Site icon अग्नि आलोक

संकेत ही पर्याप्त है “समझदार को?

Share

शशिकांत गुप्ते

एक संत अपने आश्रम में बैठे थे। उनका एक परम शिष्य उनके पास ही खड़ा था। शिष्य ने देखा संत के दर्शन करने एक व्यक्ति आश्रम में प्रवेश रहा है।
आगंतुक को देख शिष्य ने संत से कहा,ये जो व्यक्ति आपके पास आ रहा है, ये व्यक्ति दुराचारी है।
संत ने अपने शिष्य से कहा,तुम क्यों परेशान होतें हो। बीमार आदमी ही चिकित्सक के पास जाता है। वो अपने आश्रम में आएगा, सत्संग में सम्मिलित होगा तो वह भी पवित्र हो सकता है।
ऐसा ही एक वाकया,संत गुरुनानकजी के साथ हुआ है। संत गुरुनानकजी ईश्वर भक्ति में तल्लीन होकर भजन गा रहे थे, इस समय कुछ लुटेरे वहाँ लूट करने के इरादे से आए थे। उन लुटेरों ने गुरुनानकजी के मुखारबिंद से भक्तिमय भजन सुने तो उन लुटेरों का भी हॄदय परिवर्तन हो गया।
उपर्युक्त कथनों से सिद्ध होता है कि,संगति का असर होता है।
इतना लिख पाया था,उसी समय मेरे घनिष्ठ मित्र सीतारामजी का मेरे घर आगमन हुआ।
सीतारामजी ने मेरा लिखा हुआ पढ़कर मुझसे कहा आप तो व्यंग्यकार हैं, दार्शनिक कैसे हो गएं हैं?
संगत का असर सत्संग में होना स्वाभविक हो सकता है,लेकिन व्यवहारिकता में असंभव है।
आप जब भी दार्शनिक अंदाज में लिखतें हो तब यह भूल जाते हो,अभी कलयुग चल रहा है।
कलयुग में जो होता है वह संत कबीरसाहब ने अपने दोहे में कहा है।
ज्ञानी को ज्ञानी मिले, रस की लूटन लूट
ज्ञानी से अज्ञानी मिले, होवे माथा कूट

यह तो हुई ज्ञान की उपदेशक बातें, व्यवहार में कोई भी किसी के साथ संगति करने में कोई परहेज़ नहीं करता है।
दूध के धुले लोग भी अपनी उदारता को प्रमाणित करने के लिए अनैतिक,और अनाचारियों से गलबहियां करने में कोई परहेज़ नहीं कर रहें हैं।
मैने सीतारामजी से पूछा इनदिनों दूध भी तो खालिस नहीं मिलता है,ऐसे दूध से धुले पाकसाफ कैसे हो सकतें हैं?
सीतारामजी ने कहा तुलसीबाबा ने कहा है समरथ को नहीं दोष गोसाई
इतना कहकर सीतारामजी ने विषयांतर करते हुए कहा, अब तो दूध भी महंगा हो जाएगा।
मैने कहा अभी तो ट्रेलर है फ़िल्म तो बाकी है।
Trailer का हिंदी में अनुवाद होता है,पूर्वावलोकन। यह तो महंगाई को इंतिहा तक पहुँचाने के पूर्व आमजन की इम्तिहान है।
संभव है,आने वाले समय में आमजन को निवाले भी गिन गिन खाना पड़ सकतें हैं।
निवाले की बात करते हुए मुझे प्रख्यात साहित्यकार स्व अमृता प्रीतमजी रचित इस कविता का स्मरण हुआ।
जीवन-बाला ने कल रात
सपने का एक निवाला तोड़ा
जाने यह खबर किस तरह
आसमान के कानों तक जा पहुँची
बड़े पंखों ने यह ख़बर सुनी
लंबी चोंचों ने यह ख़बर सुनी
तेज़ ज़बानों ने यह ख़बर सुनी
तीखे नाखूनों ने यह खबर सुनी
इस निवाले का बदन नंगा,
खुशबू की ओढ़नी फटी हुई
मन की ओट नहीं मिली
तन की ओट नहीं मिली
एक झपट्टे में निवाला छिन गया,
दोनों हाथ ज़ख्मी हो गए
गालों पर ख़राशें आयीं
होंटों पर नाखूनों के निशान
मुँह में निवालों की जगह
निवाले की बाते रह गयीं
और आसमान में काली रातें
चीलों की तरह उड़ने लगीं

सीतारामजी ने कहा आपने उक्त कविता के माध्यम से यथार्थ प्रकट कर दिया। इसे ही व्यंग कहतें हैं।
मैने कहा व्यंग्य को समझने के पहले भावनाओं के भ्रमजाल को साफ करना पड़ेगा। इनदिनों भावनाओं को भुनाने वाले बहुत सक्रिय हैं।
किसी शायर से क्या खूब कहा है।
सियासत कर गया कोई मेरे बेरंग मौसम से
आंधियों में उठती धूल भी सौंधी महकती है

बारिश के मौसम के शुरुआत में बारिश की हल्की बौछार से मिट्टी भी सौंधी महकती है।
लेकिन जब अतिवृष्टि होती है तब सर्वत्र कीचड़ ही फैलता है।
सीतारामजी ने कहा बस यहीं रुक जाओ, शेष सब पाठकों के विवेक पर छोड़ देना चाहिए।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Exit mobile version