*रजत कुमार
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेज़ सरकार द्वारा क्रांतिकारियों को फांसी से कम काला पानी की सज़ा दी जाती थी। वह सज़ा अमानवीय घुट-घुट कर मरने के समान होती थी। ऐसे सजा़याफ़्ता को पोर्ट ब्लेयर के सेलुलर जेल में भेज दिया जाता था। यह भारतीय तट से हज़ार से भी ज़्यादा किलोमीटर दूर,दुर्गम समुद्री मार्ग पर था। ऐसे 585 काला पानी के कैदियों में जीवित लौटे,अंतिम जिगीषु योद्धा कामरेड शिव वर्मा थे।
शिव वर्मा उत्तर प्रदेश के हरदोई ज़िले के खतेली गांव के पैदाइशी थे। 17 वर्ष की उम्र में ही वे गांधी जी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए थे। जब वह आंदोलन वापस ले लिया गया तो वे आगे की पढ़ाई के लिए डीएवी कॉलेज, कानपुर आ गए थे। कॉलेज के लाल बंगले हॉस्टल में 1927 की जनवरी के किसी दिन जयदेव कपूर के साथ शिव वर्मा की भगत सिंह से पहली भेंट हुई थी। भगत सिंह का कानपुर पहले से आना- जाना होता था। वहां वे गणेश शंकर विद्यार्थी के अतिथि और सहकर्मी बनकर रहते थे। उनके अख़बार ‘प्रताप’ में बलवंत नाम से लिखते भी थे।
गणेश शंकर विद्यार्थी का भगत सिंह और प्रेमचंद दोनों से मधुर संबंध था।
1926 में भगत सिंह,सुखदेव,भगवतीचरण वोहरा,यशपाल आदि ने लाहौर में नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। भगत सिंह उसके देशव्यापी विस्तार के लिए उन दिनों दौड़ा किया करते थे। शिव वर्मा से उनका मिलना उस दौड़े की ही कड़ी थी।
8-9 सितंबर,1928 को दिल्ली के फिरोज़ शाह कोटला क़िले के गुप्त खंडहरों में उनकी विस्तारित बैठक हो सकी थी। उस बैठक में देश के कई हिस्सों से छोटे-छोटे ग्रुप में काम करने वाले क्रांतिकारी एकत्र हुए थे। उन लोगों ने सर्वसम्मति से अपने दो वर्षीय संगठन नौजवान भारत सभा का नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ कर लिया था। इसके साथ ही इन लोगों ने संगठन के नाम रूप नीति,उपदेश और संविधान में भी फेरबदल किया।
चंद्रशेखर आज़ाद,भगत सिंह,सुखदेव,फनींद्र घोष,कुंदनलाल, विजय कुमार सिन्हा और शिव वर्मा को लेकर 7 सदस्य केंद्रीय कमेटी का गठन किया। चंद्रशेखर आज़ाद उसके प्रथम निर्वाचित सेनापति बनाए गए। भगत सिंह को प्रचार-प्रसार और विजय कुमार सिन्हा को अंतर्प्रांतीय संपर्क का कार्यभार दिया गया था। शिव वर्मा केंद्रीय कमेटी की ओर से उत्तर प्रदेश (उस समय संयुक्त प्रांत) के संगठन करता भी चुने गए थे। बैठक में जयदेव कपूर,सुरेंद्र नाथ पांडे,ब्रह्मदत्त मिश्र,मनमोहन बनर्जी और दूसरे क्रांतिकारी भी शामिल हुए थे। संगठन में सभी एक दूसरे को उर्फी़ नाम से पुकारते थे। जैसे भगत सिंह रंजीत और शिव वर्मा प्रभात के नाम से जाने जाते थे।
अगले ही महीने 30 अक्टूबर,1928 को जॉन साइमन के नेतृत्व में 7 ब्रिटिश सांसदों का समूह कथित रूप से संवैधानिक सुधारों की जांच के लिए लाहौर आया था। भारतीयों ने एकतरफ़ा और पक्षपात पूर्ण ढंग से बनाये गये,इस कमीशन के बहिष्कार के लिए ‘गो बैक साइमन’ के नारे के साथ,उन्हें काला झंडा दिखाया। इससे उनके स्थानीय अधिकारी बौखला गए। एसपी जेम्स ए. स्काॅट ने उस विरोध प्रदर्शन के दमन के लिए लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। जिससे बड़ी संख्या में निहत्थे लोग घायल हो गए। विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे पंजाब केसरी लाला लाजपत राय एएसपी जे.पी. सांडर्स के प्रहार से बुरी तरह से चोटिल हो गए। 19 नवंबर,1928 को उनकी मृत्यु हो गई। लाला जी की हत्या से देशवासियों में शोक और रोष की लहर दौड़ गई। हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ ने लाला लाजपत राय से अपनी मत भिन्नता के बावजूद लोगों के गुस्से को स्वर देने का संकल्प लिया। 17 दिसंबर,1928 को लाहौर में राजगुरु और फिर भगत सिंह ने मौक़ा मिलते ही उस पर फायर कर दिया। गोली सांडर्स को लगी, वह मारा गया।स्काॅट बच निकला। सांडर्स तत्कालीन वायसराय के पीए का होने वाला दामाद था। इससे समूचा ब्रिटिश प्रशासन रैपिड एक्शन में आ गया।
लाहौर षड्यंत्र केस-2 के नाम से यह इतिहास में दर्ज़ है। उसी काल खंड में संगठन के फ़ैसले के तहत सहारनपुर में बम बनाने का काम शुरू किया गया था। फरोहयान मोहल्ले में एक किराए के दो मंज़िले मकान में गया प्रसाद कटियार, जयदेव कपूर और शिव वर्मा ने एक डिस्पेंसरी खोली। नीचे गया प्रसाद कटियार डॉक्टर और जयदेव कपूर तथा शिव वर्मा कंपाउंडर के रूप में काम करते थे। ऊपर के तल्ले पर बम बनाया जाता था। संभव है, स्थानीय मुख़बिरों के कारण 13 मई,1929 को वे गिरफ़्तार हो गए।
जेल में भी शिव वर्मा और उनके साथियों ने अमानवीय व्यवस्था और पाठ्य सामग्री की उपलब्धता को लेकर कई दौर में अनशन और भूख हड़ताल की। अंततः जेल प्रशासन को झुकना पड़ा था। 1946 में उन्हें रिहा कर दिया गया।
साम्यवादी विचारधारा से जुड़ाव होने के कारण आज़ादी के बाद भी, उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। 1967-71 में चौथी लोक-सभा के लिए कानपुर से उन्होंने चुनाव लड़ना स्वीकार था। सुभाष चंद्र बोस की सहकर्मी डॉ लक्ष्मी सहगल और भगत सिंह के साथी शिव वर्मा के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव के परिणाम लगभग एक जैसे रहे। यहां व्यक्ति का त्याग और संघर्ष गौण हो गया। वाम विरोधी तमाम तरह की शक्तियां अपने अंतर्विरोध पीछे कर,एकजुट हो गयीं।
शिव वर्मा ने ‘नया सवेरा’, ‘लोक लहर’ और ‘नया पथ’ पत्रिका का संपादन कार्य किया था। उन्होंने क्रांतिकारी शहीदों (भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद,राजगुरु,सुखदेव, महावीर सिंह,यतींद्र नाथ दास आदि) के प्रामाणिक और प्रेरणादायी रेखा चित्र ‘संस्मृतियां’ लिखीं। जो अति मार्मिक और महत्वपूर्ण है। भगत सिंह की रचनाओं का दस्तावेज़ी संकलन भी तैयार किया। सारे लोग भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर मानते हैं। पर शिव वर्मा ने हमेशा भगत सिंह का जन्म 5 अक्टूबर ज़ोर देकर लिखा और बोला। (बकौल स्वर्गीय सिद्धेश्वर नाथ पांडे)पटना के विधायक क्लब में एक कार्यक्रम के दौरान पूछने पर,उन्होंने ज़ोर देकर यह कहा भी था। उन्होंने सरल और बोधगम्य भाषा और भाव में पांच खंडों में मार्क्सवाद परिचय माला लिखा,जो इस दिशा में बढ़ने वालों की प्रारंभिक पुस्तक के समान है।
शिव वर्मा ने लखनऊ में शहीद स्मारक व स्वतंत्रता संग्राम शोध केंद्र की स्थापना की थी। उन्होंने क्रांतिकारियों के लेख,तस्वीर आदि एकत्र करने के लिए देश-विदेश की यात्राएं कीं।
शिव वर्मा ने अपने पत्रों में साथी से समापन किया है। भगत सिंह के साथी शिव वर्मा। तदनुकूल, यह स्वाभाविक विश्लेषण ही उत्साह में ऊर्जा भरने वाला है। पर क्या यह विश्लेषण सही है! वे त्याग,संघर्ष और विचारधारा के आधिकारिक क्रांतिकारी थे। उन्हें अनंत नमन!
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