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*कुछ फ़िल्म कुछ इल्म:झांसी की रानी बनाम महताब*

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       उन दिनों बगल के ज़िले में हमारा रोज़ जाना होता था। उस ज़िले में आना-जाना कोई एक-दो साल नहीं, वर्षों चलता रहा। नौकरी में आने के पहले मैं और मेरे कुछ साथी आईटीआई में पढ़ने जाते थे। रामनारायण, शफ़ीक, प्रजापति, अन्य कई तब एमएसटी स्लीपर क्लास वर्जित थी। फिर भी हम लोग स्लीपर में ही जाते। कुछ कर्मचारी, कुछ व्यापारी कुल मिलाकर बारह पंद्रह लोग होते। टीटीई रोज़ तंग करते पर हम लोग कहां सुनने वाले थे। ट्रेन से आने-जाने में हमें बैठने में कोई तकलीफ़ कभी नहीं हुई। प्रेम से लोग जगह दे देते, यह सब शफ़ीक का कमाल था। उसका खोजा यह उपाय बाद में भी मेरे ख़ूब काम आया। वह यह कि वह अपने साथ हमेशा ताश के पत्ते की एक गड्डी लेकर चलता था और जब भी कहीं भीड़ देखता, पत्ते पलटना शुरू कर देता। कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि कम्पार्टमेन्ट में बैठा कोई न कोई आदमी ताश का शौक़ीन न मिले। बस क्या था वह प्रेम से जगह देता और हम लोगों का ताश खेलते एक से दो घंटे का सफ़र पूरा हो जाता। कुछ लोग तो नाश्ता पानी भी करा देते। बीच-बीच में क़िस्से-कहानी भी होते रहते। एक बार तो एक बारात की पार्टी मिल गयी, जिसमें कई महिलाएं दहला पकड़ खेलना जानती थीं, उन्होंने हम लोगों को बहुत महत्व दिया। उनमें एक बूढ़ी दादी भी बैठी थीं, वो फ़िल्मी क़िस्से सुना रही थीं। इधर हम लोगों का दहला पकड़ ज़ोरों पर चल रहा था। ट्रेन बीच के किसी स्टेशन पर 45 मिनट रुकी रही पर हम लोगों को पता ही नहीं चला। बूढ़ी दादी बीच-बीच में कोई गाना गा देती “ज़ुल्मी संग आंख लड़ी” या और भी कई गाने पर बाद में पता चला वह सोहराब मोदी को सबसे बड़ा अभिनेता मानती थीं। उन्होंने उनकी कई फ़िल्मों जैसे आदिल, पुकार, सिकन्दर, मिर्ज़ा ग़ालिब, झांसी की रानी अनेक ऐतिहासिक फ़िल्मों के नाम बताये।

फिर थोड़ा दुखी होते हुए बोली, “बेचारी मेहताब”… उनकी ओर ध्यान देते हुए अबकी बार मैंने पूछा,” क्या हुआ?”

“कुछ नहीं बस मेहताब याद आ गई”, मैंने फिर पूछा,”कौन आपकी कोई सहेली?”

वह मुस्कुराकर बोली,” नहीं नहीं महताब, हीरोइन”, “हीरोइन!” मैंने आश्चर्य से पूछा।

“हां कमाल की अदाकारा थी वह क्या तुम नहीं जानते?”

मैंने सिर हिलाकर मना कर दिया फिर उन्होंने अपने पर्स से एक तस्वीर निकालकर दिखायी और बोलीं, “यही है, झांसी की रानी मेहताब, इसका असल नाम नजमा था। इसकी पहली फ़िल्म वीर कुणाल थी, जिसमें किशोर साहू हीरो था, बाद में उसने कई फ़िल्मों में काम किया। इस दौरान मेहताब की शादी निर्देशक अशरफ़ ख़ान से हो गयी पर अशरफ़ ज़्यादा दिन साथ नहीं दे सके और बेचारी मेहताब अपने बच्चे के साथ पीछे छूट गयी। बाद में सोहराब मोदी ही वह आदमी थे, जिन्होंने न केवल उसका साथ दिया बल्कि उसको लेकर शानदार फ़िल्म झांसी की रानी भी बनायी।

इस फ़िल्म में बहुत पैसा लगा। युद्ध के दृश्य जिस तरह फ़िल्माये गये, मैंने आज तक फिर दोबारा वैसा कुछ नहीं देखा, मेहताब ने भी ज़बरदस्त अभिनय किया। यह ऐसी प्रामाणिक फ़िल्म थी, जिसमें झांसी की रानी के बचपन से लेकर पूरे जीवन काल का प्रामाणिक दृश्यांकन किया गया है। झांसी की रानी की वीरता व साहस के साथ फ़िल्म में पूरा न्याय मिलता है। फ़िल्म में अंग्रेज़ी राज्य व उसकी व्यवस्था की तीखी आलोचना की गयी। सोहराब मोदी की यह नायाब फ़िल्म चली तो नहीं पर फ़िल्म में संवाद, दृश्य, इतिहास, घटनाओं का सटीक फिल्मांकन था। कहते हैं न कि वक़्त के आगे किसकी चली है। सोहराब मोदी को इस फ़िल्म से बड़ी निराशा मिली किन्तु इसकी असफलता का सारा दोष मेहताब पर आया। बाद में मेहताब ने अपनी अंतिम फ़िल्म “समय बड़ा बलवान” में काम किया और फ़िल्मों से अपने को सदा के लिए दूर कर लिया। मेहताब ने मूक​ फ़िल्मों से लेकर अपनी कई और फ़िल्मों में भी श्रेष्ठ अभिनय दिया। आज के लोग मेहताब और सोहराब को भले न याद करें पर उनके बिना फ़िल्मों का एक रंग हमेशा अधूरा रहेगा, उनमें उनकी कमी सदा बनी रहेगी।”

अचानक शफ़ीक ने कहा,” चलो भइया चलो स्टेशन आ गया है, खेल ख़त्म।”

अपने स्टेशन पर उतरते हुए मैंने और शफ़ीक ने बूढ़ी दादी को प्रणाम कहा, उनकी आंखों में बसी वह चमक बाद के दिनों के लिए याद बनकर हमारे पास रह गयी। बूढ़ी दादी से मिलकर केवल हीरो हीरोइन ही नहीं उनके देखने, सुनने, पसंद करने वाले भी, अलग-सी प्रतिभा लिये होते हैं।

मिथलेश रॉय

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