निर्मल कुमार शर्मा,
भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फाँसी की !
यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे
बम्ब सम्ब की छोड़ो, भाषण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
काँग्रेस का हुक्म ज़रूरत क्या वारंट तलाशी की !
मत समझो, पूजे जाओगे, क्योंकि लड़े थे दुश्मन से,
रुत ऐसी है आँख लड़ी है अब दिल्ली की लंदन से,
कामनवैल्थ कुटुम्ब देश को खींच रहा है मंतर से
प्रेम विभोर हुए नेतागण, नीरा बरसी अंबर से,
भोगी हुए वियोगी, दुनिया बदल गई बनवासी की !
गढ़वाली जिसने अँग्रेज़ी शासन से विद्रोह किया,
महाक्रान्ति के दूत जिन्होंने नहीं जान का मोह किया,
अब भी जेलों में सड़ते हैं, न्यू-माडल आज़ादी है,
बैठ गए हैं काले, पर गोरे ज़ुल्मों की गादी है,
वही रीति है, वही नीति है, गोरे सत्यानाशी की !
सत्य अहिंसा का शासन है, राम-राज्य फिर आया है,
भेड़-भेड़िए एक घाट हैं, सब ईश्वर की माया है !
शान्ति सुरक्षा की ख़ातिर हर हिम्मतवर से डरना है
पहनेगी हथकड़ी भवानी रानी लक्ष्मी झाँसी की ! ‘

उक्त कविता कवि शैलेन्द्र ने स्वतंत्रता के कुछ ही महीनों बाद भारत के देशी नये शासकों के रंग-ढंग और यहाँ की जनता की बदहाली को देखकर बहुत व्यथित होकर 1948 में लिखे थे ! देश की स्वतंत्रता के बाद हमारे देश के आमजन, छोटे दुकानदारों,मजदूरों,किसानों आदि की हालत उत्तरोत्तर ही खराब और बद से बदतर होती चली गई है । 23 मार्च 1931को ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों ने शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह और उनके अन्य दो साथियों को बगैर ट्रायल पूरा किए ही आनन-फानन में फाँसी पर लटका दिए थे,क्योंकि ब्रिटिशसाम्राज्य-वादियों को शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह की आवाज़ को किसी भी तरह से जल्दी से जल्दी शांत कर देना था, क्योंकि ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों की नजरों में शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह उस समय कथित रूप से ‘सबसे बड़े देशद्रोही या राष्ट्रद्रोही ‘थे,वे तत्कालीन ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों द्वारा शासित भारतीय राष्ट्रराज्य के लिए बहुत बड़े खतरे भी थे ?
कुशाग्र बुद्धि शहीद-ए-आजम बनाम आज के भारतीय युवा !
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फाँसी के दिन शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह की उम्र मात्र 23 वर्ष 5 महीनें 25 दिन थी !आज के समय में कल्पना करें कि लगभग साढ़े तेइस साल की उम्र का एक नवयुवक सामान्यतः बिल्कुल अधकचरे ज्ञान से भरा राजनैतिक और सामाजिक समझ के मामले में निहायत मूर्ख ही होता है,लेकिन शहीद-ए-आजम भगत सिंह इतनी सी उम्र में भी बहुत ही गंभीर,संजीदा, चिंतनशील,मननशील और अत्यंत बौद्धिक युवा थे,अपनी फाँसी से कई साल पूर्व से ही वे कानपुर में प्रताप प्रेस से निकलनेवाले दैनिक और साप्ताहिक समाचार पत्र प्रताप,जो अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के सम्पादकत्व में निकलता था,उसमें क्रांतिकारी व इस देश के जागरूक युवा वर्ग के रगों में ब्रिटिश साम्राज्य वादियों के अकथनीय जुल्मों के खिलाफ गर्म रक्त में जोश भर देनेवाले व मस्तिष्क को झंकृत कर देनेवाले तथा इस देश को जो ब्रिटिश साम्राज्य वादियों के गुलामी की जंजीरों में सिसक रहा था, से मुक्ति के लिए जोश भर देनेवाले लेख लिख रहे थे,इस तरह के अलग जगाने वाले वे सैकड़ों लेख लिख चुके थे !
धर्म,ईश्वर आदि और सत्ता का अपवित्र गठजोड़ सदा आम जनता के खिलाफ हुआ है !
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वे अपनी फाँसी लगने से कुछ ही दिनों पूर्व एक व्यक्ति द्वारा उनके ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की विचारधारा की खिल्ली उड़ाते हुए यह कहने पर कि ‘भगत सिंह ! तुम फाँसी पर लटकने के वक्त भगवान को जरूर याद करोगे ‘ के जबाब में उन्होंने ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ ?’एक बहुत ही सुचिंतित,बौद्धिक व लगभग 15 पृष्ठों का एक महत्वपूर्ण लेख लिखा था,जो अभी भी भारत के प्रबुद्ध वर्ग में बड़े ही आदर और सम्मान के साथ पढ़ा जाता है। इस लेख में शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने समाज के कुछ बहुत चालाक व धूर्तों द्वारा अविष्कृत काल्पनिक भगवान के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़े करते हुए,ऐसे-ऐसे अकाट्य,तार्किक व न्यायोचित्त तर्क प्रस्तुत किए हैं,जिसका आज के समय के भी पाखंडी,धूर्त व धार्मिक बने कथित बड़े-बड़े संतों,गुरूओं और शंकराचार्यों के पास कोई सम्यक व न्यायोचित्त जबाब ही नहीं है !
शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह उक्त अतिगंभीर व दार्शनिक लेख लिखने के पूर्व भी इसके अलावे भी बहुत से छोटे-छोटे बहुत ही सारगर्भित, देशहित, समाजहित,संकीर्ण जातिवाद ,धार्मिक जाहिलता के खिलाफ,तत्कालीन सामान्य जन के हितों के खिलाफ नीति बनाने वालों व मंतव्य रखनेवाले राजनैतिक नितिनियंताओं के खिलाफ खूब लेख लिखे हैं, उदाहरणार्थ स्वतंत्रता से पूर्व कांग्रेस की पूँजीवादी व सामंतवादी नीतियों के खिलाफ उन्होंने लिखा है कि ‘समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों और किसानों को उनके प्राथमिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा हिस्सा पूँजीपति हड़प जाते हैं !
वर्ष 1947 में भारत को आजादी नहीं मिली थी,अपितु केवल सत्ता का परिवर्तन हुआ था !
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दूसरों के पेट भरनेवाले अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने को मुहताज हैं। दुनियाभर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करनेवाले बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढकने भर को कपड़ा नहीं पा रहे हैं। सुन्दर महलों का निर्माण करनेवाले राजगीर,लोहार और बढ़ई आदि स्वयं गंदे बाड़ों में रहकर उन्हीं बाड़ों में जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं ! ‘ उन्होंने आगे स्पष्टता और दृढ़तापूर्वक कहा कि ‘मुझे पता है इस देश से ब्रिटिशसाम्राज्यवादी चले जाएंगे,परन्तु यह केवल सत्ता परिवर्तन होगा,व्यवस्था परिवर्तन नहीं होगा ! क्योंकि शोषक गोरे अंग्रेज पूँँजीपतियों की जगह भूरे देसी अंग्रेज पूँजीपति आ जाएंगे, केवल शोषकों का रंग बदल जाएगा,भारतीय मजदूरों, किसानों के शोषण में कतई कमी नहीं आएगी ‘
उन्नीस वर्षीय युवा शहीद-ए-आजम भगत सिंह और उनके साथियों ने 1926 में लाहौर में अपने एक अधिवेशन में एक खुले संगठन के रूप हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन की स्थापना की। पाँच-छः वर्षों तक देशभक्त युवाओं की यह संस्था देशहित व स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिशसाम्राज्य-वादियों के खिलाफ एक संगठन के रूप में बहुत ही सक्रिय रही, लेकिन धीरे-धीरे धूर्त अंग्रेजों द्वारा इसके सारे सदस्यों को विभिन्न मुकदमों में जबर्दस्ती फँसा दिया गया।
कथित ईश्वर के अस्तित्व को ललकारने वाले शहीद-ए-आजम
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शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह अपने कालजयी लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ ? ‘में स्पष्टता और निर्भीकता से धर्म और पाखंड के ठेकेदारों से प्रश्न करते हुए पूछते हैं कि ‘मैं पूछता हूँ,सर्वशक्तिमान होकर भी आपका भगवान अन्याय,अत्याचार,भूख,गरीबी,शोषण,दासता, असमानता,महामारी हिंसा और युद्ध आदि का अंत क्यों नहीं करता ? इन सबको समाप्त करने की शक्ति रखकर भी यदि वह मानवता को इन अभिशापों से मुक्त नहीं करता तो निश्चय ही उसे अच्छा भगवान नहीं कहा जा सकता ! और जनहित में उसका जल्द समाप्त हो जाना ही बेहतर है। ‘ उन्होंने धर्म और कथित ईश्वर पर अपनी बेबाक टिप्पणी करते हुए यहाँ तक कह दिया कि ‘आपका रास्ता अकर्मण्यता का रास्ता है,सब कुछ भगवान के सहारे छोड़ हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाने का रास्ता है,निष्काम कर्म की आड़ में भाग्यवाद की घुट्टी पिलाकर इस देश के नौजवानों को सुला देने का रास्ता है। यह कभी मेरा रास्ता नहीं बन सकता,जो लोग इस जगत को मिथ्या समझते हैं, वे कभी भी इस दुनिया की भलाई नहीं कर सकते और इस देश की आजादी के लिए ईमानदारी से कभी भी नहीं लड़ सकते। ‘
धर्म शोषकों के लिए गरीबों के शोषण का एक हथियार मात्र है !
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शहीद-ए-आजम ने प्रसिद्ध दार्शनिक बर्ट्रेण्ड रसेल के इस बात से पूरी तरह से सहमत थे कि ‘धर्म शोषकों के हाथों में एक औजार है जो अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए जनता के दिल में हमेशा ईश्वर का भय बनाए रखना चाहते हैं, हर धर्म में शासक मतलब राजा के विरूद्ध बगावत को पाप माना गया है,धर्म भय से पैदा हुई एक बीमारी और मानवप्रजाति की अकथनीय दुःखों व तकलीफों का मुख्य श्रोत है,एक भूख से बिलबिलाते खाली पेट वाले व्यक्ति के लिए भोजन ही ईश्वर है। नैतिकता और धर्म उस व्यक्ति के लिए थोथे शब्द मात्र हैं,जो व्यक्ति अपनी आजीविका के जुगाड़ करने के लिए गंदे नाले में खाना ढूंढ़ता है और जाड़े की रात में कड़ाके की शीतलहरी से बचने के लिए सड़कों के किनारे पड़े पीपों में पनाह लेता है ! ‘
पूरी दुनिया हथियारों से लकदक बनाम अहिंसा बनाम भारत की स्वतंत्रता !
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स्वतंत्रता आंदोलन में गाँधीजी द्वारा अपने अहिंसा के बल पर अंग्रेजों की गुलामी से त्रस्त इस देश को आजादी दिलाने के दिवास्वप्न दिखाने पर चुटकी लेते हुए उन्होंने लिखा था ‘अहिंसा भले ही एक नेक आदर्श है,लेकिन वह अतीत की चीज है। जिस स्थिति में आज हम हैं,सिर्फ अहिंसा के बल पर कभी आजादी प्राप्त नहीं कर सकते। आज यह दुनिया सिर से पाँव तक हथियारों से लैस है,लेकिन हम जो गुलाम कौम हैं,हमें ऐसे झूठे सिद्धांतों के जरिए अपने रास्ते से नहीं भटकना चाहिए। ‘ वायसराय की ट्रेन पर हमले के बाद वायसराय और लेडी इरविन के बाल-बाल बच जाने पर गाँधीजी ने उन्हें मित्र की तरह बधाई दी,इस पर भगत सिंह और उनके साथियों ने दलील दी कि ‘मेरठ,लाहौर खड्यंत्र केस और भुसावल केस का मुकदमा चलाने वाले लार्ड इरविन केवल भारत के शत्रुओं के ही मित्र हो सकते हैं ! ‘
गाँधीजी ने एकबार कहा था कि ‘हम अंग्रेजों का अपने अहिंसा के हथियार के बल पर ‘हृदयपरिवर्तन ‘ करा देंगे। ‘ इस पर भगत सिंह और उनके साथियों ने गाँधीजी से प्रतिप्रश्न कर उन्हें बिल्कुल निरूत्तर होने पर मजबूर कर दिया था कि ‘क्या आप बता सकते हैं कि भारत में अब तक कितने शत्रुओं का हृदयपरिवर्तन कराने में आप सफल रहे हैं ? आप कितने ओडायरों,डायरों, रीडिंगों और इर्विनों का हृदयपरिवर्तन कराकर उन्हें भारत का मित्र बना चुके हैं ? अगर उक्त में से एक का भी आपके अहिंसा के बलपर हृदयपरिवर्तन नहीं हुआ तो आपके उस अहिंसा के विचारधारा से कैसे सहमत हुआ जा सकता है कि आप अपने अहिंसा के विचारों से इंग्लैंड को समझाबुझा देंगे कि वह भारत छोड़कर चला जाय और वह भारत को स्वतंत्र कर दे ? ‘ भगतसिंह और उनके साथियों का यह स्पष्ट मत था कि ‘अहिंसा का पागलपन और गाँधीजी की समझौतावादी मानसिकता के कारण ही भारत में वे शक्तियां बिखर गईं,जो देश की स्वतंत्रता की खातिर जनकार्यवाही की खातिर एकजुट हुईं थीं। ‘ शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह और उनके सभी साथियों का यह बिल्कुल स्पष्ट व दृढ़ मत था कि ‘जब तक मनुष्य द्वारा मनुष्य का और एक राष्ट्र द्वारा किसी दूसरे राष्ट्र का शोषण,जिसे साम्राज्यवाद व दूसरे शब्दों में पूँजीवाद कहते हैं, समाप्त नहीं होगा,तब तक पूरी विश्वमानवता को उसके दुःखों और कष्टों से छुटकारा मिल ही नहीं सकता।…और तब तक युद्धों को भी समाप्त करके विश्वशांति की स्थापना करने की बातें महज एक ढोंग और लफ्फाजी के सिवा कुछ भी नहीं है ! ‘
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से अलग-थलग रहनेवालों और अंग्रजों के चाटुकारिता करनेवालों की संतानें शहीद-ए-आजम के सपनों को कितना साकार कर रहीं हैं ?
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इस लेख में शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह और उनके साथियों तथा उन लोगों द्वारा स्थापित ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन ‘ के निष्पृह,निष्पक्ष, आमजनहिताय व इस देश को स्वतंत्र कराने के लिए उनके कुछ विचारों को इसलिए उद्धृत किया गया है कि भारत की आम जनता आज से 91वर्ष पूर्व इस देश की खातिर क्रूर व अमानवीय ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों द्वारा आधे-अधूरे मुकदमें चलाकर फाँसी पर लटका दिए गये शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह और उनके साथियों की इस देश के गरीबों,आमजन,मजदूरों व किसानों के लिए क्या सोच थी,क्या विचारधारा थी ? यक्षप्रश्न है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ काम करने वाले और ब्रिटिश साम्राज्य वादियों की चाटुकारिता करने गद्दारों की आज की संतानें जो वर्तमान समय में भारत की सत्ता पर काबिज हैं,वे शहीद-ए-आजम के सपनों को साकार कर रहीं हैं या बर्बाद,इस पर भी गंभीरता और संजीदगी से विचार किया जाना चाहिए !
कांग्रेसियों और भाजपाइयों के चरित्र में मूलभूत अन्तर !
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देश के स्वतंत्र होने के 75वर्षों बाद भी शहीद -ए-आजम भगत सिंह की कही हुई बातें मोदी के कथित सुशासनकाल में बेशर्मी और ढिठाई से दर्शित हो रही है ! निश्चित रूप से कांग्रेसी भी मोदी से किसी मामले में कमतर नहीं थे,मोदीराज और कांग्रेसी राज में इतना ही अन्तर है कि कांग्रेसी अपने पूंजीपतियों की तरफदारी और पक्षपात करने वाली दुर्नीतियों को जरा पर्दे के पीछे शातिराना तरीके से धीरे-धीरे लागू करते थे ! लेकिन मोदीराज में उक्त वर्णित दुर्नीतियों और आमजनविरोधी नीतियों को अब बेहद बेशर्मी,ढिठाई तथा ठसक के साथ लागू करके मोदी के लंगोटिया यार गौतम अडानी को देश के सभी संसाधनों और सरकारी कंपनियों तक को मुफ्त में रेवड़ी की तरह मुफ्त में बांटा जा रहा है,जिससे इस देश की समस्त आवाम,मजदूरों, किसानों,विद्यार्थियों आदि के मूलभूत हक तक छिनने से उनकी आर्थिक स्थिति भयावह नारकीय बदहाली की तरफ तेजी से जा रही है !
आज इस देश के आमजन, मजदूरों और किसानों की हालात पिछले 60 साल शासन करनेवाली कांग्रेस सरकार और मोदी सरकार में कितनी सुधरी है या कितनी बदतर हुई है ? इस अतिगंभीर मुद्दे पर इस देश के सभी शिक्षित लोगों, यूनिवर्सिटी के छात्रों,बुद्धिजीवियों, विचारकों,साहित्यकारों,कवियों,जागरूकजनों, प्रोफेसरों,डॉक्टरों आदि को एकबार गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए। निश्चित रूप से गंभीरता से सोचने पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचना ही पड़ता है कि शहीद-ए-आजम भगतसिंह द्वारा आज से लगभग 90 वर्ष पूर्व कही गई बातें कि ‘मुझे पता है इस देश से ब्रिटिशसाम्राज्यवादी चले जाएंगे,परन्तु यह केवल सत्ता परिवर्तन होगा,व्यवस्था परिवर्तन नहीं होगा ! क्योंकि शोषक गोरे अंग्रेज पूँँजीपतियों की जगह भूरे देसी अंग्रेज पूँजीपति आ जाएंगे, केवल शोषकों का रंग बदल जाएगा,भारतीय मजदूरों, किसानों के शोषण में कतई कमी नहीं आएगी ‘ शहीद-ए-आजम भगतसिंह की बातें कथित सबसे सुयोग्य श्रीयुत् श्रीमान नरेंद्र दास दामोदरदास मोदी के कथित रामराज में शब्दशः सही सिद्ध हो रही हैं ! और अंत में यही निष्कर्ष निकलता है कि इस यक्षप्रश्न का क्या उत्तर है कि ‘क्या वर्तमान भारत शहीद-ए-आजम स्वर्गीय भगत सिंह के सपनों का भारत है ? ‘ इसका सटीक और सही उत्तर है ‘कतई नहीं ! ‘
-निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण व समाचार पत्र-पत्रिकाओं में निष्पृह, निष्पक्ष व बेखौफ लेखन ‘,जी-181-ए,एचआईजी फ्लैट्स, सेक्टर-11,प्रतापविहार, गाजियाबाद,पिन नंबर 201009,उप्र.,3-6-2021, संपर्क-9910629632, ईमेल-nirmalkumarsharma3@gmail.com