गांधीवादी और वन अधिकार कार्यकर्ता मोहन हीराबाई हीरालाल का 23 जनवरी 25 को नागपुर के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे गढ़चिरौली जिले के लेखा-मेंढा गांव में ‘मावा नाटे मावा राज’ आंदोलन के स्तंभ थे।गांधी-विनोबा के परिवर्तन के सिद्धांत न केवल प्रयोगात्मक थे, बल्कि उन्होंने लेखा-मेढा में आंदोलन के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया था कि वे किस प्रकार व्यावहारिक हो सकते हैं। लेखा-मेंढा गांव की ग्राम सभा ने अपने आसपास के जंगल के लिए वन अधिकार प्राप्त किया था, और मोहनभाई ने इसके लिए तीस साल तक लड़ाई लड़ी, जो कि सर्वोच्च न्यायालय तक गई।मोहन हिराबाई हिरालाल का जीवन एक प्रेरणास्रोत है, जिन्होंने निस्वार्थ भाव से ग्राम स्वराज की अवधारणा को साकार किया। उनका कार्य और विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायी हैं।मोहन हीराबाई हीरालाल के व्यक्तित्व / कृतित्व पर प्रकाशित आलेख।
कुमार सिद्धार्थ
गां धीवादी और वन अधिकार कार्यकर्ता मोहन हीराबाई हीरालाल का 23 जनवरी 25 को नागपुर के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे गढ़चिरौली जिले के लेखा मेवा गांव में ‘मावा नाटे मावा राज’ आंदोलन के स्तंभ थे। गांधी-विनोबा के परिवर्तन के सिद्धांत न केवल प्रयोगात्यक थे, बल्कि उन्होंने लेखा-मेढा में आंदोलन के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया था कि वे किस प्रकार व्यावहारिक हो सकते हैं। लेखा-मेंढ़ा गांव की ग्राम सभा ने अपने आसपास के जंगल के लिए वन अधिकार प्राप्त किया था, और मोहनभाई ने इसके लिए तीस साल तक लड़ाई लड़ी, जो कि सर्वोच्च न्यायालय तक गई।
मोहन हिराबाई हिरालाल एक समर्पित कार्यकर्ता थे, जिन्होंने बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, आदिवासियों, जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के लिए संपूर्ण निछ और जोश के साथ रचनात्मक लड़ाई लड़ी। ये गांधीजी-विनोबाजी के ‘जनशक्ति’ सिद्धांत में गहरी आस्था रगाते थे और उनके विचारों को व्यवहार में लाकर ‘ग्राम स्वराज’ की अवधारणा मोहन हीराबाई हीरालाल : ग्राम स्वराज के प्रेरणा स्रोत
मोहन हिरालाल मूल रूप से विदर्भ के चंद्रपुर जिले के निवासी थे। 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ आह्वान ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और ये सामाजिक कार्यों से जुड़ गए। ये जयप्रकाश नारायण की ‘छात्र युवा संघर्ष वाहिनी’ के सक्रिय सदस्य बने। गांधी और विनोबा के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने गढ़चिरौली जिले के मेड़ा (लेखा) गांव में ग्राम स्वराज की अवधारणा को मूर्त रूप दिया।
1984 में उन्होंने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में ‘वृक्षमित्र’ संस्था की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने वन संरक्षण, स्थायित्व, समानता और सुरक्षा जैसे तीन प्रमुख मुद्दों पर प्रभावी और व्यवस्थित प्रबंधन को अपनाया।
मोहन हिरालाल ने गढ़चिरौली जिले के मेंदा (लेखा) गांव में ‘माया नाटे माया राज’ आंदोलन की नीव रखी, जिसका उद्देश्य था ग्राम सभा को अधिक समावेशी, सहभागितापूर्ण और सक्रिय बनाना। उनके प्रयासों से गांव में महिला भागीदारी, शराबबंदी, वन संरक्षण और अधिकार, भ्रष्ठचार के खिलाफ लड़ाई, सांस्कृतिक अधिकार, युवा सशक्तिकरण, स्थिरता, समानता और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया गया।
मोहनभाई ने ग्रामीणों में जंगल पर उनके कानूनी अधिकारों के बारे में जागरूकता पैदा की। इससे स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सहभागी बन प्रबंधन को लोकप्रिय बनाने में मदद मिली।
तीन दशकों की सतत कानूनी लड़ाई के बाद, 2009 में वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत मेंक्ष (लेखा) और मार्दा गांवों को सामुदायिक वन अधिकार प्रदान किए गए। इस सफलता ने स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सहभागी वन प्रबंधन को लोकप्रिय बनाया।
2013 में मोहन हिरालाल और ग्रामीणों के अथक प्रयासों के बाद मेड़ा (लेखा) को ‘महाराष्ट्र ग्रामदान अधिनियम 1964’ के तहत ग्रामदान गांव घोषित किया गया। यह 35 वर्षों में देश का पहला ग्रामदान गांव बना। इस गांव ने ‘दिल्ली-मुंबई में हमारी सरकार, गांव में हम ही सरकार’ के नारे को साकार कर दिखाया।
मेंदा (लेखा) गांव ने यह उपलब्धि हासिल की जो पहले किसी गांव ने नहीं की थी। इस गांव की 500 की आबादी वाली ग्राम सभा की वार्षिक आय 1.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह सफलता अन्य गांवों के लिए मार्गदर्शक बनी।
उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित’जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
मोहन हिरालाल ने अपने जीवन में सादगी और सर्वोदय के सिद्धांतों का पालन किया। ये स्वनामधन्य होकर माता-पिता का नाम अपने आगे लगाने के प्रेरणालीत बने। 1978 में उन्होंने यह परंपरा शुरू की, जिससे प्रेरित होकर कई अन्य लोगों ने भी इसे अपनाया।
हाल के दिनों में उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई है। हाल ही में नागपुर में उनके 75वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में एक समारोह का आयोजन किया गया था, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वे इसमें शामिल नहीं ही सके। उस समय गढ़चिरौली जैसे दूरदराज के इलाकों से जुटी भीड़ उनके काम का प्रमाण थी।
डॉ. लता प्रतिभा मधुकर ने मोहन हिरालाल को याद करते हुए कहा कि वे 48 वर्षों से जन आंदोलन में उनके करीबी साथी रहे। उन्होंने जंगल और आदिवासी लोकतांत्रिक विरासत बचाने की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, ‘मोहन एक बहुत संवेदनशील और प्यारा दोस्त था, जो प्रकृति से प्यार करता था, खूब घुमकड़ था और सवोदय के अनुशासन को निभाता रहा। सादगी भरा जीवन भी कितना सुंदर हो सकता है, इसकी मिसाल थे मोहन
हीराबाई हीरालाल।
पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, ‘चार दशकों तक उन्होंने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और चंद्रपुर जिलों में अधक काम किया। उनके समर्पण ने 27 अप्रैल 2011 को मेड़ा (लेखा) को देश की पहली ग्राम सभा बनने का मार्ग प्रशस्त किया, जिसे सामुदायिक वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत बांस के व्यापार के सभी पहलुओं पर पूर्ण नियंत्रण मिला। वे पके गांधीवादी थे, जो विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण से प्रेरित थे। चार दशकों तक महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में वाह बिना थके लगातार मेहनत करते रहे।’
मोहन हीरालाल का सर्वोदय प्रेस सर्विस (सप्रेस) के साथ भी लंबा जुड़ाव रहा है। 80-90 के दशक में ग्राम स्वराज्य के प्रयोग पर उन्होंने कई आलेख सप्रेस के साथ भी साझा किये और उनके अनुभवों को सप्रेस द्वारा प्रसारित किया जा रहा। जन आंदोलनों के दौरान उनका मध्यप्रदेश प्रवास भी होता रहा और उन्होंने सप्रेस को अपनी भेट दी।
मोहन हीराबाई हीरालाल का जीवन एक प्रेरणास्रोत है, जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से ग्राम स्वराज की अवधारणा को साकार किया। उनका कार्य और विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायी हैं।
लेखक स्तंभकार है।

