17 अप्रैल 2023। शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने कहा कि 15 दिन में महाराष्ट्र की राजनीति में दो बड़े विस्फोट होंगे। इसके ठीक 10 दिन बाद यानी 27 अप्रैल को शरद पवार ने कहा कि रोटी सही समय पर न पलटे तो कड़वी हो जाती है। रोटी पलटने का वक्त आ गया है। ये दोनों बयान जिस तरफ संकेत दे रहे थे, वो आज हो गया।
शरद पवार ने राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (NCP) का अध्यक्ष पद छोड़ने का ऐलान कर दिया। इस ऐलान के बाद शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने कहा- नए चेहरों को आगे लाना NCP की परंपरा रही है। इन सभी बयानों से साफ पता चलता है कि यह फैसला बेहद सोच-समझकर लिया गया है और इसके बारे में दोनों संभावित राजनीतिक वारिस सुप्रिया सुले और अजित पवार को भी मालूम था।
1. बढ़ती उम्र और बीमारी, अपने सामने पार्टी लीडरशिप का ट्रांसफर करना चाहते हों
ये संभावना सबसे मजबूत है। शरद पवार कैंसर सर्वाइवर हैं और उम्र 82 पार हो चुकी है। माना जा रहा है कि वो अपने सामने पार्टी लीडरशिप का ट्रांसफर देखना चाहते हैं।
अप्रैल 2021 में शरद पवार के पेट में तेज दर्द होने की वजह से उनका ऑपरेशन किया गया था। जनवरी 2022 में शरद पवार कोरोना संक्रमित हो गए थे। 1 नवंबर 2022 को अचानक से तबीयत बिगड़ गई थी। इसके बाद उन्हें कैंडी अस्पताल में भर्ती किया गया था।
शरद पवार के इस्तीफे के बाद उनके भतीजे अजित पवार ने भी कहा कि ‘उम्र और स्वास्थ की वजहों से पवार साहब ने अपना पद छोड़ा है। वे अब अपना फैसला वापस नहीं लेंगे। कुछ दिनों पहले ही उन्होंने पार्टी के नेतृत्व को बदलने की बात कही थी।’
ये तस्वीर उस समय की है, जब शरद पवार को मुंबई के कैंडी अस्पताल में भर्ती किया गया था।
2. अजित पवार और उनके खेमे का बीजेपी को समर्थन करने का दबाव
सुप्रीम कोर्ट में CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5 जजों की बेंच ने पिछले दिनों उद्धव सरकार गिरने के मामले में उद्धव गुट, शिंदे गुट और राज्यपाल की ओर से दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसके बाद से महाराष्ट्र में सियासी हलचल तेज है।
सियासी गलियारों में चर्चा है कि अजित पवार, प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे नेताओं ने NCP अध्यक्ष शरद पवार से मुलाकात की और कहा कि हमें बीजेपी के साथ जाना चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य करार देती है तो सरकार बचाने के लिए NCP विधायकों की जरूरत भी होगी। साथ ही बीजेपी को लोकसभा चुनाव में 40% वोट चाहिए तो भी NCP की जरूरत होगी।
माना जाता है कि शरद पवार इसके लिए तैयार नहीं थे। इसके बाद 18 अप्रैल को खबर आई कि अजित पवार 10 से 15 विधायकों के साथ बीजेपी में जा सकते हैं। इसी बीच अजित पवार ने अपने ट्विटर बायो से NCP का चुनाव चिन्ह हटा लिया।
इसके बाद संजय राउत कहते हैं कि शरद पवार हमारे अलायंस के गार्डियन हैं। हम सब उनके साथ हैं। उद्धव ठाकरे भी उनके साथ हैं। हमारी इस बारे में बातचीत भी हो गई है। कोई गलतफहमी में ना रहे कि महाविकास आघाड़ी टूट जाएगा। राउत के इस बयान को अजित पवार पर हमला माना गया।
इसके बाद अजित पवार का बयान आया कि हम कहीं नहीं जा रहे हैं। अजित ने राउत पर तंज कसते हुए कहा कि अन्य दलों के नेता NCP के प्रवक्ताओं की तरह व्यवहार कर रहे हैं।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट शरद पवार के इस्तीफा देने के फैसले को दबाव की राजनीति से जोड़ रहे हैं। उनका मानना है कि शरद पवार के कहने पर ही संजय राउत ने ऐसा बयान दिया था।
एक थ्योरी दी जा रही है कि शरद पवार सुप्रिया सुले के हाथ पार्टी की कमान सौंप देंगे। इससे नाराज अजित पवार बीजेपी की तरफ जा सकते हैं। इससे सुप्रिया सुले को पार्टी की कमान मिल जाएगी और अजित पवार को पार्टी से बगावत का बहाना।
3. पार्टी को एकजुट रखने के लिए शरद पवार का इमोशनल कार्ड
21 अप्रैल को NCP ने कर्नाटक चुनाव के लिए अपने स्टार प्रचारकों की सूची जारी की, लेकिन इसमें वरिष्ठ नेता अजित पवार का नाम नहीं था। इसी दिन अजित मुंबई में NCP की एक बैठक में भी शामिल नहीं हुए।
इस बैठक में NCP अध्यक्ष शरद पवार, महाराष्ट्र NCP के अध्यक्ष जयंत पाटिल, प्रफुल्ल पटेल, सुप्रिया सुले, सुनील तटकर और छगन भुजबल जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हुए। इसी वजह से यह चर्चा बनी हुई है कि पवार परिवार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि शरद पवार ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर पार्टी को एकजुट रखने के लिए एक इमोशनल कार्ड चला है।
शरद पवार के इस्तीफा देने के बाद अजित ने बयान भी दिया कि हम सब एक परिवार हैं और हम चाचा शरद पवार से अपने फैसले पर फिर से विचार करने के लिए कहेंगे।
पवार परिवार में एनसीपी पर वर्चस्व को लेकर भी घमासान है। एक ओर जहां शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले दावेदार हैं तो वहीं दूसरी तरफ भतीजे अजित पवार भी पार्टी पर दावा ठोंकते रहते हैं। संभव है कि शरद पवार अपने इस इमोशन फैसले के जरिए परिवार के विवाद को खत्म करने की कोशिश कर रहे हों।
4. बालासाहेब ठाकरे की स्ट्रैटजी पर शरद पवार
साल 1992 की बात है। बाला साहेब ठाकरे के पुराने साथी और शिवसैनिक माधव देशपांडे ने कहा कि बाला साहेब के बेटे उद्धव ठाकरे और भतीजे राज ठाकरे पार्टी के मामलों में दखलअंदाजी कर रहे हैं। ये बात बाला साहेब को नागवार गुजरी। यह पहली बार था, जब किसी शिवसैनिक ने उनपर सवाल खड़े किए थे। बाला साहेब के परिवार पर जो आरोप लगाया गया था, वह उनको बिल्कुल पसंद नहीं था।
शरद की तरह ही 1992 में बाला साहेब ने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर पूरी पार्टी को एकजुट कर लिया था।
उन्होंने सामना में एक लेख के जरिए परिवार समेत शिवसेना पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया। जैसे ही ये बात सामने आई, शिवसैनिक घरों से निकलकर प्रदर्शन करने लगे। वे बाला साहेब के घर के सामने आत्महत्या करने की धमकी देने लगे। मुंबई की सड़कें जाम हो गईं।
पार्टी में बाला साहेब के विरोध के स्वर थम गए। उन्हें मनाने की कोशिशें शुरू हो गईं। आखिरकार बाला साहेब ने शिवसैनिकों की अपील मान ली। उनके इस फैसले से शिवसेना महाराष्ट्र की राजनीति में पहले से और ज्यादा मजबूत पार्टी बनकर सामने आई।
शरद पवार अध्यक्ष पद छोड़ने का ऐलान कर अपनी ताकत को परखना चाहते हैं। वे यह देखना चाहते हैं कि जिस पार्टी को उन्होंने बनाया, आज उसमें उनके साथ कितने लोग खड़े हैं। सारी परिस्थितयों का आंकलन करने के बाद वे कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। सांसद संजय राउत का कहना है कि बाला साहेब की तरह ही इस बार शरद पवार ने भी फैसला लिया है।

