अमीर*
इस धरती पर
एक देश
ऐसा भी है
जहां मानते हैं लोग
स्त्री के भूखा रहने से
बढ़ जाती है आयु
पुरुष की…
इसी धरती पर
इसी देश में
ठोस होता जा रहा है
एक सत्य
करोड़ों लोगों के भूखा रहने से
बन गया है
सचमुच, एक व्यक्ति
दुनिया का सबसे अमीर…
*गजेंद्र रावत*
************************************
*तुम चोट्टे हो*
कुत्ते का भौंकना निरर्थक हो सकता है।
लेकिन मोय चिरैया का रोना खतरे से खाली नहीं।।
बिल्ली के रास्ता काटने से भले कुछ न हो।
लेकिन पागल सियार को सभी डरते हैं।।
तुम हो बड़े कमीने।
नहीं तो क्रांति हो सकती है।।
तुम अहमी हो।
नहीं तो विचारों को नजरअंदाज बिल्कुल न करते।।
तुम बड़के फिलॉसफर न बनते तो।
हम अभी तक अपना सफ़र तय कर लेते।
तुम्हारी संस्कृति आरामतलब है।
नहीं तो जातिप्रथा कब का तोड़ लिए होते।।
*आर डी आनन्द*
************************************
जीस्त में हरा न पाई मुसलसल्ल नाकामी उसे
हार कर अपनों से लहू करना पड़ा पानी उसे
सुबह की ठंडी हवा सा वो समझता था जिसे
जिंदगी की दोपहर देना पड़ा कुर्बानी उसे
जिसने नन्ही ख्वाहिशे आंखो में पाला उम्र भर
धुंधली शाम टूटी मिली चश्मे की कमानी उसे
रेत का घर क्या बनाया करके बगावत पत्थरो से
पोखर, दरिया, नदिया सब देने लगा पानी उसे
जिंदगी की दास्तां सुनने की है फुर्सत किसे
हकलाते हर्फ सुनाते लफ्जो की कहानी उसे
हो रहे जलसे” सरल” हर रोज जिनके नाम पर
काटती है रात पूस की ठिठुराती जिंदगानी उसे
*सरल कुमार वर्मा*
*उन्नाव, यूपी*
*9695164945*
************************************
*कम्युनिस्ट हिंसा नहीं करते*
कम्युनिस्ट कभी भी
हिंसा नहीं कर सकते,
दुनिया भर के
विद्रोही समाजवादी संघर्ष
अनगिनत साक्ष्यों के साथ खड़े हैं
कि उनका लक्ष्य
अनंत शांति
और
जनपक्षीय समृद्धि रहा है।
अहिंसा
एक मिथ्या धारणा है
पराधीनता को अंगीकार
करने का षड्यंत्र है।
जो आत्मरक्षा के
सन्तापी और अभिशप्त
संघर्षों के शूलपथ से विमुख रहे
वही करते आ रहे हैं
अहिंसा पर प्रवचन,
जिनकी
पूरी की पूरी शान और संस्कृति
स्त्री योनियों में है
और
उस वीभत्स संस्कृति
की बहाली के लिए
धर्मध्वजों के साथ
उधाड़ डालते हैं योनियों को
और
घुसाई दी जाती है
पत्थर कांच और लोहे की छड़ें।
कम्युनिस्ट प्रतिकार करते हैं
और ऐसी वहशी संस्कृति के
विरुद्ध खुलकर
उसके अंत की घोषणा करते हैं
कम्युनिस्ट हिंसा नहीं करते हैं।
*ए के ब्राइट*
************************************
क्या मिलिए ऎसे लोगों से
जिनकी फितरत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आये
असली सूरत छुपी रहे….
खुद से भी जो खुद को छुपाये
क्या उनसे पेहेचान करे
क्या उनके दामन से लिपटें
क्या उनका अरमान करे….
जिनकी आधी नीयत उभरे
आधी नीयत छुपी रहे
नकली चेहेरा सामने आये
असली सूरत छुपी रहे….
दिलदारी का ढोंग रचाकर
जाल बिछाए बातों का
जीतेजी का रिश्ता कहकर
सुख ढूंढे कुछ रातों का…
रूह की हसरत लाभ पर आये
जिस्म की हसरत छुपी रहे
नकली चेहरा सामने आये
असली सूरत छुपी रहे….।
*आर डी आनन्द*
************************************
*यही मौका है*
यही मौका है, हवा का रुख है
ग़रीबों को भगाने का
मज़ा आ गया, भगाओ ग़रीबों को
कनस्तर पीट कर जानवरों को भगाते हैं जैसे
हवा चल पड़ी है
ग़रीब अब सही फँसे हैं
राक्षस की फूँक से उनकी झोपड़ी उड़ जा रही है
पैरों तले सरकती ज़मीन
और तेज़ी से गायब हो रही है
मज़ा ले-लेकर यह मंज़र भोगने का
यही वक्त तय है
इतिहास का सीरियल चल रहा है
वक्त पैसा है और यही वक्त है
ग़रीबों को लूट मारने का
ग़रीब अब गहरे जाल में फँस गये हैं
वे नहीं जानते कि उनके साथ लेनिन है या लोकनाथ
वे नहीं जानते कि गोली चलेगी या नहीं!
वे नहीं जानते कि गाँव-शहर में कोई उन्हें नहीं चाहता
इतना न-जानना बुखार का चढ़ना है
जब इंसान तो क्या, घर-बार, बर्तन-बाटी
सब तितली बन उड़ जाते हैं
यही ग़रीब भगाने का वक्त कहलाता है
कवियों ने ग़रीबों का साथ छोड़ दिया है
उन पर कोई कविता नहीं लिख रहा
उनकी शक्ल देखने पर पैर जल जाते हैं
हवा चल पड़ी है, यही मौका है
ग़रीबों को भगाने का
कनस्तर पीट कर जानवरों को भगाते जैसे
मौका है ग़रीबों को भगाने का
यही मौका है, हवा चल पड़ी है।
*अनुवाद – लाल्टू*
*नबारुण भट्टाचार्य*
************************************
जीस्त में हरा न पाई मुसलसल्ल नाकामी उसे
हार कर अपनों से लहू करना पड़ा पानी उसे
सुबह की ठंडी हवा सा वो समझता था जिसे
जिंदगी की दोपहर देना पड़ा कुर्बानी उसे
जिसने नन्ही ख्वाहिशे आंखो में पाला उम्र भर
धुंधली शाम टूटी मिली चश्मे की कमानी उसे
रेत का घर क्या बनाया करके बगावत पत्थरो से
पोखर, दरिया, नदिया सब देने लगा पानी उसे
जिंदगी की दास्तां सुनने की है फुर्सत किसे
हकलाते हर्फ सुनाते लफ्जो की कहानी उसे
हो रहे जलसे” सरल” हर रोज जिनके नाम पर
काटती है रात पूस की ठिठुराती जिंदगानी उसे
*सरल कुमार वर्मा*
*उन्नाव, यूपी*
*9695164945*
************************************
एक नया ज्ञान बताते है।
मार्क्स की ज्ञान बेच कर पूंजीपति बन जाते है।
चुनावी दलाल बनते है।
जनता को मूर्ख बनाते है।
चन्दा मांग कर खाते है।
गांजा – चिलम पीकर दूसरो को मूर्ख बताते है।
एक दिन ना उतरे जमीन पर वे जाहिल…!
बड़े फेसबुकिया क्रांतिकारी कहलाते है।
ट्रेनिंग खूब कराते है।
पूंजी भी कमाते है।
पूंजी को कमा खुद लाखों।
मार्क्सवादी बन जाते है।
काजू की रोटी खा कर…!
भूखो को ज्ञान देते है।
खुद बनेंगे पूंजीपति।
जनता को झूठा साम्यवाद पढ़ाते है।
क्रांतिकारी भी कहलाते है।
जमीन पर लड़ाई की बात को लेकर।
सोशल मीडिया पर ज्ञान दे जाते है।
कभी – कभी आते है।
साम्यवाद को बदनाम कर के जाते है।
खूब मलाई खाते है।
दूसरो को मूर्ख वादी बताते है।
सोच लो जानता और छात्रों।
ये तुमको बेवकूफ बनाते है।
खुद ना गए एक बार भी जेल।
राजनैतिक बंदी को गलत बताते है।
अपना तर्क नहीं चलता है।
तो दूसरों को भटकाते है।
एक दिन भी नहीं बहाते अपना खून पसीना।
क्रांतिकारियों को अराजक बताते है।
याद करो अमेरिकी साम्राज्यवाद को…!
जिसने साम्यवादी को आतंकी बताया है।
इन्होंने ने भी चारु मजूमदार को..!
आतंकी अपराधी ठहराया है।
ये क्या जाने जान कि कीमत।
संघर्ष और भूख की कीमत।
हमने बहुत चुकाया है।
लेकिन किसी को नहीं बताया है।
मेरे साथियों के बलिदान को..!
इन्होंने गलत ठहराया है।
साम्यवाद का चोला ओढ़ कर.!
मन में फासीवाद को बैठाया है।
क्या करे तर्क हम तुमसे।
जब हमारी बलिदान पर खुशी मनाते हो।
आओ दिखाते है क्या खोया है हमने।
तुम तो सिर्फ प्रवचन दे जाते हो।
एक दिन भी नहीं किया बहस तुमने।
झूठ आरोप लगाते हो।
शर्म नहीं आती है तुमको।
क्योंकि बेशर्मों शर्म भी घोल कर पी जाते हो।
*कॉमरेड राहुल*
************************************
शहर की कुछ पटरी पर नज़रे अकसर आती जाती है
वहाँ पे एक मानव प्रजाति की जैसी प्रजाति है
उसके भी दो हाथ उगे हैं
और उसके दो पावो़ भी है
दोआँखेँ हैं पास में उसके
और पलको पर भावँ भी है
काले कपड़े फटे फटे हैं
रंग भी उसके काले हैँ
धूप मे नंगे पावँ चले हैं
पाँव के नीचे छाले हैं
कब खाते हैं कब पीते हैं
पता करो कोई जाकर
मुल्ला पण्डित सिख़ इसाई
कोई नहीं इनका रहेबर
घर इनका है धुआँ धुआँ सा
चूलहे इनके ठंडे हैं
थ
ध्यान से देखो इनके घरों पर
किस पार्टी के झंडे हैं
किसी का झंडा अगर मिले तो
जाकर उसे बुला लाओ
वो आने से कतराय तो
जबरन उसे उठा लाओ
साथ मे इस प्रजाति के
कुछ भूखे नंगे बच्चे है
इन बच्चों के हाल से शायद
पालतू कुत्ते अच्छे है
अगर ये सचमुछ मानव हैं तो
मानव से क्दूर है ये
झोपड़ पट्टी में रहने पर
आखिर क्यूँ मजबूर है ये
बता दो ऐ भारत के लोगों
इनका हिन्दुस्तान नहीं
बतादो ऐ इनसाँ के दुश्मन
क्या ये सब इनसान नहीं
कभी तो इनपर गौर करो तुम
कभी तो इनको तुम देखो
कुछ रोटी अपने हिस्से की
इनकी जानिब फेंको तुम
जात पात सब जड़ से मिटा दो
अनवर का सनदेस है ये
मानवता मत भूलो अनवर
मानवता का देस है ये
*कामरेड अनवर*
************************************
वह कलकल बहती नदी थी
निष्छल प्रेम से भरी, उन्मुक्त
प्रेम में उसने अपनी मुक्ति देखी
और छककर प्रेम किया
लेकिन प्रेम में वह ठहर गयी
या यों कहें कि प्रेम बांध बनकर उसके सामने खड़ा हो गया
शुरू में उसे अच्छा ही लगा
थोड़ा रुककर जीते हैं
थोड़ा ठहरकर जीते हैं
लेकिन जल्द ही पानी सड़ने लगा
नदी अब बेचैन होने लगी
उमड़ने घुमड़ने लगी
बांध पर अपना सर पटकने लगी
आखिर बहना ही तो उसकी प्रकृति थी
लेकिन बांध तो बांध था
भले ही नदी का प्रेम था
नदी ने रास्ता बदला
उसने अब प्रेम में नहीं
ममता में अपनी मुक्ति देखी
वह फिर कलकल छलछल बहने लगी
उसे लगा वह मुक्त हो गयी
लेकिन कुछ समय बाद
बच्चा बड़ा हो गया
मां के सामने बांध बनकर खड़ा हो गया
नदी का पानी फिर सड़ने लगा
नदी फिर उमड़ने धुमड़ने लगी
बांध पर अपना सर पटकने लगी
लेकिन बांध तो बांध था
भले ही नदी का ममत्व था
नदी मायूस हो गयी, नदी उदास हो गयी
नदी सिकुड़ गयी
नदी कैद हो गयी
क्या यह कैद टूटेगी?
क्या नदी बांध तोड़ेगी?
लेकिन अब कलकल छलछल बहने से बांध नहीं टूटेगा
अब तो सैलाब ही बांध तोड़ेगा
क्या नदी सैलाब बनेगी?
लेकिन सच तो यह है कि
सैलाब बनने के लिए
नदी में पानी बहुत कम है
दोनों बांधों ने नदी का काफी पानी सोख लिया है
लेकिन नदी की सैलाब बनने की इच्छा बहुत प्रबल है
बांध पर वह अब भी पछाड़ खा रही है
सैलाब बनने की अपनी इच्छा बादलों को बता रही है
बादलों ने उसकी इच्छा सुनी
एक रोज गहरी काली रात
घनघोर बारिश हुई
एलान हुआ कि
नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है
नदी के जबरदस्त थपेड़े बांध की चूले हिला रहे थे
और वह समय भी आया
नदी सैलाब बन गयी
बांध को तो अब टूटना ही था
वह टूट गया
नदी मुक्त हो गयी
कुछ के लिए यह भयावह दृश्य था
तो कुछ के लिए अब तक का सबसे सुंदर दृश्य
नदी अब फिर कलकल छलछल बहने लगी
सुंदर लय में गाने लगी
“मुक्ति प्रेम में नहीं
बल्कि मुक्ति में ही प्रेम है”
*मनीष आज़ाद*
************************************
नहीं उतारा मैंने अपना पेटीकोट
दरोगा ने बैठाये रखा
चार दिन चार रात
मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट
मेरी तीन साल की बच्ची अब तक मेरा दूध पीती थी
भूखी रही घर पर
मगर मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट
मेरी चौसठ साल की माँ ने दिया उस रात
अपना सूखा स्तन मेरी बिटिया के मुंह में
मगर मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट.
नक्सल कहकर बैठाया रखा चार दिन चार रात
बोला, ‘बीड़ी लेकर आ’
बीड़ी का पूड़ा लेके आई
‘चिकन लेके आ रंडी’
चिकन ले के आई
‘दारू ला’
दारू लेके आई.
माफ़ करना मेरी क्रांतिकारी दोस्तों
मैं सब लाई जो जो दरोगा ने मंगाया
मेरी बिटिया भूखी थी घर पर
दरोगा ने माँगा फिर मेरा पेटीकोट
मैं उसके मुंह पर थूक आई
भागी, पीछे से मारी उसने गोली मेरी पिंडली पर
मगर मैंने उतारा नहीं अपना पेटीकोट।
*सोशल मीडिया से प्राप्त*

