–सुसंस्कृति परिहार
जब से सोनम वांगचुक को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया है तब से देश में सोनम वांगचुक के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है।कहा ये जा रहा है जब लोकतंत्र की आड़ में तानाशाह सत्ता पर बैठ जाते हैं तब अपने क्षेत्र की प्रगति हेतु आंदोलन धर्म निभाने वाले सरकार को अपने रास्ते का कंटक लगने लगते हैं। सीधी सच्ची बात यह है कि वे जन आंदोलन से घबरा जाते हैं और उनके नेता को विभिन्न आरोप लगवाकर जेल में डाल देते हैं ताकि वह आवाज दफ़न कर दी जाए।
लेकिन यह बात सरकार को समझनी चाहिए कि लद्दाख के लोग ठंडे मरुस्थल में रहते हैं जहां आक्सीजन बहुत कम है। ठंड यहां इतनी कि सिर्फ जहां तीन माह को छोड़कर -5डिग्री से लेकर -30 डिग्री तक तापमान रहता हो। जहां वृक्ष नहीं हों वृक्ष के नाम पर काई और छुटपुट झाड़ियां हों।पानी का अभाव हो।लेह में हमारे जांबाज सैनिकों ने रोड किनारे कुछ ही पहाड़ी वृक्ष लगाए हों।ऐसे प्राकृतिक वातावरण में ही जीते, भरपूर क्षमताओं के साथ 97% आदिवासी समाज अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं के लिए जीता और मुस्कराता है।

सोनम वांगचुक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने इन परिस्थितियों को अपने लिए और सुविधाजनक बनाने के लिए कई तरह के प्रयोग किए मसलन उन्होंने पानी की आपूर्ति बनाए रखने के लिए बर्फ़ के ऊंचे पहाड़ बनाए जो तीन महीने की गर्मी में पिघलकर लोगों को पानी की कमी नहीं होने देते। यह प्रयोग इतना सफल रहा कि लद्दाख के ग्रामीण अंचलों में भी अपनाया गया है। ऐसे ही पर्यावरण सुरक्षा और प्रकृति से सामंजस्य के उन्होंने अनूठे प्रयोग किए। ये इतने कारगर रहे कि उन्हें प्रतिष्ठित रमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
इन प्रयोगों पर्यावरण और मानव सम्बंध को समझाने के लिए उन्होने एक विद्यालय भी खोला जिसमें बच्चे यहां हिमालयीन संस्कृति को समझते हैं और पाश्चात्य संस्कृति के रंग में नहीं रंगते। उन्हें अपनी मिट्टी से प्यार हो जाता है।
आज जब सोनम वांगचुक जैसे पर्यावरणविद, इंजीनियर ,सामाजिक कार्यकर्ता पर ऊल-जलूल आरोप गढ़कर और देशद्रोही का फतवा मढ़कर सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया है तब लद्दाख का तापमान अचानक बढ़ गया है।एक सोनम वांगचुक के जाने के बाद प्रत्येक लद्दाखी सोनम वांगचुक में तब्दील होता नज़र आ रहा है।
ऐसा ही वाकया दलितों की आवाज उठाने वालों के साथ पुणे में हुआ।वह
2018 की एक जनवरी थी जब पुणे के पास भीमा कोरेगांव में जैसी हिंसा भड़की, वैसा इतिहास में कभी नहीं हुआ। दो शताब्दी पहले 1818 में एक लड़ाई ज़रूर लड़ी गई थी, मगर वो आत्मसम्मान और आज़ादी की लड़ाई थी। उसी लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ मनाने के लिए हज़ारों दलित जमा हुए थे। लेकिन उस सभा में जो हिंसा भड़की, उसकी आंच पूरे देश में महसूस की गई।
घटना को लेकर पूरे देश में गर्मागर्म बहस चल पड़ी। एल्गार परिषद केस में पुलिस की इन्क्वायरी और जांच 2018 से ही जारी है। जैसे जैसे जांच बढ़ी, इसके तहत कई वामपंथी और इस विचारधारा से सहानुभूति रखने वाले कई लेखक, पत्रकार, शिक्षक और दूसरे पेशों के लोग पूरे देश से गिरफ्तार किए गए।
इस मामले में जो अभियुक्त बनाए गए, उनके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया. UAPA जैसे सख़्त क़ानून के तहत आरोप तय किए गए।इस घटना के आठ साल बीतने के बाद भी कई अभियुक्त जेल में बंद हैं। वकील सुरेंद्र गाडलिंग, सुधीर धवले, रोना विल्सन, शोमा सेन, महेश राउत, कवि वरवर राव, सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, वर्नोन गोंसाल्वेस और पत्रकार गौतम नवलखा को जून से लेकर अगस्त, 2018 के दौरान गिरफ़्तार किया गया था।
इसके कुछ दिनों के बाद मामले में प्रोफेसर आनंद तेलतुंबडे, दिवंगत फादर स्टेन स्वामी, हन्नी बाबू, सागर गोरखे, रमेश गैचोर और ज्योति जगताप को भी गिरफ्तार किया गया।
इन गिरफ्तारियों के साथ-साथ इन अभियुक्तों की ज़मानत याचिकाएं और उनके जेल में मिलने वाली सुविधाओं और पाबंदियों की चर्चा भी होती रही।इनमें इस मामले में अब तक कुल 16 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है। इनमें से कुछ को काफ़ी समय बाद ज़मानत मिल गई, ज्यादातर अभी भी जेल में हैं, एक अभियुक्त की मौत भी हो गई।ऐसे ही प्रकरण बस्तर में आदिवासियों के बीच काम कर रहे लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को झेलने पड़े।
यह सब बताने का आशय यह है कि यह मनुवादी सरकार नहीं चाहती कि पिछड़े , दलित, आदिवासी, स्वर्ण जातियों की बराबरी से खड़े हो सकें। इसलिए सामयिक कार्यकर्ता इनकी आंख में खटकते हैं। तेलुगू कवि बर्बरा राव, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, प्रोफेसर आनंद तेलतुंबडे, फादर स्टेन स्वामी, जेएनयू के शरजील हों या सोनम वांगचुक जैसे विद्वान पर्यावरण विद जो हिमालयीन संस्कृति को बचाने के जुनून में लगे हुए थे देशद्रोही मान लिए गए।
सही मायने में वांगचुक और उनकी संस्था लद्दाख एपेक्स बाडी के लोग यदि भाजपा सरकार की वायदाखिलाफी के लिए आंदोलन कर रहे थे । वांगचुक अपना अनशन तोड़ आंदोलन को शांत करने आते हैं और देशद्रोही बता दिए गए उनकी मांग थी कि सरकार अपने वादे के मुताबिक उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दे तथा छठी अनुसूची में शामिल करें। ताकि आदिवासी जमीन सुरक्षित हो सके जैसा अन्य राज्यों में है।
यही बात व्यापारी मानसिक वृत्ति की सरकार को कांटे ही चुभ गई।वह तो इसे अडानी के पर्यटन के लिए सुरक्षित समझ रही थी। इसके अलावा चरवाहों के लिए वे जिस जमीन की मांग कर रहे हैं चीन ने कब्जा कर रखी है वह कैसे दिलाएंगे वांगचुक इसीलिए सरकार की नज़र में देशद्रोही हो गए है अब क्षेत्र की जनता ही इसका जवाब दे सकती है कि सोनम वांगचुक क्या है उनके लिए?