
अवधेश बजाज
इस बात को बहुत दिन नहीं हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख़ टिप्पणी की। कहा कि मादक पदार्थों के मामले में कार्यवाही करने के नाम पर संबंधित महकमा ‘बड़ी मछलियों पर हाथ डालने की बजाय छोटे लोगों पर ही कार्यवाही करता है। अदालत ने यह कहते हुए मध्यप्रदेश के उस किसान को जमानत दे दी, जिसके खेत से अफीम के कुछ पौधे पकड़े गए हैं। इसी मध्यप्रदेश की सरकार ने अब कुछ ऐसा कर दिया है, जो एक बार फिर ‘सुरक्षित बड़ी मछली बनाम असुरक्षित छोटी मछली जैसा मामला कहा जा सकता है। साध्वी-हठ के ‘श्राप से बचने के लिए एक झटके में लाखों लोगों का रोजगार छीन लिया गया। अहातों को बंद करने का निर्णय वहां काम करने वाले लगभग एक लाख लोग और उनके परिवारों के पेट पर लात मारने जैसा ही है। बेहद गरीब परिवेश वाले ये लोग अहातों में काम कर ईमानदारी के साथ आजीविका चला रहे थे। सरकार के इस फैसले की प्रायोजित जयकार के शोर के बीच ऐसे परिवारों की आत्मा की करुण पुकार को कौन सुनेगा? फिर ये तो उन्हें ही खुश करने के लिए किया गया, जो किसी समय दिग्विजय सिंह को हजारों परिवारों की हाय का श्राप दे रही थीं। जिन्होंने नौकरी से निकाले गए दैनिक वेतनभोगियों के पक्ष में वह रुदन मचाया था कि एकबारगी सरकार सकते में आ गयी थी। अहातों में काम करने वाले और ऐसे ठिकानों के बाहर खोमचे लगाकर आजीविका कमाने वाले भी तो अपने इस दैनिक रोजगार से वंचित कर दिए गए हैं। तो दिग्विजय के समय दिखी वह पीड़ा अब कहां जा छिपी है? जिन्होंने शराब की दुकानों पर पत्थर बरसाए, वह क्या सरकार की तरफ एक कंकड़ फेंककर यह पूछ सकेंगी कि इन हजारों लोगों के रोजगार की कोई वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी या उन्हें उनके ही हाल पर छोड़ दिया जाएगा? फिर सवाल तो यह भी उठता ही है कि यदि शराब को लेकर इतनी ही चिंता थी तो आठ महीने के कार्यकाल में खुद ने इस दिशा में कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठाया? अहाते तो तब भी धड़ल्ले से चल रहे थे।
एक अनुमान के अनुसार अहाते राज्य के उन करीब साठ लाख लोगों के लिए बैठकर पीने का अड्डा थे, जो बड़े और महंगे बार में नहीं जा सकते। महज दस से बीस रुपए वाले शुल्क के साथ वे वहां अपनी खरीदी शराब का सेवन कर लेते हैं। अब ऐसे लोग क्या करेंगे? हो सकता है कि इनमें से एक या दो प्रतिशत घर को ही ठिकाना बना लें, लेकिन बाकी के लिए यह तय है कि अब वह खुले में छिपते-छिपाते ही अपनी तलब को पूरा कर पाएंगे। यानी हमने एक उस कुव्यवस्था का मार्ग खोल दिया है, जो राज्य में वाहनों के जरिए ‘चलित मदिरालय या ‘पैदल मदिरालयों की प्रवृत्ति को कुकुरमुत्तों की तरह पनपा देगी। क्योंकि इस नीति में यह उल्लेख ही नहीं है कि अहाते बंद होने के बाद उनमें बैठकर पीने वाले अब शौक को किस जगह पूरा कर सकेंगे? न ही यह बताया गया है कि खुले में शराब पीने वालों पर क्या कार्यवाही होगी। इससे आम लोगों में यह डर पनपने लगा है कि अब अहाते की जगह जगह-जगह शराब पीने के अघोषित कुटीर उद्योग पनप जाएंगे। जो बुराई अहातों के अंदर उदरस्थ कर ली जाती थी, उसकी सार्वजनिक रूप से भयावह नुमाइश होने लगेगी।
शराब के लिए एक रोचक बात की जाती है। बड़ा आदमी सेवन करे तो ‘ही ड्रिंक्स कहा जाता है और छोटे आदमी की बात आते ही ‘बेवड़ा है कह दिया जाता है। सरकार के रविवार के फैसले से ‘ही/शी ड्रिंक्स वालों की सेहत और फितरत पर कोई अंतर नहीं होगा, लेकिन ‘बेवड़े वाले वर्ग के लिए सरकारी प्रतिबन्ध की काट तलाशने के गरज से कई गलत मार्ग खोलने की विवशता का पुख्ता प्रबंध कर दिया गया है। मतलब ये कि सरकार भी ‘ड्रिंक और ‘पीने के बीच विभेद करने वाली मानसिकता से खुद को नहीं बचा सकी।
यदि अपनी पूर्ववर्ती के लिए आपका इतना आदर है, तो फिर अपने आदर्श के लिए भी इसी तरह का सम्मान दिखा दीजिए। जब आप नरेंद्र मोदी के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं तो यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उन्हीं मोदी के समय से गुजरात में नशाबंदी लागू है। भले ही वह पूरी तरफ सफल न हो, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में मोदी और उनके पश्चातवर्तियों ने भी राजस्व की भयानक हानि सहने के बावजूद इस निर्णय को कायम रखा है। यदि शराब को लेकर इतनी ही फि़क्र है, तो फिर यह कदम मध्यप्रदेश में भी उठा लीजिए। दिखा दीजिए कि आप अपने सिद्धांतो के चलते हर साल 15 हजार करोड़ के राजस्व की क्षति सहते हुए समाज को क्षत-विक्षत करने वाली शराब को चलने नहीं देंगे। लेकिन ऐसा होना संभव नहीं दिखता। क्योंकि शराब लॉबी वह ‘तरल कुबेर वाला ठिकाना है, जिसके मोहपाश से मुक्त होना नामुमकिन हो चुका है। और यह बात राजस्व की ही नहीं, बल्कि उस राज की भी है, जो इस लॉबी के कर्ताधर्ताओं के शुभ-लाभ की आड़ में कुछ लोगों के आर्थिक हितों के संवद्र्धन का बहुत बड़ा माध्यम है।
कमजोर तबके के साथ यह व्यवहार ठीक वैसा है, जैसे किसी बुरे कहे जाने वाले पेड़ की टहनियां छांट दी जाएं, लेकिन उसकी जड़ के लिए खाद-पानी का पूरा प्रबंध पहले की ही तरह सुनिश्चित रखा जाए। स्कूल और धार्मिक स्थलों से सौ मीटर पहले शराब की दुकानों की अनुमति न देना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। क्योंकि हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला से लेकर आज तक का ‘पीने वाला घर से निकलकर मदिरालय जाने की बीच की दूरी पर कभी भी ध्यान नहीं देता। यदि आप नयी दुकान न खोलने की नीति को लेकर अपनी पीठ थपथपाते हैं तो फिर यह भी जान लीजिए कि इसकी बजाय शराब के स्टॉक को सीमित करके ही इस बुराई पर रोक लगाई जा सकती है। बाकी तो प्रदेश में शराब की केवल एक दुकान कर दीजिए, उस पर भी पीने वालों की भीड़ हर कोने से टूट पड़ेगी। दरअसल यह शराब नीति उस नीट शराब की तरह है, जिसे पीकर कोई यह कहते हुए खुद की प्रशंसा कर सकता है कि ऐसा कर वह पानी की खपत को कम कर रहा है। बाकी तो बंद होने जा रहे अहाते और उनके मुकाबले सीना तानकर खड़े बार को देखकर एक शेर याद आ गया,
‘गुलची, बुरा किया जो ये तिनके जला दिए। था आशियाँ, लेकिन तेरे दामन से दूर था।