प्रखर अरोड़ा
जगत सेठ ही देश थे। हिंदुस्तान के रॉथ्सचाइल्ड, याने हर धंधे में उनका निवेश, राजनीति और राजाओं पर पूरी पकड़। मौसम विज्ञानी भी थे, हवा का रूख देखकर पाला बदल लेते थे।
जगत सेठ नाम नही था, उपाधि थी। असल नाम तो मानिकचन्द था। ऊंचे लोग, ऊंची पसन्द.. वाले मानिकचन्द। उन्होंने मुगल बादशाह फर्रूखशियर को चुनावी चन्दा दिया था।
तब खुश होकर, बादशाह ने “सेठ ऑफ द वर्ल्ड” का टाइटल दिया। यह टाइटल पीढ़ी दर पीढ़ी चला।
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मानिकचन्द विशुद्घ जैन थे।
अंधेरा होने के बाद भोजन नही करते थे। लेकिन अंधेरे में शैडी डील्स अवश्य करते थे। राजाओं से, राजाओं के विद्रोहियों से, राजा के विरोधी दूसरे राजाओं से, और धीमे धीमे ताकतवर हो रही विदेशी कम्पनियों से। अब चाहे पुर्तगाली हों, फ्रेंच हो, या ब्रिटिश। जगत सेठ, जगत में सबके प्रिय थे।
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जैन साहब लोटा पोटली लेकर बिहार आये थे, फिर मुर्शिदाबाद में बसे। ब्याज के धंधे में थे। बोले तो एनबीएफसी। वो दूसरों के धंधे में पैसे लगाते। ब्याज भी कमाते, शेयर भी रहता।
फिर अपने लोगो को पोलिटिकल कनेक्शन से लाइसेंस दिलवाते, चुंगी में लाभ दिलाते, माल की सुरक्षित डिलीवरी, गोदाम, ट्रान्सपोर्ट सब कुछ आसानी से करवा लेते। इसका मतलब यह, कि कॉम्पटीटर्स का लाइसेंस, डिलीवरी, ट्रान्सपोर्ट सब भसका भी देते थे।
उत्तर भारत की तमाम सारी राजनैतिक जमात उनकी जेब में थी। बंगाल के तो वही रिजर्व बैंक थे। क्योकि सिक्के छापने का ठेका भी उन्ही को था।
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पैसे ,पावर के साथ तीसरी जरूरत होती है- नेटवर्किंग। जगत सेठ का नेटवर्क इतना तगड़ा था, कि सूबेदार लोग इनके नेटवर्क के जरिये नजारत का धन इधर से उधर करते।
बोले तो हवाला नेटवर्क ..
ब्लैक मनी..
इहाँ पईसा दो, उहाँ भंजा लो।
स्माल कमीशन.. हीहीही !!
जाहिर है इसका इस्तेमाल, राजविरोधी ताकतें ज्यादा करती हैं। तो इसका मतलब यह कि जगत सेठ, जिसकी चाहे, उसकी गद्दी पर खतरा बन सकते थे।
बने भी..
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जब सूबेदार अलीवर्दी खां दिल्ली से विद्रोह करके स्वतंत्र नवाब बन गया, उसकी पूरी मदद जगत सेठ ने की। सेठ ने अलीवर्दी खां के दौर में जितना कमाया, उतना तो मुगलों ने नही कमवाया था।
लेकिन उसके बाद जब सिराजुद्दोला गद्दी पर आया, हालात बदल गये। यंग बादशाह, आदर्शवादी, पराक्रमी। अंग्रेजी गोदाम में हमला करके, डेढ़ सौ अंग्रेजो को 10×10 की कोठरी में ठूंसकर ब्लैक होल करने वाला।
इधर अंग्रेजी व्यापार में, जगत सेठ गले गले तक डूबे थे। उन्होंने पाया, कि छोरा सेहत के लिए हानिकारक था। सिराज को पप्पू बनाना बहुत जरूरी था।
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तब के जगत सेठ, श्री मेहताब चंद ने मीरजाफर को अपना कैंडिडेट चुना। उसकी दौलत से उड़-उड़कर मीरजाफर ने तमाम दरबारियों, सेनानायकों को खरीद लिया।
प्लासी के मैदान जब सिराज, निर्णायक युद्ध लड़ने पहुँचा, तो उसकी अपनी पार्टी किनारे खड़े होकर तमाशा देखती रही।
सिराज अभिमन्यु की तरह लड़ा,
मगर खेत रहा।
कलकत्ते में क्लाइव की सेना घुसी। जगत सेठ की मुस्कान छुपाए न छुपती थी।
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तो अंग्रेज पिट्ठू मीरजाफर के राज में जगत सेठ, और उनके धनी गैंग को खुली छूट मिली। नतीजा राज्य की अर्थव्यवस्था ढह गई।
अंग्रेज मीरजाफर से जितना पैसा चाहते थे, वो राजव्यवस्था से निकाल न सका। अब मीरकासिम को नवाब बनाया गया।
कासिम होशियार था। उसने माली हालत सुधारने की कोशिश की। टेंडर वगैरह कॉम्पटीटिव हुए, टैक्स वाले हिसाब मांगने लगे। अब जगत सेठ को दिक्कत होने लगी।
वे कासिम को हटाकर वापस जाफर को लाने की कोशिश करने लगे।
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कासिम ने वो किया, जो सिराजुद्दोला को पहले ही करना था। उसने, जगत सेठ मेहताब चन्द को स्वर्ग प्रेषित किया।
और कालजयी डायलॉग बोला, जो हर जगत सेठ को याद रखना चाहिए। उसने कहा- आंड कितना भी बड़ा हो जाये.
खैर। आगे का कथन अश्लील है, औऱ ये पोस्ट हिस्ट्री है, वासेपुर मूवी नही।
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तो मेहताब का अल्पवयस्क लड़का जगत सेठ बना। अब तक कम्पनी, बंगाल के नवाब बन चुकी थी। लोन पर लिए पैसे ब्रिटिश दबा गए। अंग्रेजो ने सेठ के फाइनांस नेटवर्क पर कब्जा किया, सिक्को की टकसाल भी अपने हस्तगत कर, कलकत्ता ले गए। जगत सेठ का एम्पायर भस्म हो गया। सेठपुत्र को पेंशन दे दी गयी।
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मितरों !!!
व्यापार और राजनीति, दो अलग दुनिया हैं। मिक्स नही की जानी चाहिए। इतिहास गवाह है, जब जब पॉलिटिशियन व्यापारी बन जाये, या व्यापारी पॉलिटिक्स खेलने लगे, उसकी उल्टी गिनती शुरू हो जाती है।
लेकिन यह सबक हमारे युग मे बहुत से नेताओ, व्यापारियों और उनके समर्थकों को नही पता। इसलिए ही तो उल्टी गंगा बह रही है।
(चेतना विकास मिशन)

