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 कुछ जैसे अतीत इन्‍सान का कभी पीछा नहीं छोडता,इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता

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सुरेश कौशिक

“जब मुगलों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि ‘हिन्दुस्तान’ रखा,

हालांकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे..

कौन विरोध करता ?

जिनको इलाहाबाद और फैजाबाद चुभता है वह समझ लें कि मुगलों के ही दौर में ‘रामपुर’ बना रहा तो ‘सीतापुर’ भी बना रहा।

अयोध्या तो बसी ही मुगलों के दौर में।

‘राम चरित मानस’ भी मुगलिया काल में ही लिखी गयी। वो भी लुच्‍चे लफंगे और अययाश अकबर के शासन काल में जिसे हिन्‍दू कतई नहीं भाता था मगर पता नही क्‍या लेने रामचरितमानस सुनने पहूंच गया। जबकि राम प्रेमियों तक को इसकी कोई आवश्‍यकता नहीं पडती।

आज के वातावरण में मुगलों को सोचता हूँ, मुस्लिम शासकों की सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने मुर्खता की।

होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना था, होशियार मैसूर का वाडियार घराना भी था और जयपुर का राजशाही घराना भी था, तो जोधपुर का भी राजघराना था…

क्योंकि_

टीपू सुल्तान हों या बहादुरशाह ज़फर,,, बेवकूफी कर गये और कोई तो चिथड़े-चिथड़े हो गया या फिर किसी को तो अपने वतन की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और उस परा तुर्रा ये कि उनके वंशज आज भीख माँग रहे हैं।

अँग्रेजों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते… वाडियार, जोधपुर, सिंधिया और जयपुर राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करते।

उनके भी बच्चे आज मंत्री, विधायक बनते।

कुछ नहीं तो वीर अवश्‍य ही कहलाते

यह आज का दौर है, विशेषतया 2014 के बाद जब यहाँ ‘भारत माता की जय’ और’वंदेमातरम’ कहने से ही इंसान देशभक्त हो जाता है, चाहे उसका इतिहास, चरित्र देश से गद्दारी का ही क्यों ना हो! और नहीं बोला तो . ≈.

मुगल लुटेरे थे या डाकू इस बात को थोड़ी देर के लिए साइड में रख दिया जाए और ये पता लगाया जाए कि क्या वाकई राजपुताना के राजा देशभक्त थे?

क्या इन्होने कभी भारत के लिए जंग लड़ी है या सिर्फ इन्होंने सत्ता की चाटुकारिता की है।

इतिहासकारों का ऐसा मानना है कि बाबर को राणा सांगा ने बुलाया था।

जब मुग़ल साम्राज्य स्थापित हो गया तो ज्यादातर राजपुताना के राजाओं ने अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए मुगलों की अधीनता स्वीकार कर लिया।

जब मुग़ल साम्राज्य कमजोर हुआ तो राजपुताना अंग्रेजों का वफादार हो गया और अंग्रेजों के अधीनस्थ होकर सत्ता का सुख भोगने लगे।

देश के स्वतंत्रता संग्राम मे राजपुताना के एक भी राजा ने स्वतंत्रता सेनानियों का साथ नहीं दिया, वे सब अंत समय तक आपना राज-पाट बचाने के लिए अंग्रेज़ो के वफादार बने रहे।

इन सब बातों का आप इसी से अंदाजा लगा सकते हो कि अंग्रेजों ने मुगलों के वंश का नाश कर दिया, पूरे देश में जितने नवाब थे उन पर अंग्रेजों ने कब्ज़ा कर लिया मगर राजपुताना के सभी राजा आज तक राजा बने हुए हैं। जयपुर राजघराना सिंधिया राजघराना जोधपुर राजघराना गायकवाड़ राजघराना अभी तक बचे हुए हैं जबकि टीपू सुल्तान के वंशज रिक्शा चलाते हैं।

और आज के देशभक्‍त – अपने पल्‍ले तो कुछ है नहीं, यहां वहां से कोई एक नाम ढूंढ लाते है और लग जाते हैं कशीदे पढने, इतना वीर था, उतना वजन उठा लेता था, क्‍या कोई सज्‍जन उसकी उपलब्‍धी पर भी कुछ प्रकाश डालेगा, यदि वीर था तो कुछ उपलब्‍धी भी अवश्‍य रही होगी। क्‍या थी वो? कौन से राजा से युद्ध में भाग लेकर कौन सा क्षेत्र फतह कर अपने राज्‍य का विस्‍तार किया, कब से कब तक वहां शासन किया?

कौन देशभक्त थे और कौन देशद्रोही कभी अकेले में बैठोगे तो सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

किसी भी राजनीतिक दल का अपने प्रतिद्वंदी राजनीतिक दल से खूब सियासी टकराव हो सकता है लेकिन आप इतिहास में दखल रखकर उसका नाम ही मिटाने पर आमदा हो जाए तो,यह व्यवहार हरगिज़ सियासी नही हो सकता। उसके मन की घ्रणा का परिचायक हो सकता है क्‍योंकि इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता, मिटाया नहीं जा सकता, कुछ उसी तरह जैसे अतीत इन्‍सान का कभी पीछा नहीं छोडता।

अगर आप अपनी खुद की नई योजनाओं व कार्यक्रमो को सफलतापूर्वक पूरा करके फिर महापुरुषो के नाम पर रखते हैं तो वह आप की उपलब्धियों में गिना जायेगा।

सुरेश कौशिक

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