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ध्यान पथ : संसर्ग से शिवत्व और पूर्णत्व

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   डॉ. विकास मानव

कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबलातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कटिचिदारुणामेव भवतिम्।
विरञ्चिप्रयस्यास्त्रुन्तरशङ्गरलहृ-
गभीरभिरवाग्भिर्विद्धति शतं रञ्जनमि॥

कृष्ण का सूत्र है :

    “आप जहां इस जन्म में कार्य को समाप्त करते हैं, अलगे जन्म में वहीं से मैं याद दिला देता हूँ।”

जरा सोचो, ये कितना महत्वपूर्ण सूत्र है। कई काम आपके इस जन्म में अधूरे रह जाते हैं। कई ईश्वरीय कार्य या पारिवारिक कार्य और जन कल्याणकारी कार्य इस जन्म में अधूरे रह जाते हैं। समय नहीं बचता है तो शरीर छूट जाता है। ईश्वर आपको एक मौका और देता है। 

    एक जन्म और मनुष्य होकर अब आप अपने काम को पूरा कर लें। लेकिन कार्य अगले जन्म में भी पूरा नहीं हो पाया।

अब क्या करें ? 

  ईश्वर से कब तक प्रार्थना करें एक मौका और दे दो। क्यों की कई काम है जो कई जन्मों में पूरा नहीं हो पाते हैं। कई बार कर्म राई समान है लेकिन प्रायश्चित पहाड़ समान है जन्म कम पड़ जाता है। अब यदि किसी के 50 लाख जन्म हो चुके हैं तो वो क्या करे ? चौरासी लाख जन्मों का भी प्रमाण मौजूद हैं। इनके समाधान में कितना वक्त लगेगा ? 

     तो हम कब और कैसे ईश्वर से हर बार प्रार्थना करें एक मौका और दे दो ? 

      जितने भी पंथ हैं उन सभी में किसी न किसी को माध्यम तो बनाया ही जाता है, शिवत्व की प्राप्ति के लिए| जैसे नाथ संप्रदाय के लोग हठ योग को माध्यम बनाते हैं शिवत्व की प्राप्ति के लिए। कुछ साधक मंत्र को, कुछ तंत्र को, कुछ ध्यान को इसी प्रकार से अन्य भी हैं। 

      मैंने संसर्ग को माध्यम बनाया। शिव जैसे संसर्ग की क्षमता साधा और तमाम शक्तियों में प्रवेश लेकर, उन्हें खुद में प्रवेश देकर उनकी परिपूर्णता साकार कर रहा हूँ 

    संसर्ग ही शिव है ये कोई थ्योरी नहीं है बल्कि सत्य है। ज़ब यह शिव है, शिवत्व से परमानंद देता है तो समस्या कहाँ है? शिव है तो शिव को ही साधन बनाया | शिवत्व प्राप्ति के लिए, नारीशक्ति में शिवत्व की व्याप्ति साकार करने के लिए।

     दिक्कतें किसी भी मार्ग से चलें समान ही होती हैं | पिछले जन्मों के कर्मों का निवारण करना ही होता है। सबके पूर्व जन्मों के कर्म अलग होंगे तो उनके निवारण भी अलग होंगे।यही वजह है इस पर कभी भी एक सिद्धांत प्रतिपादित किया ही नहीं जा सका। सब लोग नीचे से ऊपर की ओर जाते हैं।

    जगत है, पहले वहां से निकलना। फिर आत्म जगत से होते हुए ब्रह्म तक की यात्रा है। वास्तव में ये भौतिक शरीर, हृदय, मस्तिष्क और आत्मा के स्तरों पर क्रमशः शोधन की प्रक्रिया है। बॉडी, हार्ट, माइंड और सोल के स्तरों पर शोधन है। सबसे ज्यादा दिक्कत आती है शरीर और हृदय के स्तरों पर शोधन में। 

     जनक के गुरु अष्टावक्र हैं। ब्रह्म विद्या की जानकारी है।शुकदेव जी राजा जनक से ही ब्रह्म विद्या का ज्ञान लेने गए थे।राजा जनक की मृत्यु के बाद उन्हें नरक के रास्ते से ले जाया गया था। 

आखिर क्यों ? 

राजा जनक ने एक गाय का मुंह घुमाकर दूसरी ओर कर दिया था। कर्म की गति बहुत ही बहुत सूक्ष्म है। कब कहां कर्म बन जाए कुछ पता ही नहीं। भीष्म पितामह से सौ जन्म के बाद एक कर्म हिसाब लेने आता है। जो उन्हें याद भी नहीं है। जब साधक शोधन के इन चार चरणों को पार करते हैं तो बहुत उलझने आती हैं।

      सूक्ष्म स्तरों पर कार्य करने के लिए उन्हें समझना भी होता है। इसके लिए हमेशा ही समय कम ही होगा। काम पूरी लग्न और ईमानदारी से कर रहे हैं फिर भी समय पूरा नहीं पड़ता है। वैसे भी कर्म कई जन्मों से संग्रहीत हैं।

      इनसे बचने का कोई मार्ग नहीं | इन्हीं समाधान के कारणों से लोग हजार साल की समाधि लगा लेते हैं | जब तक समाधान नहीं होगा आगे के बैरियर खुलते ही नहीं हैं। तो समाधि ऐसे ही समाधान खोजने के लिए लगाई जाती है।

     कई बार मनुष्य इन कर्म दोषों से चारों ओर से घिर जाता है। तो योगतंत्र के संन्यासियों ने इनसे बचने का एक उपाय निकाला। आखिर इन कर्म दोषों का हिसाब रखता कौन है। पता चला आत्मा खुद ही ये पुलिंदा लेकर घूमता रहता है। ये सत्य है ये लेखा जोखा जीव के साथ ही चलता है। 

     हमने इसे कर्मों की हार्ड ड्राइव कहा, जिसमें आपके सारे कर्म सेव किये हुए है। अगर इनमें से कुछ कर्म डिलीट कर दिए जाएं, कुछ इस प्रकार से कि पीछे उन कर्मों के इंप्रिंट भी न  बचे तो उन कर्मों का कोई रिकार्ड ही नहीं है, तो वो भोगना भी नहीं होता हैं| 

    वो हार्ड ड्राइव मनुष्य के शरीर में कहां है ? उस तक कैसे पहुंचा जाए ? उसके बाद उन कर्मों को कैसे नष्ट किया जाए ? यह बताने का नहीं, अनुभव कराने और दिखाने का विषय है. अभीप्सा हो तो आना, खुद को मुझे देना.

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