डॉ. प्रिया
कई आस्थावान वेदों एवं उपनिषदों तथा छ: वैदिक दर्शनों के तत्व विवेचन के साथ पुराणों को भी धर्म की रीढ़ और उतने ही उपयोगी मानते हैं।
उनकी धारणा है कि कथाओं और रूपकों के माध्यम से तत्वज्ञान की शिक्षा सामान्य जन (श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार वेद पढ़ने सुनने के अनधिकारी शूद्रों और स्त्रियों) को देने के उद्देश्य से ये रचे गए थे।
यह ज़रूर है कि पुराणों में कुछ राजवंशों का ब्योरा भी दर्ज है जो इतिहास लेखन में स्रोत-सामग्री का काम करता है। इनकी कुछ पुरातन कथाओं का सूत्र ऋग्वेद सहित अन्य संहिताओं में भी मिलता है। किंतु अधिसंख्य कथाएं गल्पनुमा हैं जिनमें संभव-असंभव, लौकिक-पारलौकिक, भौतिक – आधिभौतिक की विभाजन रेखा तिरोहित हो जाती है।
वlइन हिस्सों को उसी अर्थ में ‘मिथक’ कहा जा सकता है जिसमें होमर की इलियड और ओडिसी की मिथकीय कथाओं को। उस ज़माने में, जब मनोरंजन के साधन बहुत सीमित थे, इनका पठन-पाठन और श्रवण जीवन में एक रिक्ति को भरने का काम करता रहा होगा। कुछ कथाओं में तत्वनिरूपण भी मिल जाएगा। किंतु अधिसंख्य कथाएं पुराणकारों की निरंकुश कपोलकल्पना लगती हैं। यदि ये शूद्रों और स्त्रियों जैसे वेदाध्ययन के लिये अनधिकृत सामान्य जन के लिये लिखे गये तो इनमें ऐसे गूढ़ रूपकों का समावेश क्यों किया गया? सीधी बात है, सारे रूपक आरोपित हैं।
किन्तु पुराणों में और इलियड व ओडिसी की मिथकीय कथाओं में एक अहम फ़र्क़ है। इलियड और ओडिसी प्राचीन यूनानी सभ्यता में सबके लिये गौरवगान हैं। बल्कि यूरोपी पुनर्जागरण के दौरान यूनानी और रोमन सभ्यता का दाय पुन: शिरोधार्य करने के कारण पूरे यूरोप या पश्चिमी सभ्यता के लिये अतीत के गौरव हैं और सबको एकजुट पहचान देते हैं। इसके बरअक्स पुराण (स्मृतियों के साथ) वर्णव्यवस्था के जबर्दस्त पोषक होने से एक बड़े समुदाय के लिये गौरव-बोध के बजाय हीनता-बोध के कारण बनते हैं। वर्ण व्यवस्था के स्तम्भीकृत रूप का बारंबार यशोगान करके ये सनातन समाज को विखंडित ही नहीं करते, जन्मना ऊंच-नीच की अवैज्ञानिक और अमानवीय धारणा पर बार-बार ज़ोर देकर उस बड़े समुदाय में सनातन के प्रति गौरव के बजाय विकर्षण पैदा करते हैं।
जिन पुराणों में उनके लिये शेष तीन वर्णों की सेवा ही एकमात्र कृत्य घोषित किया गया, और उनमें से भी चांडालादि को अस्पृश्य क़रारकर पंचम वर्ण के रूप में सामाजिक तानेबाने से बहिष्कृत रखा गया, उन्हें वे अपनी पहचान और गौरव-बोध का साधन कैसे समझ सकते हैं ?
इस अर्थ में ये पुराण सनातनी धारा के पोषक नहीं, उसके विक्षेप हैं। पूर्व में पोस्ट हुए छ: क़िस्तों के एक लंबे आलेख में यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि वर्ण व्यवस्था सनातन का अंग नहीं, व्यवहार में उसका विचलन है। ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद एक ही धारा की कृतियां हैं जिन्हें त्रयी के नाम से जाना जाता है। पहले इन्हीं तीनों की गणना वेदों में होती थी। इनमें सृष्टि विषयक पुरुष सूक्त, जिसमें ‘ब्राह्मणोस्यमुखमासीद् बाहु: राजन्य: कृत: ऊरू तदस्य यद् वैश्य: पद्भ्यां शूद्रोsअजायत’ वाली ऋचा आती है, शब्द, शैली और लालित्य की दृष्टि से विशेषज्ञों द्वारा प्रक्षिप्त माना गया है।
इसके अतिरिक्त यह एकमात्र सूक्त है जिसमें अनूस्यूत सृष्टिवर्णन में चार वर्णों की उत्पत्ति विराट पुरुष के चार भिन्न अंगों से बताई गई है। अन्य सभी सूक्तों में समस्त मानव समुदाय की उत्पत्ति का स्रोत एक ही आदिपुरुष मनु से को माना गया है।
सी दसवें मंडल में उपलब्ध नासदीय सूक्त में सृष्टि की जिज्ञासामूलक, वैज्ञानिक व्याख्या में वर्णों का कोई उल्लेख ही नहीं।
अथर्ववेद की रचना त्रयी से एक लम्बे अन्तराल के बाद हुई। इसमें पृथ्वी सूक्त जैसी उत्कृष्ट स्तुतियों के अतिरिक्त बहुत सारी सामग्री जादू, टोना, युद्ध और शत्रुविनाश जैसे शुद्ध लौकिक और प्रतिगामी विषयों पर है। बहुत संभव है, त्रयी और अथर्ववेद के रचनाकाल के अन्तराल में ऋग्वेदकालीन पेशे आनुवंशिक होकर जाति और वर्ण का रूप ले लिये हों, जिन्हें वैदिक आधार देने के लिये पुरुष सूक्त को ऋग्वेद में घुसा दिया गया हो।
जिस कारण यह विचलन और प्रक्षिप्तीकरण का षड्यंत्र हुआ, पुराण उसी को बार बार पुष्ट करते है।
इस पक्ष को छोड़ दें तो पुराण सनातन संस्कृति को समृद्ध करनेवाले नृत्य, साहित्य, संगीत मूर्तिकला, वास्तुकला, और चित्रकला आदि के लिये कच्चे माल के अजस्र भंडार हैं। इन कलाओं के अप्रतिम विकास में पौराणिक सामग्री का बहुत कलात्मक इस्तेमाल हुआ है।
समय आ गया है कि विवेकपूर्वक पुराणों के इस सीमित परिप्रेक्ष्य को स्वीकार किया जाय जिसमें इनकी कथाओं का उपयोग कलाओं के उत्कर्ष में सांस्कृतिक समृद्धि के लिये हुआ है।
वर्णाश्रम के पोषक और हिन्दू समाज में अंधविश्वासों के अक्षय कोश के रूप ये हमारे पैरों में बेड़ियाँ हैं जिसकी शिनाख्त और स्वीकृति सनातन की गतिशीलता और अग्रगामी यात्रा के लिये अनिवार्य है।
तत्वज्ञान के लिये पौराणिक कथाओं से इतर सनातन धारा में विपुल सामग्री है जो पौराणिक कथाओं से सर्वथा निरपेक्ष है। संहिताओं के घटक हैं–कर्मकाण्ड और ज्ञानकांड। ब्राह्मण ग्रंथ कर्मकाण्ड की व्याख्या करते हैं जब कि उपनिषद् ज्ञानकांड की।
वैदिक दर्शनों में केवल पूर्वमीमांसा कर्मकाण्ड पर आधारित है।
विचित्र बात यह है वेदों को प्रमाण मानने के बावजूद पूर्वमीमांसा ईश्वरनिरपेक्ष है। वेदविहित कर्म करना और वेदनिषिद्ध कर्म से विरत रहना ही जीवन का लक्ष्य है। इसी से अपूर्व की सृष्टि होती है जो हमारे भविष्य का निर्धारण करता है। सृष्टि अनादि और अनंत है और उसके लिये ईश्वर की कोई आवश्कता नहीं।
छ: दर्शनों में शेष पांच उपनिषदों पर आधारित होने से ज्ञानकाण्ड के अंग हैं। उनमें न कहीं वर्ण है, न आश्रम, न जाति, न अस्पृश्यता। एकमात्र लक्ष्य सत्य की उन्मुक्त खोज है जिसके सूक्ष्मातिसूक्ष्म निरूपण में इन दर्शनों के आचार्यों ने उपनिषदों की आधारशिला पर भारतीय मेधा का सर्वोच्च शिखर प्राप्त किया था। इनका औदार्य और इनके चिंतन का स्तर विस्मयकारी है।
इनमें से आचार्य कपिल ने अपने निरीश्वर सांख्य में सृष्टि को ईश्वर की निर्मिति के बजाय स्वयंभू माना है जो कार्य-कारण शृंखला से नाना रूपों में प्रस्फुटित होती है। जड़ प्रकृति से मुक्त, शुद्ध चेतन स्वरूप ‘पुरुष’ को प्राप्त करना ही मुक्ति या कैवल्य है। यही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है।
योग दर्शन यम नियम, आसन प्राणायाम, ध्यान, धारणा, समाधि के सोपान से उस लक्ष्य की प्राप्ति का व्यावहारिक मार्ग निरूपित करता है। कपिल न केवल ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार करते हैं, उसके लिये अकाट्य और बुद्धिगम्य तर्क भी देते हैं। न्याय दर्शन शुद्ध रुप से तर्क पर आधारित है और कर्म एवं फल के स्वायत्त चक्र से जीवन को बनाने और बिगाड़ने का दायित्व मनुष्य पर डालता है।
ईश्वर केवल कर्म और फल के चक्र को सुनिश्चित करता है, वह स्वेच्छा से न कृपा कर सकता है, न दंड दे सकता है। इस तरह न्याय दर्शन ईश्वर की मात्र ओष्ठ सेवा करता है। बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर आधारित वेदांत भारतीय दर्शनों की अन्तिम परिणति है जिसे शंकर के अद्वैतवाद में सुष्ठ अभिव्यक्ति मिली। मनुष्य की उन्नत चेतना ही परम चेतन तत्व है जो एकमात्र सत्य है, और अनादि तथा अनंत है।
सतत परिवर्तनशील और नाशवान प्रकृति महज़ अध्यास है। चेतना की तरह वह भी अनादि है किन्तु उसकी तरह अनंत नहीं, बल्कि ज्ञान से निरस्य है–प्रज्ञानं ब्रह्म। शंकर के अद्वैतवाद के सर्वसुलभ न होने से रामानुज ने अपने विशिष्टाद्वैत में भक्तिमार्ग का निरूपण किया जो जन जन को प्राप्य है। वल्लभ का शुद्धाद्वैत, चैतन्य का अचिंत्यभेदाभेद और माधव का द्वैत सभी भक्ति और समर्पण का सर्वजनसुलभ और सुगम मार्ग प्रस्तुत करते हैं।
त्रयी, उपनिषद् , वार्ता (कृषि एवं व्यापार) आन्वीक्षिकी (दर्शन) दंडनीति और चौसठ कलाएँ भारतीय शिक्षा पद्धति के अविभाज्य अंग हैं।
समाज व्यवस्था सनातन का अंग नहीं। यह युगानुरूप परिवर्तनशील है। जीवन के चार पुरुषार्थों– धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में धर्म प्रथम और प्रधान है। धर्मानुसार अर्थ और धर्मानुसार काम ही जीवन के अन्तिम लक्ष्य के साधन है।
,और यही सनातन की आत्मा है। उसका मेरुदंड है। शेष सब इसकी सुदीर्घ यात्रा में समय-समय पर आए विचलन हैं। नहीं तो आनुषंगिक हैं।
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