-सुसंस्कृति परिहार
महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध सरकार से ये उम्मीद हरगिज़ इन पहलवान महिलाओं ने नहीं की होगी कि उनकी मांग इस तरह खारिज हो जाएगी। लोकतांत्रिक तरीके के तहत उन्होंने सबसे पहले अपने पी एम से मिलकर बृजभूषण शरण सिंह की करतूतों से वाकिफ कराया फिर कार्रवाई का इंतजार किया। जनवरी में कुछ नहीं हुआ तो वे जंतर-मंतर पर अपनी बात सरकार के हुक्मरानों तक पहुंचाने बैठ गई।एक बार फिर आश्वासन मिलने के बाद वे आश्वस्त हो गई कि शायद अब हल निकलेगा।। अफ़सोसनाक उनकी बात किसी ने नहीं सुनी तब उन्होंने फिर जंतर मंतर पर बैठकर जन जन तक अपनी बात पहुंचाने का संकल्प लिया।उनके इस संकल्प के बाद ना केवल सामाजिक कार्यकर्ता,लेखक, नागरिक समाज और खाप पंचायतों का भी उन्हें समर्थन मिलाबल्कि देश के अलावा अन्तर्राष्ट्रीय जगत के खिलाड़ियों समेत कई देशों के मानवाधिकार कार्यकर्ता भी उनके समर्थन में मुखर हुए।

सरकार की नाक के नीचे जब यह आंदोलन व्यापक होने लगा तो सरकार की भृकुटी और तन गई ।दिल्ली पुलिस उनके ज़रुरत के सामानों को हटाने में ना केवल जुटी साथ साथ अभद्र व्यवहार भी हुआ लेकिन अपने समर्थकों की भीड़ ने उन्हें हतोत्साहित नहीं होने दिया वे मुकाम पर डटी रही।इसी बीच नवनिर्मित संसद भवन के उद्घाटन की बेला में संसद भवन की ओर कूच करती पहलवानों के साथ जिस असंगत और कमीनेपन का व्यवहार हुआ उसे देख कर दुनिया हिल गई।इतना ही नहीं बृजभूषण पर एक नाबालिग पहलवान युवती ने जो यौन शौषण के आरोप लगाए थे उसने दबाववश वापिस ले लिए इससे बृजभूषण के डर्टी खेल का खुलासा हो जाता है। रसूखदार लोगों के लिए यह बहुत सहज सरल काम है और कई यौनिक मामलों में यह खुल्लमखुल्ला हुआ है।यहआश्चर्यजनक नहीं।
इन सब आंचों से गुज़रते हुए महिला पहलवानों का निर्णय यह स्पष्ट कर देता है कि आज के दौर में यदि आपने किसी रसूखदार से पंगा लिया है तो सच मानिए आप कितनी ही राष्ट्र की दुलारी हों, देश के लिए कितनी भी मेहनत कर देश का माथा ऊंचा किया हो कोई मायने नहीं रखता। इन पहलवानों के साथ हुए सरकार के व्यवहार को देखकर आज हर महिला अपने को डरा हुआ महसूस कर रही है।देश में इस भयावह दौर में जाने कितनी महिलाएं इस संकट से जूझ रहीं होंगी।इस घटनाक्रम को देखकर उनकी बोलती बंद हो गई होगी। वैसे भी देश में ऐसे अय्याशों द्वारा बलत्कृत लड़कियों की संख्या बहुतायत में पुलिस थानों में दर्ज हैं किंतु इक्का दुक्का मामले के अलावा सब मौज में हैं राजनैतिक सत्ता भोगियों का कहना ही क्या ? स्त्रियों को कमजोर करने का पाठ मनुवादियों की संहिता में मिलता है वह आज तक इतने बड़े कथित लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मसार करने वाला है।यह इसी का एक उदाहरण है।
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे।स्त्री जात को बचपन से ही यह सलाह दी जाती है कि वह कम से कम बोलें अपनी जुबान ज्यादा ना चलाए। इसी तथाकथित संस्कृति ने सदियों से स्त्रियों को ना केवल ठगा है बल्कि उनका भरपूर शोषण भी हुआ है ।आंकड़े बताते हैं कि जब से स्त्री ने शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई है तब से उन पर सामूहिक बलात्कार के मामले बढ़े हैं निर्भया कांड के बाद आए कानून के बाद एक और परिवर्तन देखने में आया कि अब यौनशोषित युवतियों, बच्चियों को ज़िंदा भी रहने नहीं दिया जाता ताकि कोई सबूत ही शेष ना रहे। मर्दवादी समाज में आज भी बड़ी संख्या ऐसे पुरुषों की है जो स्त्रियों की इस अभिव्यक्ति की आज़ादी के खिलाफ हैं जो स्त्रियां आज बाहर निकल काम पर जा रही हैं उन्हें भी मर्दवादी सोच से दो चार होना पड़ता है।
घर हो या बाहर स्त्री हर जगह प्रताड़ित है वह सब कुछ ख़ामोश रह कर सह लेती है बस यही से उस पर अत्याचार या शोषण सिलसिला बढ़ता है जब हद हो जाती है तब वह आत्महत्या की ओर बढ़ जाती है या ग़लत रास्ता अख्तियार कर लेती है जिससे उसकी ज़िन्दगी नारकीय बन जाती सामाजिक व्यवस्था में उसको बुरी नज़र से देखा जाने लगता है।कभी कभी वह अति विश्वास और आगे बढ़ने की ललक में अपना तमाम जीवन होम कर देती है।
महिला सशक्तिकरण की दुहाई देने वाली सरकार एक ओर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का भरपूर प्रचार करती है वहीं बेटियां आज सरकार के इस व्यवहार से पशोपेश में हैं। नाज़ुक संवेदनशील लड़कियां और महिलाएं राजनेताओं और बाबाओं के लिए शुरू से एक इस्तेमाल की वस्तु रहीं हैं वहीं सामाजिक तौर पर पर भी परिवार और समाज में भी उसे वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वो अधिकारणी है।उच्च पदस्थ और रसूखदार राजनैतिक महिलाओं का चरित्र भी इस दौरान उजागर हुआ जिन्होंने इन पहलवान पीड़ित महिलाओं का साथ नहीं दिया।यही वह कमज़ोरी है जिसने इन पीड़िताओं को आंदोलन वापस लेने मज़बूर किया।जाने कब हमारा समाज जागेगा और स्त्री को स्त्री का समर्थन मिलेगा जो उसे अकूत ताकत देगा और मर्दवादी समाज को सोचने लाचार कर देगा।
दुख होता है पहलवान आंदोलन का इस तरह अवसान होना। जिन्हें अपनी भुजाओं पर भरोसा था जो पटकनी में माहिर हैं उनकी ये स्थिति वस्तुत:यह उनके लंबे समय तक खामोश रहने के कारण ही हुआ।काश उन सबने बिना देर किए उस कुश्ती संघ के अध्यक्ष को पटकनी दे दी होती। हालांकि इसके पीछे भी उनकी घबराहट थी और इकट्ठा होने की मज़बूरी। बहरहाल अब आशा अदालत से करना लाजमी है किंतु अदालत को हर हाल में सबूत चाहिए वरना रसूखदार तो अदालतों पर भी हावी हो जाते हैं। आजकल तो लोकतांत्रिक अधिकार सब पंगु हो चुके हैं और बहुतेरी महिलाएं प्रलोभन की शिकार हैं।
बहरहाल इस हृदय झंकृत कर देने वाले आंदोलन का सच हम सब के लिए सबक है और चेतावनी भी कि महिलाओं को दृढ़ संकल्पित होकर हर मामले में त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए ख़ामोशी तोड़नी चाहिए और ऐसे धूर्त चेहरों को बेनकाब कर उनके रुखसती की इबारत लिखने में कोताही नहीं करनी चाहिए।बिना निर्भीक हुए ऐसे लोगों से निपटना कठिन है। महिलाएं परस्पर कटुता का परित्याग करें।सब साथ चलें तभी बात बनेगी।
अन्यथा वे इस त्रासदी को झेलने विवश होती रहेंगी। देखें पंकज चतुर्वेदी की ये कविता अगर आपके पास ताक़त है /तो आप असहमति को दबोच सकते हैं /
और फिर/मुस्करा सकते हैं /लोकतंत्र /दबोची हुई/निरीहता पर /ताक़तवर की मुस्कान है जिससे जनता को लगता रहे /कि मार रहा शख़्स /मेहरबान है।