【सात साल पहले लिखा गया मेरा ये लेख,75-77के आपातकालीन दौर में,आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष करने की बजाय आपातकाल और तानाशाही के समक्ष घुटने टेक देने वाली, संघ परिवार की दुष्चरित्र भूमिका के एक नमूने को उजागर करने वाले शर्मनाक इतिहास की याद दिलाता है। –विनोद कोचर 】

आपातकाल के बारे में, दैनिक भास्कर के 24-6-2018के अंक में छपा, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू का लेख पढ़कर मैं हैरान हूं।
उपराष्ट्रपति बनने के पहले भी, श्री नायडू नरेंद्र मोदी के, चापलूसी की हद तक प्रशंसक रहे हैं ।
यहाँ तक कि भारत का उद्धार करने के लिए ईश्वर द्वारा भेजे गए दूत तक की संज्ञा भी, उन्होंने नरेंद्र मोदी को दे डाली थी।
उपराष्ट्रपति का पद, संभवतः इसी वजह से उन्हें पुरस्कार स्वरूप प्राप्त हुआ है।
लेकिन उपराष्ट्रपति बन जाने के बाद भी वे नरेंद्र मोदी की अंधप्रशंसा करने के अपने स्वभाव को वश में नहीं कर पाए हैं।
अब, आपातकाल पर लिखे अपने लेख में, नरेंद्र मोदी की तारीफ करने के मामले में भी हद से गुजरकर, पहली बार उन्होंने ये रहस्योद्घाटन किया है कि आपातकाल लगने पर, भूमिगत होकर नरेन्द्रमोदी ने आपातकाल विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया, जेल में बंद मीसा बंदियों की सहायता का काम उन्होंने किया।
हम भी आपातकाल के पूरे समय तक मीसाबंदी रहे हैं और नरसिंहगढ़ की जेल में हमें उन दो तत्कालीन सांसदों का सत्संग प्राप्त हुआ जिन्होंने, इंदिरागांधी द्वारा अनैतिक व अवैध रूप से15वीं लोकसभा का कार्यकाल, जनादेश का तिरस्कार करते हुए, एक साल आगे बढ़ाने का विरोध अपनी संसद सदस्यता से त्यागपत्र देकर किया था और लोकनायक जयप्रकाश नारायण सहित देश भर के लोकतंत्र प्रेमियों ने जिनके इस कदम की भूरि भूरि प्रशंसा की थी।
ये दो सांसद थे महान लोकतंत्र सेनानी,चिंतक और लेखक-मधुलिमये और शरद यादव।
नायडू जी ने अपने लेख में इन दोनों की चर्चा शायद इसलिए नहीं की क्योंकि ये दोनों नेता गांधी लोहिया और जयप्रकाश नारायण की विचारधारा के अनुयायी समाजवादी थे और आरएसएस की साम्प्रदायिक हिन्दू विचारधारा के घोर आलोचक और विरोधी थे।
जेल में हमारे पास देश की अन्य कई जेलों से पत्र आते रहते थे जिनमें जेल के बाहर चल रहे आंदोलनों का भी जिक्र रहता था।
न तो तब और न ही उसके बाद कभी भी किसी मीसाबंदी ने नरेंद्र मोदी की ऐसी किसी भूमिका का कहीं उल्लेख किया जिसका उल्लेख श्री नायडू ने किया है अपने लेख में।
उन दिनों प्रेस की घुटने टेकू नीति की आलोचना तो ठीक है लेकिन उससे भी जादा बुरी, प्रेस की घुटने टेकू या कहो मोदीराज का चारण गान करने वाली मीडिया पर श्री नायडू की चुप्पी, संवैधानिक संस्थाओं की दिन ब दिन गिरती जा रही साख, विश्वसनीयता और गरिमा पर भी श्री नायडू का मौन बहुत कुछ कहता है।
और हाँ, श्री नायडू और श्री मोदी सहित देश के तमाम संघी हिन्दूराष्ट्रवादी हुक्मरानों को, आपातकाल के काले दिनों में प्रेस की घुटने टेकू नीति के संदर्भ में, मैं विशेष रूप से ये याद दिलाना चाहता हूं कि उन दिनों जितनी भी समाचार प्रकाशन संस्थाएं, अखबार, अखबारों के संपादक व उनसे जुड़े अन्य पत्रकार इंदिरा गांधी के सामने घुटने टेक चुके थे, उनमें सबसे ज्यादा अग्रणी थे आरएसएस द्वारा संचालित प्रकाशन संस्थाएं,अखबार, अखबारों के संपादक व उनसे जुड़े अन्य पत्रकार।
नमूने के तौर पर मैं, मधु लिमये द्वारा मुझे भोपाल के हमीदिया अस्पताल से लिखे गए दिनाँक 4-12-76 के अंतर्देशीय पत्र का एक अंश उद्धृत कर रहा हूं जिसमें मधुजी ने लिखा है कि:-
“….. मुझे अस्पताल में राधेश्याम शर्मा,(संपादक-‘युगधर्म’) मिले थे।मैंने पूछा कि आप ‘युगधर्म’, ‘स्वराज्य संदेश’ क्यों चलाते हैं? ‘नवभारत’ व अन्य सरकार परस्त अखबारों में और आपमें क्या फर्क है?
उन्होंने जवाब दिया कि यदि हम विरोध में लिखेंगे तो सरकार प्रिसेंसरशिप लगाएगी।
मैंने कहा उसको न मानो-‘साधना’, ‘जनता’, ‘पीपुल’, ‘कर्तव्य’की तरह लड़ो।
उन्होंने जवाब दिया-अखबार बंद हो जाएगा, पत्रकार बेकार होंगे, प्रेस को ताला लगेगा।
मैंने कहा, जेल में जो सरकारी नौकर हैं, सरकारी कारखानों में काम करने वाले कर्मचारी हैं, उनका क्या?क्या वे निलंबित या निष्कासित नहीं हुए हैं?’
‘शायद मेरी बात उनको अच्छी न लगी हो।उनको अपना संगठन, अपने छापाखाने, अपनी इमारतें, अपनी जायजाद बचाने की चिंता अधिक है।शायद उनके जीवन मूल्य अलग हैं।’
‘मैंने राधेश्याम जी से अंत में कहा-क्या त्याग और बलिदान कविताओं तक ही सीमित रहेगा?
इसी पर बात का खतम होना स्वाभाविक था।वर्ना अकारण कटुता बढ़ती।’
बकौल दुष्यंत:-
गज़ब है!सच को सच कहते नहीं वे!
कुरान-ओ-उपनिषद खोले हुए हैं
–विनोद कोचर (24-6-2018)