~ कुमार चैतन्य
अध्यात्मवाद में चेतना प्रधान है, बाह्यजगत गौण. बाह्यजगत वस्तुपरक सत्य नहीं, सत्य का अध्यास मात्र है. माया है, लीला है. सत्य होने का आभास देकर चेतना को भ्रमित करता है. साँप और रस्सी का उदाहरण. शुद्ध चेतना ही परम चेतन आत्म तत्व है, वही परमात्मा है, वही सत्य है.
भौतिकवाद में बाह्यजगत वास्तविक है, सत्य है. चेतना पदार्थ के विशिष्ट समुच्चय से उद्भूत है और समुच्चय के विशृंखलित होने पर लुप्त हो जाएगी. वह किसी लोकोत्तर शुद्ध चेतना की छाया नहीं. ऐसी किसी शुद्ध चेतना का अस्तित्व ही नहीं, महज़ चेतना का भ्रम है.
पदार्थ से बना परिवेश चेतना में विक्षेप उत्पन्न करता है, जिससे बाह्यजगत वस्तुगत सत्य होने के बावजूद भिन्न-भिन्न चेतना को भिन्न-भिन्न भासित होता है.
व्यवहार में एक भेद और है :
अध्यात्म में गुरु बहुत पाए जाते हैं. गुरु प्रच्छन्न या प्रकट दावा करते हैं कि उनकी चेतना शुद्ध या परम चेतना की यात्रा में उच्चतर बिंदु पर पहुँच चुकी है. कुछ तो स्वयं के realized soul या शुद्ध चेतना होने का दावा तक करते पाए जाते हैं. तभी उन्हें औरों का पथ-प्रदर्शन करने, उन्हें उत्प्रेरित करने की अर्हता मिलती है.
इस दावे की पुष्टि में कई गुरु चमत्कारों का सहारा लेते हैं और उनसे सिद्ध करते हैं कि बाह्य जगत वास्तविक नहीं, अज्ञानजन्य अध्यास मात्र है. चमत्कारों से या अन्य साधनों से वे शिष्य की चेतना की जकड़बंदी कर लेते हैं, उसके चारों ओर कुंडली मारकर बैठ जाते हैं. मतलब, शिष्य में मुक्त चिंतन का अवकाश ही नहीं छोड़ते. यही नहीं उनको इमोशनल ब्लॉकमेल करके उनका आर्थिक दोहन और उनके घर की महिलाओं को भोगना भी करते हैं.
कई मरतबा, घोर मानसिक- शारीरिक कष्ट में पड़े शिष्य का आत्म-विश्वास (auto-suggestion के मनोपचार से) जगाकर उसे कष्ट से मुक्त भी कर देते हैं. उसे भी एक चमत्कार के रूप में पेश करते हैं. चमत्कारों के बिना प्रत्यक्ष दिखने और अनुभूत होने वाले भौतिक जगत को अध्यास मान पाना कठिन होता होगा.
मेरी जानकारी में संप्रति भौतिकवाद में कोई गुरु-शिष्य परम्परा नहीं है. द्वंद्वात्मक भौतिकवादियों की पार्टियाँ होती हैं, उनमें कुछ लोगों का अपेक्षित-अनपेक्षित वर्चस्व भी होता है, किन्तु उन्हें किसी भी अर्थ में विवेकहर्ता ‘गुरु’ नहीं कहा जा सकता।
भौतिकवादी मानते हैं कि अनुभव से, प्रकृति-प्रदत्त बुद्धि-विवेक से, पूर्वाग्रह-मुक्त निरीक्षण, परीक्षण से, बाह्यजगत में जो जानने योग्य है उसे जाना जा सकता है. जो नहीं है, वह हो सकता है, भविष्य में जाना जा सके। यह भी हो सकता है कि कभी न जाना जा सके. किंतु किसी शुद्ध या परमचेतन आत्मतत्व के अध्यारोपण के बजाए किसी कालबिंदु पर जो निश्चित रुप से और सार्वजनिक स्तर पर गम्य नहीं है उसे फ़िलहाल अज्ञेय या अव्याख्येय मान लेने में ज़्यादा ईमानदारी है.
विडंबना यह कि अध्यात्मवाद में चेतना की प्रधानता के बावजूद, गुरु के उत्प्रेरण के बिना शिष्य अपने शुद्ध रूप की अनुभूति करने में असमर्थ होता है. और गुरु स्वयं बाह्य जगत की वस्तु है, पदार्थ और चेतना का समुच्चय, बाह्यजगत की सीमाओं से सीमित, हाड़-मांस का बना एक प्राणी.
अध्यात्मवाद में यहीं सबसे बड़ा लोचा है। गुरु अपनी गुरुअई को धंधा बना लेते हैं। शिष्यों की खोज में रहते हैं, शिष्य मूड़ते हैं और उनका बुद्धि-विवेक हरकर अपना आश्रयी बना लेते हैं। शिष्यों की बढ़ती हुई संख्या देखकर उनकी छाती फूल जाती है, बात-व्यवहार बदल जाता है। [अपवाद तो हर जगह होते ही हैं।]
अंध अनुचरों की संख्या गुरुघंटालों के जीवन की उपलब्धि होती है, उनका ऐश्वर्य होता है, उसी में वे अपनी सार्थकता महसूस करते हैं। कई गुरु अपनी सांसारिक प्रवृत्ति के अनुरूप अनुकूलित मस्तिष्क वाले अमीर शिष्यों को जीभर लूटते हैं. युवा, सुंदर शिष्याओं का बलात्कार, सामूहिक बलात्कार तक से उनका शोषण करते हैं।
मज़े की बात यह की शिष्य तथा शिष्या शोषित होकर धन्य महसूस करते हैं–मानसिक अनुकूलन का कमाल। आसाराम बापू या बाबा राम रहीम आदि का हश्र कम ही गुरुओं का होता है। शेष का धंधा अनुरक्त शिष्यों-शिष्याओं के सहारे शान्तिपूर्वक, अबाध गति से चलता रहता है। समाज में उनकी प्रतिष्ठा अक्षुण्ण बनी रहती है। हिंदू समुदाय में ऐसे शोषक और परजीवी गुरुओं की बहुतायत है।
जब चेतना प्रधान है तो हर व्यक्ति की चेतना को मुक्त चिंतन द्वारा सत्य की स्वानुभूति के लिए स्वतंत्र छोड़ देने में क्या हर्ज है ? बल्कि गुरु की सहायता से जो अनुभूत होता है वह तो प्रकृत्या गुरु-सापेक्ष हुआ. भिन्न-भिन्न गुरु द्वारा उपदिष्ट भिन्न-भिन्न ‘ज्ञान’ , जब कि सत्य तो एक ही है।
भौतिकवादी इसी को चेतना में भौतिक परिवेश का विक्षेप या अध्यारोपण मानते हैं

