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बेमतलब की दहशत …..!

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आर के जैन
कुछ हमारे हिंदू भाई बहुत ज़्यादा दहशत में हैं कि यदि अमुक दल की सरकार देश और प्रदेश में नहीं रहेगी तो उन्हें जबरन मुसलमान बना दिया जायेगा और पाकिस्तान भारत पर क़ब्ज़ा कर लेगा और बहन बेटियाँ ‘ लव जिहाद’ में फँस जायेगी ।यह दहशत इतनी ज़्यादा है कि यह लोग सब दुश्वारियाँ भूल कर सरकार की हर नीति , हर कार्यवाही का ऑख बंद कर समर्थन करने के लिये विवश है। यह दहशत हर वर्ग बुद्धिजीवियों, गृहणियों, और नौजवानो में सबमे है।
मैं यह डर देखकर हैरान और परेशान होता हूँ कि आख़िर इनकी सोच को हो क्या गया है ? यह डर और दहशत किस मनों विकार से पैदा हुआ है ? हमारी सभ्यता और संस्कृति तो कभी डर की नहीं रही। हमारे सनातन धर्म या अन्य जुड़े हुए धर्मों पर ख़तरा तो उन 500 सालों में तब भी नहीं रहा जब देश में मुस्लिम बादशाहत रही थी।
भारत में मुस्लिम धर्मावलंबी 14.5% है और ईसाई लगभग 2.5% है तो इनसे हिंदू समाज को ख़तरा कैसे हो सकता है ? ब्रिटिश राज व आज़ादी के बाद भी कभी जबरन धर्म परिवर्तन के मामले भी कभी सामने नहीं आये। आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों ने सेवा व कल्याण का जो कार्य किया है , उससे प्रभावित होकर ज़रूर वह ईसाई बने है। हमारी वर्ण व्यवस्था व छूआछूत से नारकीय जीवन बिता रहे छोटी जाति के लोगों ने यदि उन्होंने धर्म परिवर्तन किया है तो इसमें आपत्ति क्या है? जब तक समाज में असमानता या वर्ण व्यवस्था रहेगी तो धर्म परिवर्तन को कोई कैसे रोक सकता है?
धर्म को ख़तरा स्वयं उसके अनुयायियों से होता है ।यदि व्यक्ति या समाज अपने धर्म पर अडिग रहता है और उसके अनुरूप आचरण करता है तो कोई ताक़त उसका जबरन धर्मांतरण नहीं करा सकती।
कहने का मतलब यही है कि जो लोग धर्मांतरण के काल्पनिक भय से डर व दहशत में हैं वह निराधार व हास्यास्पद है। आप किसी भी राजनितिक विचारधारा के हो इसपर सवाल नहीं है पर यदि आप सिर्फ़ डर या दहशत से किसी का आँख बंद कर समर्थन करते है तो यह सही नहीं है। जब अल्पसंख्यकों  को अपने धर्म पर कोई ख़तरा नज़र नहीं आता तो बहुसंख्यकों का धर्म के प्रति डर उनकी मानसिक कमजोरी को प्रकट करता है। 
हम एक महान देश के नागरिक हैं और हमें आगे बढ़ते रहना है ।हमे अपने प्यारे खूबसूरत देश को विश्व का सबसे विकसित और सुंदर देश बनाना है तो नफ़रत और विद्वेष को छोड़कर खुले दिमाग़ और बड़े दिल का बनना होगा। बंद दरवाज़ों व खिड़कियों से ताजी हवा नहीं आती।

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