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सामाजिक सरोकार:नैतिक बनाम अनैतिक

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शैलेन्द्र चौहान

समकालीन समाज की एक गंभीर विडंबना यह है कि धार्मिक कर्मकांडों की बाह्य सक्रियता जितनी तीव्र हुई है, नैतिक आचरण की आंतरिक चेतना उतनी ही क्षीण होती प्रतीत होती है। धर्म, जिसका मूल आशय मनुष्य के व्यवहार को शुचितापूर्ण, न्यायसंगत और करुणामय बनाना था, वह अनेक स्तरों पर प्रतीकात्मक क्रियाओं, सार्वजनिक आयोजनों और प्रदर्शनकारी आस्थाओं तक सीमित होता दिखाई देता है। परिणामतः व्यक्ति और समुदाय यह भ्रम पाल लेते हैं कि पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, यज्ञ-हवन या तीर्थयात्राएँ उनके समस्त नैतिक दायित्वों की पूर्ति कर देंगी, भले ही उनके व्यवहार में छल, शोषण या अन्याय विद्यमान हो।

भारतीय दार्शनिक परंपरा का मूल स्वर ऐसा कभी नहीं रहा। भगवद्गीता में ‘निष्काम कर्म’ और ‘समत्व’ को जीवन का श्रेष्ठ मार्ग कहा गया है। वहाँ यज्ञ का आशय केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीना है। धर्म को आचरण की शुचिता से जोड़ा गया, न कि मात्र विधि-विधान की पुनरावृत्ति से। इसी प्रकार संत परंपरा में कबीर ने पाखंड, आडंबर और अंधानुकरण पर तीखा प्रहार करते हुए स्पष्ट किया कि यदि व्यवहार में करुणा और सत्य नहीं है, तो उपासना निरर्थक है। उनके लिए ईश्वर मंदिर-मस्जिद के स्थापत्य में नहीं, बल्कि मनुष्य के अंत:करण में प्रतिष्ठित था।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब धर्म का बाह्य रूप उसकी आंतरिक नैतिकता पर हावी हो जाता है। अनुष्ठान, जो मूलतः आत्मानुशासन और आत्मशुद्धि के साधन हो सकते थे, सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करने का माध्यम बन जाते हैं। धर्म का उद्देश्य आत्ममंथन से हटकर आत्मप्रमाणन में बदल जाता है। व्यक्ति यह मानने लगता है कि धार्मिक गतिविधियों में सहभागिता ही उसके नैतिक उत्तरदायित्व का प्रमाण है। इस मानसिकता में धर्म आचरण का मार्गदर्शक नहीं, बल्कि सामाजिक छवि का आवरण बन जाता है।

इसी स्थिति में अंधविश्वास और अवैज्ञानिक दृष्टि के लिए अनुकूल वातावरण निर्मित होता है। जब धर्म का संबंध विवेक और नैतिकता से कट जाता है, तब वह प्रश्नविहीन आस्था का रूप ले लेता है। जटिल सामाजिक, आर्थिक या व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान तर्क, श्रम और नैतिक साहस के स्थान पर चमत्कारों, ज्योतिषीय उपायों या तथाकथित दैवी हस्तक्षेप में खोजा जाने लगता है। इस प्रवृत्ति से वैज्ञानिक चेतना कमजोर होती है और समाज में भय, अफवाह तथा छद्म-वैज्ञानिक दावों का प्रसार होता है।

अंधविश्वास का एक मनोवैज्ञानिक आयाम भी है। असुरक्षा, प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितता से भरे समय में व्यक्ति त्वरित समाधान चाहता है। कर्मकांड यदि उसे यह आश्वासन देता है कि विशेष अनुष्ठान से भाग्य बदल जाएगा, तो वह कठिन आत्मपरीक्षण और नैतिक परिश्रम की प्रक्रिया से बच निकलता है। इस प्रकार कर्मकांड सांत्वना का साधन बनकर विवेक को स्थगित कर देता है। धीरे-धीरे यह स्थगन सामाजिक स्तर पर अवैज्ञानिक दृष्टि में परिणत होता है, जहाँ प्रश्न पूछना भी अनुचित या अधार्मिक समझा जाने लगता है।

यह स्थिति केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। राजनीति में नैतिकता के भाषण और व्यवहार में अवसरवाद, शिक्षा में मूल्य-शिक्षा की औपचारिकता और संस्थागत भ्रष्टाचार, तथा सामाजिक जीवन में सार्वजनिक धार्मिकता और निजी अनैतिकता—ये सभी उसी प्रतीकात्मक नैतिकता के रूप हैं। बाह्य आस्था और आंतरिक आचरण के बीच का यह अंतर जितना बढ़ता है, समाज की नैतिक विश्वसनीयता उतनी ही क्षीण होती जाती है।

फिर भी यह स्वीकार करना आवश्यक है कि अनुष्ठानों का एक सांस्कृतिक और सामुदायिक महत्व है। वे परंपरा की निरंतरता, सामूहिकता की अनुभूति और भावनात्मक एकता को पुष्ट करते हैं। समस्या कर्मकांड के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके नैतिक और बौद्धिक आशय के लोप में है। यदि अनुष्ठान आत्मसंयम, सह-अस्तित्व और करुणा की प्रेरणा दें, तथा वैज्ञानिक दृष्टि और प्रश्नशीलता के साथ संवाद स्थापित करें, तो वे समाज को संतुलित दिशा दे सकते हैं।

अतः आज की आवश्यकता धर्म और नैतिकता के संबंध को पुनर्परिभाषित करने की है। धर्म को आचरण की पारदर्शिता, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनशीलता से जोड़ना होगा। साथ ही शिक्षा और सार्वजनिक विमर्श के माध्यम से वैज्ञानिक चेतना को सुदृढ़ करना होगा, ताकि आस्था विवेक के साथ सह-अस्तित्व में रह सके। जब धर्म करुणा और न्याय का प्रेरक बने तथा विज्ञान जिज्ञासा और तर्क का आधार प्रदान करे, तभी समाज अंधविश्वास और अनैतिकता की दोहरी विडंबना से मुक्त हो सकेगा।इस समन्वय के बिना न मानव कर्म-व्‍यवहार सार्थक होंगे, न नैतिकता स्थायी। आस्था यदि विवेक से संवाद करे और आचरण से प्रमाणित हो, तभी वह धर्म कहलाने योग्य है।

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