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अल्पकालीन आवरण है श्रृंगार?

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शशिकांत गुप्ते

मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए बेमुदत चलाई जाती है मुद्देहीन बहस।
समाचार माध्यमों के संचालक समाचार माध्यमों की जीवन बूटी टीआरपी की जुगाड़ की जुगत में रातदिन लगे रहतें हैं। साथ ही मीडिया के एंकरों की जितनी स्तुति की जाए कम है?
कुछ समाचार माध्यमों के एंकर निष्पक्ष होने का अभिनय करतें हैं। एंकर यह भूल जातें हैं कि, अभिनय बगैर श्रृंगार के होता ही नहीं है। जैसे ही श्रृंगार उतरता है, वास्तविकता प्रकट हो जाती है। यह अटल सत्य है कि, श्रृंगार कभी भी स्थाई नहीं रहता है।
सत्ता से प्रश्न पूछने के लिए मानसिक रूप से सजग होना जरूरी है। सजग व्यक्ति ही बेबाक तरीके के सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस कर पाता है?
सबसे पहले “प्रश्न” इस शब्द को व्याकरण की परिधि से बाहर लाना जरूरी है। प्रश्न का व्यवहारिक प्रयोग करने की क्षमता ही लोकतांत्रिक सोच है।
दुर्भाग्य से सजग कहलाने वाले प्रहरी ही सत्ता का स्तुतिगान गा रहें हैं। सत्ता का स्तुतिगान गातें हुए गलती से सत्ता की गौद में स्वयं को सुरक्षित समझतें हैं।
स्तुतिगान में इतने निमग्न हो जातें हैं कि, जो प्रश्न सत्ता से पूछने चाहिए,ये लोग विपक्ष से पूछतें हैं? ये लोग जब मीडिया हाउस में बहस करवातें हैं। तब विपक्ष के प्रवक्ता द्वारा सत्तापक्ष से प्रश्न पूछने पर ये एंकर इतने असहज हो जातें हैं। इन्हें ऐसा लगता है कि, विपक्ष के प्रवक्ता ने सत्तापक्ष से प्रश्न पूछ कर इनकी ही दुःखती रग पर हाथ रख दिया हो?
इनलोगों की कार्यविधि देखकर एक व्यवहारिक प्रश्न जेहन में उपस्थित होता है? क्या ये लोग जनता की बुनियादी मुद्दों से अनभिज्ञ हैं? या सत्ता की सेवा में ये लोग कोई कोताही करना नहीं चाहतें हैं। इनलोगों ने ऐसा कौनसा ऐनक पहना है, जिसके पहनने के बाद इन्हें गिरता रुपया दिखाई नहीं देता?
इनके सामान्यज्ञान को जागृत करने के इन्हें महान अर्थतज्ञ की सूक्ति याद दिलानी पड़ेगी, रुपया गिरता है तो,देश के साथ प्रधानमंत्री की साख भी गिरती है।
सम्भवतः इनके कर्ण बधिरता के शिकार हो गएं हैं। इसलिए इन्हें बेरोजगारों का आक्रोश और भुखमरी से बेहाल लोगों का दर्द सुनाई नहीं देता है? विदेश से लाए गए चीतों के लिए मृग प्रजाति के सैकडों चीतलों को चीतों के समक्ष भोजन के रूप में परोसने की खबर को भी गायब कर देतें हैं?
सजगप्रहरियों का कर्तव्य होता है, देश में साम्प्रदायिक सद्भाव बनाएं रखना,लेकिन धर्म और मज़हब की बहस के समय इनकी संवेदना पर ही प्रश्न उपस्थित होता है?
आश्चर्य तब होता है,जब बुलडोजर की अलोकतांत्रिक कार्यवाही को बुलडोजर पर सवार होकर महिमामण्डित किया जाता है। लेकिन किसी जघन्य अपराध के साक्ष मिटाने के लिए चलाए गए बुलडोजर पर सिर्फ औपचारिकता निभाई जाती है? हो गई कर्तव्य की इतिश्री?
स्वाभाविक है कि, ये लोग उन महान लोगों के कुतर्क से सहमत ही होंगे जो कहतें हैं,देश में महंगाई है ही नहीं?
बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी।
ये लोग भूल जातें हैं कि,
परिवर्तन संसार का नियम है,जो आवश्यम्भावी है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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