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लघुकथा: प्रेक्टिस

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रेल के लंबे सफर में मैं अकसर दिन भूल जाया करता हूं। सो मैंने सामने की सीट पर बैठे नौजवान से पूछा आज दिन कौनसा है।

शनिवार उसने बिना हिचकिचाए कहा। मैं सोच में पड़ गया कि रविवार को रेल चली है और अगर बीच का दिन कहीं मिस भी हो गया होगा तो बड़ी हद आज मंगल होगा।

वक्त?

शाम के पांच बज रहे हैं। उसने फिर बिना झिझक कहा। मैंने सोचा इतनी देर तक तो मैं नहीं सो सकता। उजाला सुबह जैसा है। चार्जिंग पर लगे फोन को उठा कर देखा तो दिन के साढ़े दस बज रहे थे। वार भी सोमवार ही था। मैंने उसकी तरफ सवालिया नज़रों से देखा। वो मुस्कुरा दिया और कहने लगा – वो क्या है ना अंकल कि मैं न्यूज़ चैनल में एंकरिंग की तैयारी कर रहा हूं। अभी इंटर्नशिप पर हूं। सो झूठ बोलने की प्रेक्टिस कर रहा हूं। सिर्फ इतना ही काफी नहीं कि मैं धड़ल्ले से जानते बूझते गलत बोलूं, मुझे यह भी प्रेक्टिस करना है कि झूठ बोलने पर मुझे कोई गिल्टी फील ना हो।

केरल ब्लास्ट के बारे में क्या विचार है? मैंने सोचा बेचारे की तैयारी करा दी जाए।

हमास ने कराया है। उसने छूटते ही कहा। वो भी समझ गया कि मैं उसकी प्रेक्टिस करा रहा हूं। वो थोड़ा मुस्कुराया भी।

देश का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री कौन है? उसने वही नाम बताया।

देश की हर समस्या के लिए जिम्मेदार कौन है? उसने नेहरू का नाम लिया।

मैंने अपनी सीट से उठकर उसकी पीठ थपथपाई। उसने कहा थैंक्यू अंकल।
दीपक असीम

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