अग्नि आलोक

*धूम्रपान और मोटापे जितना घातक स्वास्थ्य संकट:अकेलापन और अवसाद*

Share

कुमार सिद्धार्थ

अकेलापन अब सिर्फ़ भावनात्मक अनुभव नहीं रहा, बल्कि यह धूम्रपान और मोटापे जितना घातक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। यह युवाओं में आत्महत्या के जोखिम को कई गुना बढ़ाता है और बुजुर्गों में हृदय रोग व डिमेंशिया का बड़ा कारण बनता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य समस्या मानते हुए सामाजिक जुड़ाव को प्राथमिकता देने पर ज़ोर दिया है।

आपने कभी सोचा है कि अकेलापन सिर्फ एक भावनात्मक अनुभव नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य के लिए उतना ही हानिकारक हो सकता है जितना धूम्रपान या मोटापा? बुजुर्गों में यह हृदय रोग का कारण बन सकता है, और मजबूत सामाजिक संबंध मस्तिष्क के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं। एक शोध समीक्षा बताती है कि 18 से 29 वर्ष की उम्र में अकेलापन अपने चरम पर होता है। हर तीन में से एक युवा इस अनुभव से गुजरता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। वास्तव में, 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि अकेलेपन से आत्महत्या के जोखिम को 16 गुना तक बढ़ा सकता है ।

यही नहीं, हार्वर्ड की एक रिपोर्ट बताती है कि 18-25 वर्ष के हर तीन में से एक युवा अकेला महसूस करता है, और उनमें से आधे से ज़्यादा ने यह माना कि उनके जीवन में उद्देश्य या अर्थ की कमी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल वैश्विक स्तर पर 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं, जबकि आत्महत्या का प्रयास करने वालों की संख्या इससे लगभग 20 गुना अधिक होती है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन भी मानता है कि अकेलेपन और सामाजिक अलगाव की भावना आत्महत्या के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक हो सकती है।

अब ज़रा वृद्धावस्था की ओर देखिए। शोध बताते हैं कि अकेलेपन से डिमेंशिया का खतरा 31% तक बढ़ जाता है। ‘नेचर मेंटल हेल्थ’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट कहती है कि जो लोग अकेलेपन से जूझते हैं, उनमें भूलने की बीमारी (डिमेंशिया) होने की संभावना अधिक होती है। फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर मार्टिना लुचेती बताती हैं कि सामाजिक संपर्क की कमी और कम दोस्त होने से मेमोरी लॉस यानी याददाश्त खोने की समस्या बढ़ सकती है।

अब सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित है? नहीं। 2018 के एक अध्ययन ने दिखाया कि अकेलापन स्ट्रोक का खतरा 32 फीसदी और कोरोनरी हार्ट डिजीज का खतरा 29 फीसदी तक बढ़ा सकता है। जब लोग अकेला महसूस करते हैं, तो तनाव बढ़ जाता है, जिससे हाई बीपी और सूजन जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं।

शोध बताते हैं कि यदि अकेलेपन को कम किया जाए, तो अवसाद के मामलों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इसके लिए हमें सामुदायिक और व्यक्तिगत स्तर पर सक्रिय प्रयास करने होंगे। जब कोई व्यक्ति सामुदायिक कार्यक्रमों में भाग लेता है या सामाजिक समूहों से जुड़ता है, तो वह खुद को अधिक जुड़ा हुआ महसूस करता है। मनोवैज्ञानिक परामर्श और थेरेपी भी उन लोगों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है, जो लंबे समय से अकेलेपन का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा, डिजिटल प्लेटफार्मों का सही उपयोग करके परिवार और दोस्तों से जुड़े रहना, भावनात्मक मजबूती प्रदान कर सकता है।

ऐसे में, सामाजिक अलगाव और अकेलापन स्वास्थ्य और सामाजिक नीति अनुसंधान के महत्वपूर्ण विषय बन गए हैं।

दुनिया के कुछ देशों ने नई सदी के इस संकट को पहचाना है। अमेरिकी सरकार ने अकेलापन, सामाजिक अलगाव और सामाजिक संपर्क बढ़ाने के समाधान के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया है। अमेरिकी सरकार की तरफ से पिछले साल मई में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि महामारी से पहले भी देश के वयस्कों की लगभग आधी आबादी औसत स्तर के अकेलेपन से जूझ रही थी। डेनमार्क सरकार ने भी अकेलेपन को कम करने के लिए एक राष्ट्रीय पहल शुरू की है। इसमें सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देने और सामाजिक एकांत के प्रभावों को कम करने पर जोर दिया गया है। ब्रिटेन भी 2018 में ऐसा कर चुका है। पिछले पांच वर्षों में यहां कई योजनाएं शुरू की हैं, जैसे सरकारी अस्पतालों के रिसेप्शनिस्टों को अकेलेपन से जूझ रहे मरीजों की पहचान और उनके साथ बातचीत करने के सही तरीके बताने के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अकेलेपन को एक गंभीर जन स्वास्थ्य समस्या के रूप में स्वीकार किया है, जो दुनिया की एक चौथाई आबादी को प्रभावित कर रही है। यह केवल एक सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक ऐसी स्वास्थ्य चुनौती है, जो दीर्घकाल में कई शारीरिक और मानसिक बीमारियों को जन्म दे सकती है।

इससे निपटने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन  ने सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक वैश्विक आयोग की घोषणा की। इस आयोग में कुल 11 सदस्य शामिल हैं, जिन्हें तीन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपी गई हैं वैश्विक स्तर पर सामाजिक जुड़ाव को प्राथमिकता देने के लिए एक स्पष्ट एजेंडा तैयार करना, अकेलेपन और सामाजिक अलगाव के दुष्प्रभावों को लेकर जागरूकता फैलाना, साक्ष्य-आधारित समाधानों के लिए विभिन्न देशों, संगठनों और नीति-निर्माताओं के साथ सहयोग करना।

विश्व स्वास्थ्य संगठन  का यह कदम अकेलेपन को एक गंभीर स्वास्थ्य संकट के रूप में पहचानने और इसे कम करने के लिए ठोस प्रयासों को सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह आयोग दुनिया भर में सामाजिक संबंधों को मजबूत करने और मानसिक स्वास्थ्य पर इसके सकारात्मक प्रभावों को बढ़ावा देने का काम करेगा।

तो, क्या भारत में भी इस दिशा में कदम उठाने की ज़रूरत है? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि यहाँ अकेलापन केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरीकरण, डिजिटल लाइफस्टाइल और सोशल मीडिया की अधिकता के कारण युवा भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 50% बुजुर्ग अकेलापन महसूस करते हैं, और यह उनके मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। पर इससे बचने के उपाय क्या हैं? शोध बताते हैं कि सामाजिक सहभागिता बढ़ाने से, परिवार और दोस्तों से जुड़े रहने से, मनोवैज्ञानिक परामर्श लेने से और नियमित स्वास्थ्य जांच करवाने से अकेलापन कम किया जा सकता है।

भारत में अकेलेपन और अवसाद से निपटने के लिए वर्तमान में कोई विशिष्ट राष्ट्रीय नीति नहीं बनी है, जबकि कई अन्य देशों ने इस दिशा में पहल की है। 2015-2016 में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ‘नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे’ में भी अकेलेपन का जिक्र नहीं किया गया। हालांकि, मानसिक स्वास्थ्य को संबोधित करने के लिए सरकार ने कई पहलें की हैं। 2017 में, ‘मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम’ लागू किया गया, जो मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को सुनिश्चित करता है और मानसिक रोगियों के अधिकारों की रक्षा करता है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और सुदृढ़ीकरण किया जा रहा है। वहीं वर्तमान में, भारत में बुजुर्गों से संबंधित दो राष्ट्रीय नीतियां मौजूद हैं, लेकिन उनमें भी अकेलेपन पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। 1999 में जारी ‘राष्ट्रीय बुजुर्ग नीति’ में अकेलेपन का जिक्र सिर्फ एक बार हुआ है।

अकेलेपन और सामाजिक अलगाव की बढ़ती समस्या को देखते हुए, भारत में भी एक समग्र नीति की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जो मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक सहभागिता और सामुदायिक समर्थन को बढ़ावा देने पर केंद्रित हो। इन नीतियों में सामुदायिक जुड़ाव को प्रोत्साहित करना, मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को बढ़ावा देना, और सामाजिक समर्थन नेटवर्क को मजबूत करना शामिल हो सकता है। इससे न केवल मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच बढ़ेगी, बल्कि समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता भी बढ़ेगी। सवाल सिर्फ यह है कि हम इसके लिए कितने तैयार हैं?  (सप्रेस)

Exit mobile version