शशिकांत गुप्ते
“मौनं सर्वार्थ साधनम्”
कहा गया है “मौनं सर्वार्थ साधनम्।” मौन रहने से सभी कार्य पूर्ण होते हैं। महात्मा गाँधी कहते थे- मौन में अन्तर्शक्ति को जगाने का प्रभावशाली सामर्थ्य होती है। उनके अनुसार वह व्यक्ति, जो अपने जीवन में निरन्तर अनवरत सत्य की शोध कर रहा हो, मौन साधना का ही पथ पकड़ता है।
उक्त उपदेश आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयासरत लोगों के लिए है।
व्यावहारिक जीवन में मौन रहना मतलब अपने कर्तव्य के प्रति अपनी जवाबदेही से मुंह मोड़ना होता है।अपराध,अत्याचार,भ्रष्टाचार
अन्याय,बलात्कार,और भी जघन्य गुनाहों को होते देख,मौन रहना अहंकार के साथ अपनी नाकामी छिपाने के साथ उक्त गैर कानूनी कार्यों को अप्रत्यक्ष प्रश्रय देना ही होता है।
इसीलिए मौन रहने वालो के लिए यह भी कहा है,मौन मूर्ख का आभूषण है ऐसे लोग पर्दे की आड़ में छिप कर अपने बात करते हैं,यही तो छद्म मौन है।
वाचाल होना और मुखर होने में अंतर है। मुखर होना मतलब अपनी बात को सशक्त ढंग से प्रस्तुत करना। मुखर शब्द को व्यवहारिक तौर पर समझने के लिए, प्रख्यात समाजवादी विचारक चिंतक स्वतंत्रता सैनानी स्व. राममनोहर लोहियाजी ने कहा है,अगर सड़कें खामोश हो जांए तो संसद आवारा हो जाएगी
जनसमस्याओं के लिए,सर्वहारा समाज के लिए,शोषण के विरुद्ध आवाज उठाना ही मुखर होना है।
जो सिर्फ वाचाल होता है,उसे हमेशा झूठ का ही सहारा लेना पड़ता है,और एक झूठ छिपाने के लिए बार बार झूठ बोलना पड़ता है।
ऐसे लोगों के लिए संस्कृत का निम्न श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत है।
आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः।
बकास्तत्र न बध्यन्ते मौनं सर्वार्थसाधनम् ॥
“अपने मुँह बन्द न रखने के दोष के कारण तोता-कोयल आदि पक्षियाँ फँस जाते हैं। पर बगला कभी नही फँसता। (सही समय पर) मौन रहना सभी प्रयोजनों को सिद्ध करता है।”
मुखर लोग निम्न नारे को बुलंद करते हैं।
सच कहना अगर बगावत है
तो समझो हम भी बागी है
उपर्युक्त मुद्दे को समझने के लिए,एक शेर प्रस्तुत है।
शायर महेश चंद्र नक़्श फरमाते हैं।
हाल कह देते हैं नाज़ुक से इशारे अक्सर
कितनी ख़ामोश निगाहों की ज़बाँ होती है
समझने वालों के लिए इशारा काफी है
शशिकांत गुप्ते इंदौर

