अग्नि आलोक

नामर्द बंधुओं से मिलने वाली शिकायत और माँग का समाधान 

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    ~> डॉ. विकास मानव 

अक्सर मुझ से फार्मूले की माँग की जाती है. कहा जाता है कि सारी विद्या लेकर नहीं जाओगे. किसी को नहीं बताओगे तो आपके मर जाने पर लोकहित कैसे होगा. तुच्छ सोच छोड़ दो, सब बता दो.
पहली बात : महान आत्माओं, मेरा कोई सीक्रेट नहीं है, जो मैं बताऊं. मेरा पैटर्न मेडिसिन बेस्ड नहीं, मेडिटेशन बेस्ड है. मेडिटेशन की 200 विधियां हैं. सब बता दूँ तो फंसकर- उलझकर रह जाओगे. क़ुछ नहीं पाओगे. आपके लिए क्या सही है, यह बिना मिले तय नहीं हो सकता.
दूसरी बात : ध्यान ‘समूह’ का, प्रदर्शन का, खरीद-विक्री का, चैट या ऑडियो-विडिओ का सब्जेक्ट नहीं है. जो लोग ऐसा करते हैं, वो अपने स्वार्थ का मुकाम पाने के लिए ध्यान का काम तमाम करते हैं.
अब खास बात : ज्यादातर लोगों को नामर्दी (शीघ्रपतन) से मुक्ति के लिए ध्यान सीखना होता है. निश्चित तौर पर हम एक घंटे ऐक्टिव रहने की केपेसिटी डेवलप कर देते हैं. मग़र इसके लिए मेरे सानिध्य में मेडिटेशन से वीर्य डिस्चार्जिंग पर कमांड करना सीखना होता है.
मूठ मारकर, सेक्स पॉवर की दवाएं ठूसकर पेनिस की नसें डेमेज कर लिए हो. उसपर मेडिटेटिव मसाजथेरेपी भी देनी होती है. क्या यह भी मुझ से कराना चाहते हो? फिर तो अपनी पार्टनर को सटिस्फैक्शन देने का काम ही मुझ से करवा लिया करो. छोड़ो सारी सरदर्दी.
नहीं ना! इसलिए बॉडी पार्टनर को साथ रखना होता है. क़ुछ काम उनको ही करना होता है. आपकी सफलता का स्तर कितना डेवलप हो रहा है, यह भी वही बताएँगी आपसे इंटीमेट होकर.
रही विशेष परिस्थिति में मेरे द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली आयुर्वेदिक मेडिसिन के फार्मूले की बात, तो मैं यहाँ लिख़ रहा हूँ. यह भी कोई मेरा अविष्कार नहीं है. तमाम कम्पनियाँ बनाकर ब्रांड के रुप में बेच रही हैं.
दो दवाएं हैं : कामचुड़ामणिरस और शुक्र स्तम्भन बटी.
आयुर्वेद में जो घटकद्रव्य बताए गए हैं, उनमें से महंगे वाले कम्पनियां नहीं डालती. जिस तरीके से बनाना बताया गया है, वह तरीका भी फॉलो नहीं करती. इसलिए उनके प्रोडक्ट कचरा सावित होते हैं. इसलिए या तो आप किसी विश्वसनीय वैद्य को सामान देकर उनसे अपने सामने बनवाना या फिर खुद विधि-विधान से बना लेना. हमसे मंगाने में आपको लगेगा हम महंगा दे रहे हैं. आप कम्पनियों के रेट से कम्पेयर करेंगे.

(1). कामचुड़ामणिरस :
आयुर्वेद के अनुसार, यह योग इतना प्रभावशाली है, कि इसका सेवन करने से रोम-रोम नाचने लगता है. दोनों की आत्मा एक दूसरे में इस तरह समा जाती है, कि तुम और मैं का भेद समाप्त हो जाता है।
यह आपको संभोग का राजा बना सकता है. पेनिस टाइट नहीं होता, जल्दी बह जाता है तो कम्प्लीट कोर्स करके देखें. मैं अपने कई पेसेंट के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं, कि दोबारा आपको समस्या का सामना कभी नहीं करना पड़ेगा.
रसेंद्र कामचूड़ामणि का राजे- महाराजे उपयोग करते थे। उनके पास अनेक रानियां और तमाम रखैलें होती थी, इसलिए.
इसके 45 दिन उपयोग करने से बहुत गाढा हो जाता है, और
गुणवत्ता भी बहुत अधिक मात्रा में सुधर जाती है. कुछ और दिनों के इसतेमाल से नाड़ीतंत्र को ताकत मिलती है। जो लोग बिल्कुल भी टिक नहीं पाते हैं, उनके लिए भी यह रामबाण नुस्खा सावित होता हैI

घटक द्रव्य और निर्माण विधि :
★ स्वर्ण भस्म 1 ग्राम।
★ काली मूसली 30 ग्राम
★ नाग भस्म 200 पुटी 20 ग्राम।
★ अभ्रक भस्म 40 ग्राम।
★ वंग भस्म 30 ग्राम।
★ अतुल शकतिदाता योग (खुद तैयार किया) 30 ग्राम।
★ चाँदी भस्म 2 ग्राम।
★ स्वर्ण माक्षिक भस्म 2 ग्राम।
★ सफेद मूसली -6 0ग्राम
★ सालम पंजा – 30 ग्राम
सबको मिलाकर पीपल के पतों के रस और, बड़ के पतों के रस में तीन दिन खरल करें। फिर मघाँ, गिलोय, भड़िंगी, अंबरबेल, खस, नागरमोथा, शुद बचनाग, मुलठी, शतावर, कौंच के रस की सात- सात भावना दें।
जब सारी जड़ी बूटियां सूख जाये तो इसके कुल वजन की आधी काली मूसली मिलाकर तुलसी के रस में घोटकर 1-1 रती की गोली बनाकर छाया में सुखा लें I अब आप का महाशक्तिशाली कामचूड़ामणि रस तैयार है.

(2.). शुक्रस्भनवटी :
धान्यकं चविका जीरं तालीशं टङकदाडिमौ।
प्रत्येकार्द्धपलं दत्त्वा गुग्गुलो कर्षमेव च।
रसाभगन्धलौहानां प्रत्येकञ्च पलं क्षिपेत्।।
सर्वमेकीकृं वैद्यो दण्डयोगेन मर्दयेत्।
घृतभाण्डे तु संस्थाप्य माषमेकं तु भक्षयेत्।
अनुपानं प्रदातव्यं जातिभेदात् पृथक्–पृथक्।
दाडिमस्य रसेनैव छागीदुग्धेन वाम्भसा।।
प्रमेहान् विशतिं हन्ति वातपित्तकफोद्भवान्।
द्वद्वजान्सन्निपातोत्थान् मूत्रकृच्छ्राश्मरीगदान्।।
~ भै.र.37/69-74

घटक द्रव्य एवं निर्माण विधि :
गोक्षुर बीजफल 24 ग्राम
हरीतकी फल 24 ग्राम
बिभीतक फल 24 ग्राम
आमलकी फल 24 ग्राम
एला बीज 24 ग्राम
रसांजन (दारुहरिद्रा) निर्यास 24 ग्राम
धान्यक फल 24 ग्राम
चव्य तना 24 ग्राम
जीरक (श्वेत) फल 24 ग्राम
तालीस पत्र 24 ग्राम
टंकण शुद्ध 24 ग्राम
दाडिम बीज 24 ग्राम
शुद्ध गुग्गुलु निर्यास 12 ग्राम
रस (पारद) शुद्ध 48 ग्राम
गंधक (पारद) शुद्ध 48 ग्राम
अभ्रक (पारद) शुद्ध 48 ग्राम
लौह भस्म 48 ग्राम
मात्रा– 500 मिली ग्राम
सभी को कूटपीसकर बड़ी मटर जैसी गोलियां बना लें. छाया में सुखाकर रख लें.
इस वटी का प्रभाव मुख्य रूप से वीर्य का वहन करने वाली नाड़ियों पर और वृक्क (मूत्र–पिण्ड) पर होता है। इसके सेवन करने से वीर्य स्राव तथा वातपित्त एवं कफज स्वप्नदोष, मूत्रकृच्छ्र रोग एवं अश्मरी आदि रोगें में बहुत लाभ प्राप्त होता है।
यह वटी रक्ताणुओं को बढ़ाकर मांस–ग्रन्थियों को मजबूत बनाती है।

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