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नववर्ष/दिनकऱ : सोसल मिडिया के चाटुकारो की साहित्य में भी फेकबाज़ी

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आरती शर्मा

     _ये नव वर्ष तुम्हे  स्वीकार नहीं ठीक ! पर दिनकर का इस्तेमाल क्यों ?_

     कहीं की ईंट कहीं का  रोड़ा  लेकर भानुमति ने भी ऐसे कुनबे न जोड़े होंगे जैसे सोशल मीडिया के वीर यहाँ वहां की पंक्तियों को कभी महादेवी वर्मा ,कभी पंत या बच्चन के नाम पर डालकर बाकायदा कविता के तौर पर डाल रहे हैं .

बात सिर्फ इतनी नहीं है बल्कि बढ़ चुकी . अब सुनियोजित तरीके से एक कविताओं के नाम पर पूरा कूड़ा कोश

बन गया .

     इन कविताओं के वीडियो बन चुके जिसमें उसे चीख -चीख कर किसी सम्मानित कवि के नाम पर पढ़ा जाता है .

       पिछले कई नए सालों से पहले   ”ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं: राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ” के नाम पर सिर्फ सोशल मीडिया नहीं पूरे इंटरनेट को भर रखा है. इस काम में बीजेपी  के भी कई अच्छेखासे पढ़ेलिखे दिग्गज  लगे हुए हैं.

हिंदी का कोई सामान्य पाठक भी  जानता है  इस स्तर की कविता दिनकर जी की नहीं .इसलिए ये भी चुनौती देने की जरुरत नहीं कि बताएं दिनकर के किस कविता संग्रह या पुस्तक में है ये कविता ?

      हैरानी इस बात की है कि अखरोट की तरह दीखने वाला  ब्रेन आज अच्छे अच्छों के पास गायब है . किसी भी फ़र्ज़ी लेख ,कविता , उद्धरण कि जांच किये बिना सच मान लेते हैं  .

       ‘ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं’ से तो दिनकर जी का दूर -दूर का रिश्ता नहीं पर 1 जनवरी पर दिनकर जी क्या सोचते , क्या लिखा या उस दिन कैसे जिया ये पता करने की कोशिश क्यों नहीं होती ?

आइये दिनकरजी की डायरी के पन्ने पलटें .

      दिनकर की डायरी में 2  जनवरी 1961 से 31  दिसंबर 1972  तक की कुछ तारीखों के नोट्स दर्ज़ हैं . गौर करिये 

     2  जनवरी 1961 यानी ‘आंग्ल वर्ष ‘ के ठीक अगले दिन जो दर्ज़ किया उसमें कहीं भी आंग्ल वर्ष की निंदा नहीं.

     उसी तरह  31  दिसंबर 1972 को डायरी के अंत में और नए साल के आगमन के ठीक एक साल पहले कहीं भी नए साल की भर्त्सना नहीं .

     बल्कि  एक जनवरी 1971 ओंगोल आंध्र से दिनकर जी लिखते हैं -: ” वर्ष का प्रथम दिन शुक्रवार है .यह साल अच्छा होना चाहिए . नए वर्ष का भोर ओंगोल आंध्र में हुआ …..” 

[ दिनकर की डायरी पेज -165  ]

इसी तरह 31 दिसंबर 1971 को पटना से लिखते हैं -: ” आज वर्ष का आखिरी दिन है .एक जनवरी 1971 को मैं ओंगोल आंध्र में था .उस दिन शुक्रवार था .मैंने लिखा यह साल अच्छा बीतने चाहिए . मगर कैसा बीता ? वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यह कि ………..नए साल को आशंका से न देखकर आशा से देखना ही उचित …” 

[ दिनकर की डायरी पेज -256  ]

     क्या अब भी ये बताये जाने कि ज़रूरत है कि दिनकर जी  का नया साल क्या था ?  और ”ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं” कितना फ़र्ज़ी है .

बंधुओं दिनकर जी यहाँ तक कह गए हैं :

…..चिंतकों का यह हाल है
कि वे पुराने प्रश्नों को
नए ढंग से सजाते हैं
और उन्हें ही उत्तर समझकर
भीतर से फूल जाते हैं।
मगर यह उत्तर नहीं,
प्रश्नों का हाहाकार है।
जो सत्य पहले अगोचर था,
वह आज भी तर्कों के पार है।”

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