-तेजपाल सिंह ‘तेज’
भारत का संविधान सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानव गरिमा की रक्षा का सबसे बड़ा दस्तावेज़ है। 1950 में जब इसे लागू किया गया, तो डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसे “एक जीवन्त प्रतिज्ञा” कहा था— ऐसी प्रतिज्ञा जो यह सुनिश्चित करेगी कि जाति आधारित अन्याय का अंत होगा और हर नागरिक को समान सम्मान मिलेगा। किंतु स्वतंत्र भारत के पचहत्तर वर्षों बाद भी, यह प्रतिज्ञा अधूरी प्रतीत होती है। संवैधानिक समानता के बावजूद सामाजिक विषमता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि न्यायपालिका, नौकरशाही और मीडिया जैसे संस्थान भी उससे मुक्त नहीं हो सके हैं।
हाल के वर्षों में तीन घटनाएँ—सुप्रीम कोर्ट के दलित मुख्य न्यायाधीश पर हमला, आईपीएस अधिकारी वाई पूरन कुमार की आत्महत्या, और दमोह में जातिगत उत्पीड़न—इस बात की गवाही देती हैं कि जातिवाद आज भी भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में एक छिपी हुई स्थायी संरचना है। इन घटनाओं की मीडिया प्रस्तुति और सत्ता की प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जातिवाद केवल ग्रामीण भारत की समस्या नहीं, बल्कि राज्य, न्याय और जनमत—तीनों के बीच की गूढ़ संधि बन चुका है।
1. न्याय के मंदिर में अपमान: दलित CJI पर हमला और उसकी सामाजिक प्रतिक्रिया:
अक्टूबर 2025 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट में एक अभूतपूर्व घटना घटी। भारत के मुख्य न्यायाधीश—जो देश के पहले दलित प्रमुख न्यायाधीशों में से एक हैं—पर एक व्यक्ति ने सार्वजनिक रूप से उनपर जूता फेंका। अदालत की गरिमा को भंग करने वाली यह हरकत केवल एक “सुरक्षा चूक” नहीं थी, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से यह उस गहरी सामाजिक मानसिकता की झलक थी जो अब भी दलित व्यक्तित्व को समान स्तर पर स्वीकार नहीं कर पाई है। हमलावर ने अपने बचाव में जो तर्क दिए, वे आधुनिक लोकतंत्र की असली चुनौती को उजागर करते हैं। उसने कहा कि वह “भगवान विष्णु के आदेश पर” यह काम कर रहा था, क्योंकि “मुख्य न्यायाधीश के विष्णु का अपमान और विदेश में जाकर ‘बुलडोजर न्याय, के विरुद्ध बयान दिया था।” धार्मिक भावनाओं की आड़ में न्यायाधीश पर हमला—यह न केवल विधि का अपमान है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि भारत में धार्मिक बहुसंख्यकवाद किस प्रकार संवैधानिक संस्थाओं पर नैतिक दबाव बनाता जा रहा है।
इस पर प्रधानमंत्री और सत्ताधारी दल की प्रतिक्रिया उल्लेखनीय रही। प्रधानमंत्री ने घटना के लगभग 9 घंटे बाद ट्वीट कर “घटना की निंदा” तो की, लेकिन यह निंदा एक सामान्य औपचारिकता भर रह गई। इसके विपरीत, उनकी पार्टी के प्रवक्ताओं ने आरोपी के प्रति सहानुभूति दिखाई और आरोपी के एक साथी ने यह कहा कि “सरकार हमारी है, व्यवस्था हमारी है।” इस कथन ने लोकतंत्र के उस मौलिक सिद्धांत को झुठला दिया जिसमें राज्य किसी जाति या दल की संपत्ति नहीं होता, बल्कि नागरिकों की सामूहिक संस्था होता है। सबसे चिंताजनक पहलू मीडिया की भूमिका रही।
कई प्रमुख चैनलों ने इस हमले को दलित विरोधी दृष्टि से नहीं, बल्कि “धार्मिक आस्था के विवाद” के रूप में प्रस्तुत किया। कुछ एंकरों ने तो 20 मिनट तक “भगवान विष्णु की परीक्षा” और “महर्षि भृगु की कथा” सुनाकर विषय को पूरी तरह धर्मग्रंथों की ओर मोड़ दिया। एक प्राइम टाइम शो में यह सवाल उठाया गया कि “जब दलित CJI बन गया तो फिर जातिवाद कहां दिखता है?” यह तर्क स्वयं जातिवाद की पराकाष्ठा है—क्योंकि वह यह मान लेता है कि कुछ प्रतीकात्मक उपलब्धियाँ पूरे समुदाय के दर्द को समाप्त कर देती हैं।
इस प्रकरण ने यह स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में दलित प्रतिनिधित्व चाहे कितना भी बढ़े, लेकिन सामाजिक स्वीकृति का अभाव अब भी बना हुआ है। दलित पहचान को सम्मान की दृष्टि से देखने की बजाय उसे “राजनीतिक लाभ” या “वोट बैंक” के रूप में देखा जाता है।
2. न्याय व्यवस्था के भीतर का जातिवाद: आईपीएस वाई पूरन कुमार की आत्महत्या:
दलित न्यायाधीश पर हुए हमले की चर्चा के समानांतर एक और त्रासदी घटी। हरियाणा के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी वाई पूरन कुमार—जो एक अनुसूचित जाति से आते थे—ने 7 अक्टूबर को चंडीगढ़ स्थित अपने आवास पर आत्महत्या कर ली। उनके पीछे छोड़े गए आठ पन्नों के सुसाइड नोट में उन्होंने साफ़ लिखा कि उन्हें “उनकी जाति के कारण अपमानित और प्रताड़ित” किया जाता रहा है। उन्होंने हरियाणा के तत्कालीन डीजीपी शत्रुजीत कपूर और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर उत्पीड़न का आरोप लगाया।
पूरन कुमार एक उच्च पदस्थ अधिकारी थे, परंतु उनके लिए भी जातिगत पहचान एक “अदृश्य बंधन” बनी रही। सुसाइड नोट में यह पंक्ति उल्लेखनीय है: “मेरी योग्यता को कभी मेरे काम से नहीं, हमेशा मेरी जाति से आँका गया।” यह वक्तव्य इस देश के प्रशासनिक ढांचे की सच्चाई बयान करता है। उनकी मृत्यु के बाद जो कुछ हुआ, वह और भी चिंताजनक था। छह/सात दिन उनका पोस्टमार्टम हुआ, और अंतिम संस्कार। आरोपियों पर केवल हल्की धाराएँ लगाई गईं, जबकि अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत यह गैर-जमानती अपराध है। यह मामला यह दिखाता है कि न्यायिक और पुलिस व्यवस्था के भीतर जातिगत एकजुटता किस प्रकार “संस्थानिक प्रतिरोध” बन जाती है—जहाँ आरोपी का बचाव संस्थागत तौर पर किया जाता है।
पूरन कुमार का प्रकरण केवल व्यक्तिगत आत्महत्या नहीं था; यह भारतीय राज्य के चरित्र पर गहरा प्रश्नचिह्न है। जब एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी, जो स्वयं कानून का संरक्षक है, अपने ही तंत्र से न्याय की उम्मीद छोड़ देता है, तो यह लोकतंत्र के नैतिक विफलता का सबसे भीषण उदाहरण है।
3. ज़मीनी भारत में जातिवाद का जीवित चेहरा: दमोह की घटना:
मध्य प्रदेश के दमोह जिले में घटित एक घटना ने यह स्पष्ट किया कि जातिवाद अब भी ग्रामीण समाज की रगों में किस हद तक व्याप्त है। कुशवाहा समुदाय के एक युवक ने सोशल मीडिया पर एक ब्राह्मण युवक का मज़ाक किया—जो अवैध शराब बेचने के आरोप में पकड़ा गया था। इसके जवाब में गाँव के तथाकथित “ब्राह्मण समाज” ने उस युवक पर 5,100 रुपये का सामूहिक जुर्माना लगाया और शराब बेचने वाले ब्राह्मण के पैर धोकर कुशवाह समाज के युवक को धोकर उस पानी को पिलाया भी और उसका सामाजिक बहिष्कार भी कर दिया। अपराध यह नहीं था कि उसने कोई असत्य कहा, बल्कि यह कि उसने एक “ऊँची जाति” के व्यक्ति की आलोचना करने की हिमाकत की। एक लोकतांत्रिक समाज में यह घटना हास्यास्पद लग सकती है, किंतु यह भारत के सामाजिक मनोविज्ञान का सटीक प्रतिबिंब है—जहाँ जाति अब भी सम्मान और अपमान का निर्धारक तत्व है।
ब्राह्मण युवक का अपराध—अवैध शराब बेचना—समाज की नैतिकता को नहीं झकझोरता, किंतु निम्न जाति के युवक द्वारा उसे उजागर करना “अपराध” बन जाता है। यह वह दोहरा मानदंड है जो दलितों को न केवल आर्थिक रूप से बल्कि नैतिक स्तर पर भी हाशिये पर रखता है। यहाँ यह सवाल उठता है– यदि संविधान ने सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, तो क्या यह स्वतंत्रता जाति के अनुसार बदल जाती है? दमोह की यह घटना बताती है कि गाँवों में सामाजिक न्याय का कोई औपचारिक ढाँचा नहीं, बल्कि जातिगत अनुशासन की एक प्रछन्न व्यवस्था चल रही है।
4. मीडिया और जातिवाद: विमर्श का विकृतिकरण:
इन घटनाओं की प्रस्तुति में मीडिया की भूमिका सबसे अधिक निर्णायक रही। भारत का मुख्यधारा मीडिया—विशेषकर टेलीविज़न न्यूज़ चैनल—अब लोकतंत्र के “चौथे स्तंभ” से अधिक, सत्ता के प्रचारक के रूप में कार्य कर रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश पर हुए हमले के बाद अधिकांश चैनलों ने इसे “धार्मिक आस्था” का विषय बना दिया। अंजना ओम कश्यप जैसे एंकरों ने विष्णु पुराण की कथाएँ सुनाईं; अमन चोपड़ा ने इसे बंगाल में बीजेपी सांसद पर हमले से तुलना करते हुए “राजनीतिक नैरेटिव” बना दिया; सुशांत सिन्हा और नविका कुमार ने इस घटना को “मोदी पर हमला” बता दिया। किसी ने भी मूल प्रश्न—दलित न्यायाधीश पर हमला क्यों हुआ—यह नहीं पूछा।
यह वही मीडिया है जो “जातिवाद समाप्त हो गया” कहने में गर्व महसूस करता है। उनके लिए एक दलित CJI का पद पर होना इस बात का प्रमाण है कि समाज में भेदभाव नहीं बचा। परंतु यही मीडिया दलितों पर अत्याचार की खबरों को या तो छोटा करके दिखाता है, या पूरी तरह अनदेखा कर देता है।
उदाहरण के लिए, जब वाई पूरन कुमार की आत्महत्या हुई, तो किसी प्रमुख चैनल ने इसे “ब्रेकिंग न्यूज़” नहीं बनाया। वही मीडिया राहुल गांधी की विदेश यात्रा पर घंटों बहस करता है, लेकिन दलित अधिकारी की आत्महत्या को “स्थानीय खबर” मानकर हाशिये पर रख देता है।
यह वर्गवादी और जातिवादी पत्रकारिता का परिणाम है। प्रमुख मीडिया संस्थानों में उच्च जातियों का प्रभुत्व इतना व्यापक है कि दलित या ओबीसी दृष्टिकोण वहाँ पहुँच ही नहीं पाता। न्यूज़ लॉन्ड्री, जनचौक, द वायर जैसी स्वतंत्र संस्थाएँ ही इस परिप्रेक्ष्य को उठाने का साहस दिखाती हैं। मीडिया का यह ढांचा केवल सूचना का नहीं, बल्कि दृष्टि का संकट है। यह जनमानस को इस तरह प्रशिक्षित करता है कि जातिगत उत्पीड़न की खबरें “असुविधाजनक सत्य” बन जाएँ।
5. आँकड़ों की गवाही: एनसीआरबी और दलितों पर बढ़ते अपराध:
भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट वर्ष 2023 में जारी हुई। इसमें अनुसूचित जातियों के विरुद्ध 57,789 अपराध दर्ज किए गए—जो 2022 की तुलना में अधिक हैं। इनमें हत्या, बलात्कार, सामाजिक बहिष्कार, भूमि विवाद और सार्वजनिक अपमान के मामले शामिल हैं। सबसे अधिक अपराध उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु में दर्ज हुए। रिपोर्ट यह भी बताती है कि 90% मामलों में आरोपी उच्च या सवर्ण जातियों से हैं, और 70% मामलों में अभियोजन की गति अत्यंत धीमी रही। यह आँकड़े केवल अपराध नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता को मापने का पैमाना हैं। दलितों के खिलाफ बढ़ते अपराध यह दर्शाते हैं कि सामाजिक चेतना अभी संविधान की भावना तक नहीं पहुँची है।
दलितों के प्रति हिंसा का एक बड़ा कारण “सामाजिक गतिशीलता” भी है। जैसे-जैसे दलित शिक्षा, प्रशासन या राजनीति में आगे बढ़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार उन्हें स्वीकार नहीं कर पाता। आईपीएस पूरन कुमार, दलित न्यायाधीश या गाँव का कुशवाहा युवक—तीनों इस अहंकार की भेंट चढ़े।
प्रतीकात्मक सफलता बनाम वास्तविक समानता
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि जब भारत में एक ओबीसी प्रधानमंत्री बन सकता है और एक दलित मुख्य न्यायाधीश, तो जातिवाद समाप्त हो चुका है। यह तर्क लोकतंत्र की सबसे बड़ी भ्रांति है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान समानार्थी नहीं होते। प्रधानमंत्री या न्यायाधीश के व्यक्तिगत पद से यह नहीं मान लिया जा सकता कि समाज में सभी दलित समान रूप से सुरक्षित हैं। जातिवाद अब राजनीतिक प्रतीकों के साथ सह-अस्तित्व में रहने लगा है। सत्ता में प्रतिनिधित्व तो दिखता है, लेकिन सामाजिक व्यवहार में बराबरी नहीं दिखती। आज भी दलित दूल्हों को घोड़ी पर चढ़ने से रोका जाता है, मंदिर में प्रवेश पर पीटा जाता है, और ऊँची जातियों के घर के सामने चप्पल पहनने पर अपमानित किया जाता है। यह दर्शाता है कि जातिवाद केवल सत्ता की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि मानसिक संरचना है। यहाँ डॉ. आंबेडकर की एक चेतावनी याद आती है—“राजनीतिक समानता यदि सामाजिक और आर्थिक असमानता के साथ चलती रही, तो लोकतंत्र एक मुखौटा बन जाएगा।” आज यही स्थिति भारत की है। प्रतीकात्मक समानता ने समाज को आत्मसंतुष्ट बना दिया है, लेकिन वास्तविक समानता अब भी दूर है।
7. न्यायपालिका, प्रशासन और मीडिया: मौन संधि की परतें:
इन तीनों संस्थानों—न्यायपालिका, प्रशासन और मीडिया—के बीच एक “मौन संधि” बन चुकी है। यह संधि कहती है कि जाति पर खुलकर चर्चा मत करो, क्योंकि इससे “राष्ट्र की छवि” पर असर पड़ता है। न्यायपालिका जातिगत प्रश्नों पर निर्णय देने से कतराती है; प्रशासन ऐसे मामलों को “आंतरिक मुद्दा” बताकर दबा देता है; और मीडिया उन्हें “संवेदनशील विषय” कहकर हटा देता है। यह त्रयी ही लोकतंत्र की असली चुनौती बन चुकी है। इस संधि का परिणाम यह है कि दलित उत्पीड़न को अब “राष्ट्रीय चिंता” नहीं माना जाता, बल्कि “स्थानीय असुविधा” समझा जाता है।
दलित अस्तित्व और लोकतंत्र की नैतिक परीक्षा:
भारत का लोकतंत्र अपने स्वभाव में बहुलतावादी है, लेकिन उसकी आत्मा तभी जीवित रह सकती है, जब उसके सबसे कमजोर नागरिक को भी न्याय का समान अवसर मिले। दलितों पर अत्याचार, न्यायपालिका में पूर्वाग्रह, और मीडिया की उदासीनता—ये सब मिलकर उस विश्वास को कमजोर कर रहे हैं जिस पर यह गणराज्य टिका है। भारत का लोकतंत्र अब एक नैतिक परीक्षा से गुजर रहा है। संविधान ने हमें समानता का वचन दिया, लेकिन समाज ने उसे आंशिक रूप में ही स्वीकार किया। यदि दलित IPS अधिकारी आत्महत्या को मजबूर है, यदि दलित CJI पर हमला करने वाला गर्व से कहता है कि “भगवान ने कहा था,” और यदि गाँव में एक युवक सिर्फ आलोचना करने पर अपमानित होता है—तो यह केवल व्यक्तिगत घटनाएँ ही नहीं, बल्कि उस सभ्यता के आईने भी हैं जो अभी भी अपने अतीत की बेड़ियों में जकड़ी हुई है।
आज आवश्यकता है कि राज्य, समाज और मीडिया—तीनों मिलकर आत्मावलोकन करें। सामाजिक न्याय केवल नीतियों से नहीं, बल्कि दृष्टि परिवर्तन से आएगा। जब तक दलितों की पीड़ा को “सामूहिक शर्म” नहीं माना जाएगा, तब तक यह लोकतंत्र अधूरा रहेगा।
भारत को “विकसित राष्ट्र” बनाने से पहले उसे “समान राष्ट्र” बनाना होगा—जहाँ किसी की पहचान उसकी जाति नहीं, बल्कि उसकी मानवता हो। यही संविधान की सच्ची भावना है, और यही इस युग का सबसे बड़ा संघर्ष।

