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जागतें रहों….!

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शशिकांत गुप्ते

आज अचानक मुझे राधेश्यामजी मिल गएं। कहने लगे कल मै(राधेश्यामजी) सीतारामजी से मिलने गया तो,देखा वे सन 1949 में प्रदर्शित फ़िल्म अंदाज का यह गीत गुनगुना रहे थे। इसे लिखा है, गीतकार मजरूह सुलतानपुरी ने।
उठाये जा उन के सितम और जिये जा
यूँ ही मुस्कुराए जा आँसू पिये जा
यही है मुहब्बत का दस्तूर ऐ दिल, दस्तूर ऐ दिल
वो गम दे तुझे तू दुआएं दिये जा

जैसे सीतारामजी की नज़र मुझ पर पड़ी उन्होंने गुनगुना बन्द कर दिया और मुझे नमस्ते कहा।
मैने सीतारामजी से कहा आप
गीत की जो पंक्तियां गुनगुना रहें हैं,इन पँक्तियों तो समर्पण करने का संदेश है? आप तो व्यंग्यकार हो? व्यंग्य तो समाज के सुधार की सशक्त विधा है। व्यंग्य की शाब्दिक मार के द्वारा यथास्थितिवाद से संघर्ष करने का साहस जागृत होता है।
व्यंग्य की मार से ही हरक्षेत्र में परिवर्तन सम्भव हो पाया है और हो सकता है।
सीतारामजी ने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा और मुझसे कहा अपनी तक़रीर को बंद करों।
बार बार मुझे स्मरण करवाने की आवश्यकता नहीं कि, मै व्यंग्यकार हूँ।
यह गीत मै पैरोड़ी बनाने के लिए गुनगुना रहा हूँ।
पैरोड़ी की पंक्तियां मानस पटल पर अंकित हो रही थी,उसी समय आपका आगमन हो गया। मेरी एकाग्रता भंग हो गई।
सीतारामजी की एकाग्रता भंग करने के लिए मैने उनसे क्षमा मांगी और उनसे अनुरोध किया कि, आप जब पैरोड़ी लिख लेंगे तब मुझे जरूर पढ़वाना।
कुछ देर बाद मुझे सीतारामजी ने अपने घर बुलाया और पैरोड़ी सुनाई।
उठाए जा महंगाई का बोझ और बेरोजगार रह कर जिये जा
यूँ ही जिंदा रहने के लिए आंसू पिये जा
यही है मौन रहने की सज़ा,तू मुँह खोलेजा सच बोले जा
मत उठाना कोई सितम, लड़ाई लड़े जा
कभी भी बन्द न कर आँखे, नजर चारो ओर दौड़ाए जा
तू जागृत रहेगा सितम ढाने की हिम्मत नहीं कर सकेगी दुनिया
झूठ को उजागर किए जा
मत सहना कभी सितम लड़ाई निरंतर लड़े जा

मैने कहा यह तो आंदोलित करने की प्रेरणा देने वाली पैरोड़ी है।
आज यह बहुत जोख़िम का काम हो गया है।
सीतारामजी ने कहा हम तो प्रख्यात साहित्यकार जयशंकरजी के काव्य की इन पँक्तियों पर अमल करने में विश्वास करतें हैं।
वो पथ क्या, पथिक कुशलता क्या,
जिस पथ में बिखरें शूल न हों
नाविक की धैर्य कुशलता क्या
जब धाराएँ प्रतिकूल न हों।

यहीं जज़्बात हमारे स्वतंत्रता सैनानियों में थें।इसीलिए हम आज आजाद हैं, और आजाद रहेंगे।
राधेश्यामजी ने सीतारामजी से कहा मेरा तो जन्म ही स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हुआ,यह सोच कर मुझे अफसोस होता है। काश हम भी स्वतंत्रता संग्राम में शिरक़त करते।
सीतारामजी कहा आपको धन्यवाद देता हूँ। आप को स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागी नहीं होने का इतना तो अफ़सोस तो है।
राधयेशामजी कहा आपका इशारा मै समझ गया। आपने शब्दों के तीर से जो निशाना साधा है,उसके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ।
आज तो स्वतंत्रता संग्राम में शिरक़त न कर पाने का अफ़सोस को तो छोड़ ही दो,स्वतंत्रता प्राप्ति के पिचहत्तर वर्षों में सत्तर वर्ष के इतिहास को ही शून्य घोषित किया जा रहा है। यह कह कर, सत्तर वर्षों में कुछ हुआ ही नहीं।
जो शिक्षित नहीं सिर्फ पढ़े लिखें हैं, वे उक्त असत्य पर विश्वास कर लेतें हैं।
राधेश्यामजी ने सीतारामजी के कथन से सहमति दर्शायी और सावधानी बरतने की सलाह दी।
सीतारामजी को अपना युवावस्था का स्मरण हुआ,जब वह जनांदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते थे।
राधेश्यामजी विदा लेतें हुए, सीतारमजी ने पुनः सुवाक्य दोहराया।
परिवर्तन संसार का नियम है
*परिवर्तन आवश्यम्भावी है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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