शशिकांत गुप्ते
पेट्रोल और डीजल कुछ सत्ता हुआ, जैसे “ऊंट के मुह में जीरा” वाली कहावत को चरितार्थ किया गया।इसका मतलब सम्भवतः पेट्रोल और डीजल सस्ता हुआ नहीं किया गया?
एक विरोधी अर्थशास्त्री का कहना है कि,उपचुनाव में पराजय के परिणाम स्वरूप यदि पेट्रोल और डीजल के भाव कम करना पड़ सकतें हैं।तब तो सम्भव है कि, सयोंग से यदि आम चुनाव में परास्त हो जातें हैं तो महंगाई पूरी तरह खत्म हो सकती है।
विरोधी अर्थशास्त्री के उक्त वक्तव्य पर एक व्यंग्यकार ने अपना मंतव्य प्रकट करते हुए कहा कि,बच्चें के हाथ में लॉलीपॉप देने से बच्चा तात्काल रोना बंद कर देता है।यह बच्चे की समस्या का स्थाई हल नहीं है।बच्चे की समूची चिकित्सीय जांच होनी चाहिए।
यदि बच्चे के पेट में दर्द है,तो बच्चा लॉलीपॉप से थोड़ी देर के लिए बहल तो जाएगा।लेकिन पुनः रोना शुरू कर देगा।
यह तो सिर्फ Solution अर्थात समाधान है।स्थाई हल नहीं है।
प्रायः लोग भ्रमवश समाधान को ही हल समझने की भूल करतें हैं और बाद में पछतातें हैं।
तादाद में लोगों ने स्वतंत्रता के बाद देश में सत्तर वर्षो की उपलब्धियों को नगण्य धोषित करने वाली साज़िश को सच मान लेने की भूल की।इसी कारण आज आमजन हर तरह से त्रस्त हो गया है।
विज्ञापनों में प्रतिवर्ष दो करोड़ बेरोजगारों को रोजगार देने का भी विज्ञापन था।
इस विज्ञापन की भाषा को देश के बेरोजगारों ने शब्दशः सच मान लिया।असल में उक्त विज्ञापन का आशय यह था कि, देश के दो करोड़पति धनवानों की सम्पत्ति को करोड़ों से अरबों,खरबों में बदलना था।यह तो अक्षरसः सत्य हो ही गया?
मुख्य मुद्दा है,पेट्रोल और डीजल के भाव कम किए गए।एक बहुत ही व्यवहारिक प्रश्न उपस्थित होता है कि,बढ़े हुए भावों पर सत्ता पक्ष के विद्वान और सत्ता पक्ष एक समर्थक लालाजी का कहना है कि देश के नागरिकों की आय भी बढ़ी है। यदि इस “कु”तर्क को सही मान लिया जाए तो क्या भाव इसलिए कम करना पड़े की लोगों की आय कम हो गई है?
क्या अस्सी करोड़ लोग मुफ्त अनाज पर निर्भर है, यह सरकारी आंकड़ा भी गलत है?
आश्चर्यजनक किंतु सत्य है, जनधन योजना को धन के अभाव के कारण क्रियान्वित करने में कठिनाई हो रही है।इस समस्या का हल नहीं निकल रहा है।
क्या देश की जनता को यह जानकर मानसिक समाधान कर लेना चाहिए कि, देश के दो उद्योगपतियों की आय प्रतिदिन बेतहाशा बढ़ गई है?
किसी भी समस्या का स्थाई हल और समधान की गुत्थी कब सुलझेगी?
इसी मुद्दे पर व्यापक बहस होनी चाहिए।दूध का दूध और पानी का पानी स्पष्ट रूप से दिखना चाहिए।
धनकुबेरों के लिए प्रख्यात गीतकार स्व.गोपालदास नीरजजी यह रचना प्रासंगिक होगी
जो छुपा के रखा है तिजोरी में
वो तो धन न कोई काम आएगा
सोने का ये रंग छूट जाना है
हर किसी का संग छूट जाना है
आदमी को आदमी बनाने के लिए
जिंदगी में प्यार की कहानी चाहिए
और कहने के लिए कहानी प्यार की
स्याही नहीं , आँखों वाला पानी चाहिए।
उक्त संदेश उन्ही के लिए है,जिनके आँखों में शर्म का पानी है। नहीं तो बोलचाल में कहतें हैं न।
निर्लज्जम सदा सुखी
शशिकांत गुप्ते इंदौर

