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*मरकर भी काटता है सांप?* 

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     ~ पुष्पा गुप्ता

असम में तीन अजीबोगरीब घटनाएं घटीं थीं.  तीनों मामलों में मरे हुए सांपों ने कई घंटों बाद इंसान को काटा. इन घटनाओं में सांप की जो प्रजातियां शामिल थीं, वो थीं मोनोकल्ड कोबरा और ब्लैक क्रेट. ये दोनों ही भारत में पाए जाने वाले सबसे ख़तरनाक सांप हैं.

     इन घटनाओं से यह सवाल उठता है कि क्या वाक़ई मृत सांप किसी व्यक्ति को काट सकता है और क्या मरने के बाद भी उसका ज़हर काम करता है. इस विषय पर एक अध्ययन किया गया है जिसके नतीजे बताते हैं कि ऐसा होना संभव है.

पहली घटना : 

(कोबरा के कटे सिर ने काटा)

      पहली घटना असम के शिवसागर ज़िले की है. 45 वर्षीय व्यक्ति ने अपने घर में एक सांप को मुर्गियों पर हमला करते देखा. उन्होंने सांप का सिर काट दिया.

    बाद में, जब व्यक्ति ने सांप के कटे हुए शरीर को ठिकाने लगाने की कोशिश की, तो सांप के सिर ने उन्हें अंगूठे में काट लिया. इससे व्यक्ति का अंगूठा काला पड़ गया. इससे तेज़ दर्द हुआ जो उनके कंधों तक पहुंच गया.

  उन्हें पास के अस्पताल ले जाया गया जहां उन्हें एंटी-वेनम दिया गया. वो पूरी तरह से ठीक हो गए.

दूसरी घटना : 

(ट्रैक्टर से कुचले गए कोबरा ने काटा)

   दूसरी घटना भी असम के इसी इलाके़ की है, जिसमें एक किसान के ट्रैक्टर के पहिए के नीचे आकर एक कोबरा कुचलकर मर गया था.

   इसके कुछ घंटों बाद जब व्यक्ति ट्रैक्टर से उतरा तो कोबरा ने उसे पैर में काट लिया. यह घटना सांप के मरने के कुछ घंटों बाद हुई.

   जिस जगह पर सांप ने काटा था वहां सूजन आ गई और व्यक्ति को उल्टियां शुरू हो गईं.

    25 दिनों तक उनका इलाज चला. उन्हें एंटी-वेनम और एंटीबॉडी दवाएं दी गईं और वो आख़िरकार ठीक हो गए.

तीसरी घटना :

 (ब्लैक क्रेट ने तीन घंटे बाद काटा)

तीसरी घटना असम के कामरूप ज़िले की है. यहां एक दिन शाम के करीब साढ़े छह बजे कुछ लोगों ने ब्लैक क्रेट को मारकर घर के पीछे फेंक दिया.

    तीन घंटे बाद, क़रीब साढ़े नौ बजे एक व्यक्ति उत्सुकतावश मरे हुए सांप को देखने गया. उन्होंने मरे हुए सांप को अनजाने में हाथों में पकड़ लिया.

   सांप ने उन्हें दाहिने हाथ की छोटी उंगली में काट लिया. परिवार ने शुरू में इसे नज़रअंदाज़ कर दिया, क्योंकि काटे गए स्थान पर न दर्द था और न ही सूजन. साथ ही उनके अनुसार सांप मर चुका था.

    लेकिन रात को क़रीब दो बजे व्यक्ति के शरीर में न्यूरोटॉक्सिन (नसों पर असर करने वाला ज़हर) का असर दिखने लगा. उन्हें घबराहट होने लगी और बदन में दर्द हुआ. शरीर के हिस्से भी सुन्न पड़ने लगे जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया.

   रिपोर्ट के अनुसार, व्यक्ति बच गया और उसे ठीक होने में 6 दिन लगे.

 तीनों घटनाओं पर विश्वास करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन विशेषज्ञ इस बात की पुष्टि करते हैं कि ऐसी घटनाएं होने का ख़तरा वास्तविक है.

    ये तीनों घटनाएँ असम में हुईं. शोधकर्ताओं ने इन घटनाओं के पीछे के कारणों को समझने के लिए एक अध्ययन किया.

    इस अध्ययन (ए केस रिपोर्ट ऑफ़ डेड स्नेक एमवेनोमिंग एंड ट्रीटमेन्ट यानी मृत सांप के काटने पर ज़हर का असर और उसका इलाज) की रिपोर्ट अब फ्रन्टियर्स इन ट्रॉपिकल डिसिसेस में छपी है.

     इस रिपोर्ट में इस बात पर चर्चा की गई है कि मरने के बाद या सिर कटने के बाद भी सांप के काटने की आशंका क्यों बनी रहती है. इस रिपोर्ट के अनुसार कुछ सांप मरने के तीन घंटे बाद भी किसी को काट सकते हैं. सांप के शरीर में मौजूद ज़हर तंत्र में कुछ घंटों तक ज़हर एक्टिव होता है और इसका असर व्यक्ति पर पड़ सकता है.

     यूनिवर्सल स्नेकबाइट एजुकेशन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के संस्थापक और मुख्य वैज्ञानिक डॉ. एनएस मनोज का कहना है कि ज़हरीले दाँतों वाली फ्रंट-फैंग्ड प्रजातियों में इसका जोखिम अधिक होता है, जैसे एलैपिडे, वाइपेरिडे और एट्रैक्टास्पिडिडे.

     फ्रन्टियर्स इन ट्रॉपिकल डिसिसेस में छपे अध्ययन में बताया गया है, “सांपों का ज़हर इंसान की लार जैसा होता है. ज़हर निकालने वाली ग्रंथि सांप के विषदंतों से जुड़ी होती है, ये प्रणाली सिरिंज की तरह काम करती है. जब सांप व्यक्ति को काटता है तो ज़हर ग्रंथी से निकलकर दांतों से होते हुए व्यक्ति के शरीर में पहुंच जाता है.”

    अध्ययन में कहा गया है, असम में एक मामले में सांप के कटे हुए सिर को पकड़ते समय, ग़लती से व्यक्ति से सांप की विष ग्रंथि दब गई होगी और अनजाने में ज़हर निकल आया होगा.

    व्यक्ति को अगर नींद में मच्छर काटे तो वो अनजाने में ही उसे उड़ा देता है. शरीर की इस हरकत का उसे अहसास नहीं होता. ये रिफ़्लैक्स ब्रेन से नहीं बल्कि रीढ़ की हड्डी से होता है.

     इंसानों में शरीर का नर्वस सिस्टम ब्रेन से होते हुए रीढ़ की हड्डी के रास्ते पूरे शरीर में पहुंचता है. इस पूरे सिस्टम को सेंट्रल नर्वस सिस्टम कहते हैं.

     इसी तरह मरने के बाद सांप का नर्वस सिस्टम पूरी तरह बंद नहीं होता. मरने के बाद भी उनके आंतरिक हिस्से धीरे-धीरे काम करना बंद करते हैं. कुछ दुर्लभ मौक़ों पर मरने के बाद भी रीढ़ की हड्डी की तरफ़ से काटने का रिफ़्लैक्स हो सकता है.

       इसके अलावा, अध्ययन में सांपों के फ़ॉल्स बाइट के बारे में भी बात की गई है. कभी-कभी ज़हरीले सांप अपने दुश्मन को काटते तो हैं लेकिन उनके शरीर में ज़हर नहीं इन्जेक्ट करते. इस तरह की फ़ॉल्स बाइट कर वो अपने दुश्मन को चेतावनी देते हैं.

     शरीर के काम को ब्रेन नियंत्रित करता है. सांपों में काटने के वक्त ज़हर ग्रंथी से ज़हर निकलने की प्रक्रिया और मात्रा को सांप कंट्रोल कर सकते हैं. दुश्मन को देखते हुए वो ये तय कर सकते हैं कि ज़हर ग्रंथी का पूरा ज़हर लेना काफी होगा या फिर फ़ॉल्स बाइट करनी है.

      अध्ययन में कहा गया है कि मृत सांप के शरीर में ये नियंत्रण ख़त्म हो जाता है. इसलिए शरीर में किसी हरकत (मरने के बाद भी) के कारण अगर मृत सांप के दांत किसी को गड़ जाते हैं तो ज़हर दांतों के रास्ते आ सकता है. सांप इसे नियंत्रित नहीं कर सकता, ऐसे में विष ग्रंथी में रखा सारा विष व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाएगा.

      रैटल स्नेक (एक तरह का वाइपर सांप) में इस तरह का व्यवहार देखा गया है. ये सांप की एक ऐसी प्रजाति है जो अमेरिका में सबसे आम हैं. ये सांप बेहद ज़हरीले माने जाते हैं.

      कर्नाटक में मौजूद कलिंगा फाउंडेशन में रिसर्च डायरेक्टर डॉ. एसआर गणेश ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया में भूरे सांपों और चीन में पाए जाने वाले कोबरा में इस तरह की घटनाओं की रिपोर्ट मिली है.

      भारत में पाए जाने वाले सांपों में इस तरह का सबसे अधिक ख़तरा रसेल वाइपर, सॉ स्केल्ड वाइपर, बैम्बू पिट वाइपर, मालाबार पिट वाइपर, कोरल स्नेक और बैंडेड पिट वाइपर प्रजातियों से हो सकता है.

    यहां तक ​​कि पानी में रहने वाले सांप जैसे कंडा कंडाई और नीरकोली, जो देखने में नुक़सान न करने वाले लग सकते हैं, वो भी ऐसा करते हैं.

   कई लोग मरे हुए सांप को उठाकर छूने के लिए आतुर रहते हैं. यह ख़तरनाक है. जिस तरह ‘इंसान के मरने’ को लेकर डॉक्टरी परिभाषाएं हैं, उस तरह सांप और अन्य सरीसृपों के लिए ऐसी कोई परिभाषा नहीं है. हम मान लेते हैं कि अगर कोई सांप कुचला गया हो या उसका सिर कटा हो या वो लंबे समय तक बिना हिले-डुले पड़ा रहे, तो वो मर चुका है.

   चाहे आप सांप को जीवित देखें या मृत, सबसे अच्छा उपाय यही है कि संबंधित जानकारों को इसके बारे में सूचित करें और उचित कार्रवाई करें.

     इसमें अंधविश्वास की भी अहम भूमिका है. तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में माना जाता है कि मर चुके हरे सांप को छूने से व्यक्ति बेहतर रसोइया बन सकता है. क्रेट और हरे सांपों के साथ-साथ कई ज़हरीले और यहाँ तक कि बिना ज़हर वाले सांपों में भी, क्रोधित होने पर काटने की प्रवृत्ति होती है. मरने के बाद भी उनके काटने का ख़तरा होता है. इसलिए अंधविश्वास के आधार पर इस तरह का कोई भी काम करने से बचना चाहिए.

     इस बात पर कोई विस्तृत अध्ययन नहीं है कि सांप के मरने के कितने समय बाद तक उसका ज़हर असरदार बना रहता है और कितने समय तक उसके काटने से ख़तरा हो सकता है.

     भारत में वन्यजीव संरक्षण क़ानून बहुत सख्त हैं, इसलिए सांप की जान लेना और उस पर इस तरह का अध्ययन करना संभव नहीं है. इसीलिए असम में हुई घटनाओं के आधार पर इस तरह के अध्ययन किए जाते हैं.

     असम में हुई घटनाओं को लेकर किए गए अध्ययन से ये नतीजा निकलता है कि सांप के काटने को लेकर आम लोगों में जागरूकता बढ़ाने की तो ज़रूरत है ही, साथ ही इस मामले में और गहन अध्ययन की ज़रूरत है.

     इसके अलावा इन घटनाओं पर किया गया शोध उन लोगों को ख़तरे से आगाह करता है जो सांपों को लापरवाही से और बिना सुरक्षा से पकड़ते या संभालते हैं.

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