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अंतर्मन से कही बात है

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शशिकांत गुप्ते

सीतारामजी आज संत कबीर साहब द्वारा कहे गए दोहों का स्मरण कर रहे हैं।
सीतारामजी ने कहा मन शब्द पर एक सेंचुरी से अधिक दोहे, कविता,और सुभाषित उपलब्ध हो सकतें हैं।
मन शब्द पर संत कबीर साहब का निम्न दोहा प्रासंगिक है।
मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक
जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक।।

भावार्थ: मन के मत से न चलो, क्योंकि मन के अनेको मत हैं। जो मन को सदैव अपने अधीन रखता है, वह साधु कोई विरला ही होता है।
मन पर प्रहार करते हुए संत कबीर साहब का यह दोहा भी प्रासंगिक है।
मन को मारूँ पटकि के, टूक टूक है जाय
विष कि क्यारी बोय के, लुनता क्यों पछिताय।।

भावार्थ: जी चाहता है कि मन को पटक कर ऐसा मारूँ, कि वह चकनाचूर हों जाये। विष की क्यारी बोकर,अब उसे भोगने में क्यों पश्चाताप करता है।
सीतारामजी ने कहा उपर्युक्त उपदेशक दोहों का मेरे अंतर्मन में स्मरण हुआ इसीलिए मैं इन्हें सार्वजनिक पटल पर प्रस्तुत कर रहा हूं।
मन के महत्व को समझें बगैर बहुत से लोगों द्वारा मन की बात करते हुए मनमानी बात की जाती है।
मनमानी बात करना हठधर्मिता का लक्षण है।
हठधर्मिता का व्यवहारिक अर्थ निम्नानुसार है।
हठधर्मी होने की स्थिति या भाव, अपने हठ पर जमे रहना; संकीर्णता; दुराग्रह; कट्टरता होता है।
हठधर्मी होने का दार्शनिक अर्थ होता है,नैतिक आचरण के लिए प्रतिबद्ध होना।
बहरहाल हम व्यवहारिक अर्थ पर ही चर्चा कर रहें हैं।
हठधर्मिता का भावार्थ संकीर्णता और कट्टरता होता है।
संकीर्णता और कट्टरता का सीधा अर्थ तानाशाही प्रवृत्ति होता है।
तानाशाह प्रवृत्ति मतलब ही Destructive अर्थात विनाशकारी प्रवृत्ति होती है।
हठधर्मिता का प्रयायवाची शब्द है अहंकार भी होता है।
अहंकार ग्रसित व्यक्ति अपनी गलतियों को कभी भी स्वीकार नहीं करता है,उल्टा अपनी गलतियों को छिपाने के लिए अंहकार का सहारा लेता है।
अहंकारी व्यक्ति सिर्फ अपनी सराहना ही पसन्द करता है।
अहंकारी को यदि उसकी गलती से अवगत किया जाए तो वह क्रोधित हो जाता है।
अपनी गलती को स्वीकारना साहस का कार्य है।
हठधर्मिता,संकीर्णता,कट्टरता, तानाशाही,और अहंकार यह सारे शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची हैं।
इन शब्दों को व्यवहारिक प्रश्रय पूंजीवाद देता है। पूंजीवाद सामंती मानसिकता द्योतक है।
उपर्युक्त सम्पूर्ण चर्चा से निष्कर्ष निकलता है मन को वश में करों।
मन वश में होगा तो वह संकीर्णता,कट्टरता रूपी विष कभी भी वमन नहीं करेगा।
मन को दर्पण भी कहा है।
शायरा अंजुम रहबर जी का यह शेर मौजू है।
आईने पर इल्ज़ाम लगाना फ़िज़ूल है
सच मान लीजिए, चेहरे पर धूल है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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