डॉ. विकास मानव
_वैन्दव शरीर को वही सिद्ध योगी देख सकता है जो मनोमय शरीर का अतिक्रमण कर आत्मशरीर को उपलब्ध हो गया है। इस ब्रह्माण्ड में कुल सोलह मण्डल हैं जिनमें एक है–सप्तर्षि मण्डल।_
ऐसा बताया जाता है कि सप्तर्षि मण्डल के पश्चिम की ओर नर-नारायण मण्डल है और उत्तर की ओर मान्धाता पर्वत के ठीक ऊपर सनक, सनंदन और सनत्कुमार का दिव्य मण्डल है और उसी दिव्य मण्डल के ठीक ऊपर आत्म मण्डल है।
_इसी में विदेही आत्मायें (वैन्दव शरीरधारी आत्माएं) आनंदमग्न रहती हैं। सूर्य की सप्त रश्मियों के माध्यम से विदेही आत्माओं का संपर्क सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से बराबर बना रहता है। उच्चकोटि के सिद्ध, साधक, योगी और संत महात्माओं की आत्मा को ‘दिव्यात्मा’ कहते हैं।_
दिव्यात्मा शरीरधारी हो या अशरीरी हो उनसे सूर्य रश्मियों के माध्यम से विदेही आत्माएं बराबर संपर्क बनाये रखती हैं।( तभी सूर्योदय के बाद सूर्य को ऊपर हाथ उठाकर जल देने का विधान हमारे धर्म-ग्रंथों में किया गया है। जल देते समय जल की धार से सूर्य रश्मियों का सम्बन्ध जुड़ जाता है और उस व्यक्ति के भाव और विचारों का भी सम्बन्ध भी जुड़ जाता है).
परिणामस्वरूप उच्चकोटि के सिद्ध साधक, संत, महात्मा, योगीगण बराबर आत्मोन्नति करते हुए आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होते रहते हैं।
जिस मनुष्य की आत्मा शुभ संस्कार संपन्न है, जिसका कई जन्मों का पुण्य उदय है और जो अध्यात्म में आस्था रखता है और जो शुद्ध भाव और विचार रखता है, ऐसे मनुष्य को उसकी आत्मा के माध्यम से विदेही आत्माएं समय-समय पर बिना किसी साधना-उपासना के और बिना किसी आध्यात्मिक प्रयास के अपना अगोचर सहयोग प्रदान करती रहती हैं।
_परिणामस्वरूप उस मनुष्य द्वारा संसार और समाज का कल्याण होता है। बौद्धिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है और उन्नति होती है ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी।_
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई सर्वश्रेष्ठ प्राणी है तो वह है केवल मात्र–मनुष्य। उसे कई प्रकार की श्रेष्ठता उपलब्ध है। पहला है–मन। मनुष्य मन का स्वामी है। मन केवल मनुष्य के पास है और किसी प्राणी का पास नहीं। इसीलिए उसे मनुष्य कहते हैं।
दूसरा है कर्म। कर्म केवल मनुष्य कर सकता है, अन्य कोई प्राणी नहीं। कर्म करने के लिए मानव शरीर आवश्यक है। इसीलिए मानव शरीर ‘कर्म शरीर’ कहा गया है और अपने आप में यह महत्वपूर्ण और गरिमामय है और है दुर्लभ भी। परब्रह्म परमेश्वर को भी अपने जागतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए समय-समय पर मानव देह स्वीकार करनी पड़ती है।
यही एकमात्र कारण है कि विदेही आत्माओं को भी मनुष्य प्रिय है। इसी का फल है कि परमात्मा द्वारा प्रेरित होकर विदेही आत्माएं मनुष्य को प्रेरणा देती रहती हैं, दिशा-निर्देश करती हैं और सहयोग प्रदान करती हैं आध्यात्मिक क्षेत्र, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र और बौद्धिक क्षेत्र में भी।
अब तक उक्त क्षेत्रों में जो उन्नति हुई है और जो भविष्य में होगी उसका आधार यही रहस्यमय तथ्य है।
जो संस्कार संपन्न व्यक्ति अपनी आत्मोन्नति के लिए आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होना चाहता है और उसके लिए चाहता है विदेही आत्माओं का सहयोग और मार्गदर्शन तो उसके लिए आत्मोकर्षिणी विद्या अत्यंत सहयोगी सिद्ध होती है।
‘आत्मोकर्षिणी विद्या’ वह विद्या है जिसके माध्यम से वैन्दव शरीरधारी आत्माओं को आकृष्ट किया जाता है और उनसे मनोवांछित लाभ लिया लिया जा सकता है। लेकिन इसके लिए पहली शर्त है उसकी सुपात्रता और अनुष्ठान की शुद्धता।
इतना ही नहीं आवश्यकता पड़ने पर सद्गुरु के रूप में वे साधक को दर्शन भी देती हैं और उन्हें इष्ट के विषय में बतलाती हैं। इष्ट के स्वरूप का ज्ञान होने पर इष्ट स्वयं सद्गुरु का स्थान ग्रहण कर लेता है और समय समय पर साधक का पथ-प्रदर्शन भी करता है।
ये सारे व्यापार आन्तर्जगत में आतंरिक रूप से होते हैं जिन्हें साधारण जन नहीं समझ सकते। तो असाधारण बनिये.
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