हिम्मत सेठवैसे तो किसान आन्दोलन को 200 दिन से भी ज्यादा हो गये हैं। जब से केन्द्र सरकार ने अध्यादेश लाकर तीनों कृषि कानूनों को लागू किया है तभी से आन्दोलन जारी है। पहले पंजाब के किसान आन्दोलन कर रहे थे। लेकिन जब उनकी बात नहीं सुनी गई तो उन्होंने दिल्ली के जन्तर मन्तर या राम लीला मैदान पर आन्दोलन करने का तय किया। लेकिन केन्द्र सरकार के आदेशों के चलते खट्टर सरकार ने हरियाणा दिल्ली की सीमा पर इन आन्दोलनकारी किसानों को रोक लिया और तभी से सारे देश के किसान यहां पर धरने पर बैठे हैं। इस बीच किसानों ने क्रमिक भूख हड़ताल भी की और रेलों व सड़कों पर बैठकर रास्ते भी रोके। सरकार ने किसानों से कहने को 11 बार बातचीत करने का सफलता पूर्वक नाटक भी किया लेकिन बातचीत के पहले ही कह दिया गया कि कानून तो वापस नहीं होंगे। किसान कानून की वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाकर वैधानिक दर्जा की मांग के अतिरिक्त किसी बात के लिए तैयार नहीं है। इन सौ दिनों में किसानों ने हर तरह के प्रयास किये कि सरकार नींद से जागे और आन्दोलन की मांगे पूरी करे। वहीं दूसरी और कृषि मंत्री, भाजपा के मंत्री, विधायक एम.पी.आई.टी. सेल व प्रधानमंत्री स्वंय किसानों के आन्दोलनकारी नेताओं को बदनाम करने, उन्हें भ्रमित बताने तथा देशद्रोही होने का झूठा प्रचार भी करते रहे। इस बीच सरकार ने अपने प्रभाव से उच्चतम न्यायालय का उपयोग भी किसान आन्दोलन को तोड़ने के लिए किया लेकिन सफल नहीं हुए। इस आन्दोलन की दो खास बात रही। एक तो यह आन्दोलन हिंसक नहीं हुआ। सरकार ने सारे प्रयास किये कि आन्दोलन के युवा नेता उकसाने में आ जाएँ और सरकारी हिन्सा के विरूद्ध अपना आपा खो बैठंे और हिंसा पर उतर आएँ। लेकिन सरकार इसमें बुरी तरह फैल हुई। 26 जनवरी को लाल किले पर खेला गया नाटक इसी षडयन्त्र का एक भाग था लेकिन किसानों ने अपने नेताओं का अनुशासन नहीं तोड़ा।दूसरी मुख्य बात यह है कि इसमें महिला-किसानों की भागीदारी बेमिसाल है। महिलाओं ने अपने घर के कामकाज छोड़कर धरने पर आन्दोलन में आना बहुत ही सुन्दर उदाहरण है। यह महिलाएं इस आन्दोलन की ताकत तो हैं ही। मुझे देश की राजनीति में भी इन महिलाओं के चलते बड़े बदलाव की किरण भी नजर आती है। यह आन्दोलन सफल हो या असफल कह नहीं सकते लेकिन एक बात निष्चित रूप से कह सकते हंै कि ये आन्दोलनकारी किसान महिलाएं अवश्य अपने जीवन में सफल हैं और होगी। मुझे लगता है कि किसान आन्दोलन में 26 जनवरी के बाद जो ठहराव आ गया था उसे तोड़ने की आवष्यकता है। सरकार किसानों से बात भी नहीं करना चाहती है। सरकार पहले दिन से ही किसानों के इस आन्दोलन के प्रति उदासीन सा रूख अपनाएं हुए है। किसानों को आन्दोलन का रिकाॅर्ड बनाने के बजाय ऐसा कुछ करना चाहिये कि सरकार आन्दोलन के प्रति सजग हो। 5 घण्टे के चक्के जाम और 4 घण्टे के रेल रोको आन्दोलन से सरकार के कान पर जंू भी नहीं रेंगी। अब आन्दोलन के नेताओं को अपने कार्यक्रम बदलने चाहिये।सभी प्रदेशों में किसान पंचायतें हो रही है यह एक अच्छा कदम है इससे किसानों के साथ-साथ लोगों को भी शिक्षण होगा और चेतना भी आएगी। इसी तरह पांचों राज्यों जहां चुनाव होने वाले हैं। वहां भाजपा के विरूद्ध प्रचार का फैसला भी उचित कदम है। जब तक इस सरकार को सीधी चोट नहीं होगी यह मानने वाली नहीं है। मेरा मानना है कि किसान नेताओं को दिल्ली सीमा के साथ-साथ सारे प्रदेशो की राजधानी में भी लगातार धरने प्रदर्शन करने चाहिये। इसी तरह 2-3 दिन के लिए पूरे देश में जनता कफ्र्यू लगाने का फैसला भी लिया जा सकता है। अगर सभी किसान नेता दो-तीन दिन के लिए सब्जी-फल व दूध जैसी आवश्यक चीजों की सप्लाई रोकने का फैसला ले। इससे आम आदमी को कष्ट जरूर होगा लेकिन सरकार की हठ धर्मिता को तोड़ने के लिए यह आवश्यक भी है।जब सकार स्वंय पेट्रोल, डीजल और गैस पर लगाकर टैक्स बढ़ाकर मंहगा कर सकती है तो किसान अपनी मांगों को मनवाने के लिए अपने द्वारा उत्पादित फल सब्जी को क्यों नहीं रोक सकते है? क्योंकि यह एक संवेदनहीन सरकार है। 250 से अधिक किसानों की ष्शहादत से भी इसका मन नहीं पसीजा। यह सरकार बातचीत से विवाद को हल करने में विश्वास नहीं करती। यह तो डण्डे के बल पर अपने झूठे प्रचार के दम पर ही अपनी बात को मनवाने में विश्वास करती है। कांग्रेस राज में जिस सीबीआई को रटू तोता कह कर नहीं थकते थे। उसके साथ इस सरकार ने सभी संवेधानिक संस्थाओं को अपने अग्र संगठन में बदल दिया है और हर विवाद में उसका निर्लज्ज दुरुपयोग कर रही है सीबीआई, ईडी इन्कम टैक्स के साथ-साथ न्यायालयों का भी।किसान अनिश्चित काल के लिए आन्दोलन नहीं कर सकते। अब तो आम आदमी को भी आन्दोलन में भाग लेने के लिए मोटीवेट करना चाहिये। इस आन्दोलन को देष के कम्पनीकरण को रोकने के उद्देश्य से आगे बढ़ाना चाहिये और मजदूर तथा युवाओं के रोजगार के मुद्दों को जोड़कर व्यापक बनाने के प्रयास करने चाहिये।ये मेरे सुझाव है। किसान नेता इन पर विचार करे। मेरा तो मानना है कि इस सरकार को जगाने के लिए कुछ नया करना चाहिये ओर यह यथास्थिति टूटनी चाहिये।शुभकामनाओं के साथ।
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ढ़ीठ सरकार की बेशर्मी और किसान आन्दोलन के सौ दिन

