजगारों को रुलाते हैं
लुटेरों को बुलाते हैं
वतन को बेचने वाले।

नजरें भी चुराते हैं
अब तो आंखें दिखाते हैं
वतन को बेचने वाले।

गुनाहों को छुपाते हैं
कई चेहरे लगाते हैं
वतन को बेचने वाले।

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