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*सत्ता के सरोकार : किसी भी तरह सत्ता में बने रहना*

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तेज पाल सिंह ‘तेज

लोकतंत्र को अब तक की सबसे अच्छी शासन प्रणाली माना गया है। ज्यादातर देश इसे
पाने या बनाये रखने की रात-दिन कोशिशें करते रहे हैं। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की कुछ
समस्याएं और लोकतंत्र के समक्ष कुछ चुनौतियां भी है। चार प्रमुख समस्याएं कुछ इस प्रकार हैं

वास्तविक दृष्टिकोण: वास्तविक दृष्टिकोण से, सत्ता का मुख्य सरोकार सत्ता में बने रहना हो
सकता है। इस दृष्टिकोण से, सत्ता का उद्देश्य अपने हितों की रक्षा करना और अपनी शक्ति को
बनाए रखना होता है।
दोनों दृष्टिकोणों का मिश्रण: वास्तव में, सत्ता का मुख्य सरोकार दोनों दृष्टिकोणों का मिश्रण हो
सकता है। सत्ता का उद्देश्य जनता की सेवा करना और उनके हितों की रक्षा करना हो सकता है,
लेकिन साथ ही साथ सत्ता में बने रहने के लिए भी काम करना पड़ सकता है।
सत्ता का मुख्य सरोकार क्या होता है, इस बारे में विभिन्न दृष्टिकोण हो सकते हैं।
आदर्शवादी दृष्टिकोण से, सत्ता का मुख्य सरोकार जनता की सेवा करना होता है, जबकि
वास्तविक दृष्टिकोण से, सत्ता का मुख्य सरोकार सत्ता में बने रहना हो सकता है। वास्तव में,
सत्ता का मुख्य सरोकार दोनों दृष्टिकोणों का मिश्रण हो सकता है।
सत्ता का मुख्य सरोकार होता है:

  1. शासन और प्रशासन: सत्ता का मुख्य उद्देश्य शासन और प्रशासन करना होता है, जिसमें
    नीतियों और कार्यक्रमों का निर्माण और क्रियान्वयन शामिल होता है।
  2. जनता की सुरक्षा और कल्याण: सत्ता का उद्देश्य जनता की सुरक्षा और कल्याण को सुनिश्चित
    करना होता है, जिसमें कानून और व्यवस्था का पालन, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और अन्य
    आवश्यक सेवाएं शामिल होती हैं।
  3. आर्थिक विकास: सत्ता का उद्देश्य आर्थिक विकास को बढ़ावा देना होता है, जिसमें व्यापार
    और उद्योग को प्रोत्साहित करना, रोजगार के अवसर पैदा करना और गरीबी को कम करना
    शामिल होता है।
  4. न्याय और समानता: सत्ता का उद्देश्य न्याय और समानता को बढ़ावा देना होता है, जिसमें
    सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें समान अवसर प्रदान करना शामिल
    होता है।
    इन सरोकारों को पूरा करने के लिए, सत्ता विभिन्न कार्यों में शामिल होती है, जैसे कि:
  1. राजनीतिक शक्ति प्राप्त करना: राजनीतिक दल चुनावों में भाग लेकर और जीतकर
    राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
  2. नीतियों और कार्यक्रमों का निर्माण: राजनीतिक दल अपने विचारों और सिद्धांतों के आधार
    पर नीतियों और कार्यक्रमों का निर्माण करते हैं जो देश और समाज के विकास के लिए महत्वपूर्ण
    होते हैं।
  3. जनता की समस्याओं का समाधान: राजनीतिक दल जनता की समस्याओं का समाधान करने
    और उनके हितों की रक्षा करने का प्रयास करते हैं।
  4. देश के विकास में योगदान: राजनीतिक दल देश के विकास में योगदान करने और समाज के
    विभिन्न वर्गों के हितों की रक्षा करने का प्रयास करते हैं।
    इन सरोकारों को पूरा करने के लिए, राजनीतिक दल विभिन्न गतिविधियों में शामिल
    होते हैं, जैसे कि:

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में अभूतपूर्व सफलता
प्राप्त की।

मोदी के राजनीतिक उद्देश्यों में शामिल हैं:

 आपको उस दिन समझ जाना चाहिए था जब इन लोगों ने बनारस को स्मार्ट सिटी
बनाने के नाम पर उसकी प्राचीनता को नष्ट कर दिया था। आप यह सोचना मूर्खता है कि
ये लोग हिंदुओं के हितैषी हैं। जिन लोगों का उद्देश्य केवल विनाश और लूटपाट है, उनसे
किसी का भला नहीं हो सकता।

 आपको उस दिन समझ जाना चाहिए था जब इन लोगों ने अयोध्या में सेना की जमीन
अपने अमीर दोस्तों को बांट दी थी। आप क्या सोच रहे थे? ये लोग देशभक्त हैं। ये लोग
भारत को बेचने पर तुले हुए हैं। इसके लिए उन्हें पहले हिंदुस्तानियत को खत्म करना
होगा। और वो वही कर रहे हैं। एक-एक करके सबको लड़ाओ और फिर एक-एक करके
सबको हराओ।
 हाँ, एक बार फिर इस देश में फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई जा रही है।
और हम फिर से इन काले अंग्रेजों के गुलाम बनने जा रहे हैं। अभी भी समय है।
 सावधान रहो। इन नकली राष्ट्रवादियों और जहर खाने वालों को पहचानो। ये तुम्हें
नफरत का नशा देकर तुम्हारे देश को लूटने आए हैं।
 अपना देश बचाओ। अपना हिंदुस्तान बचाओ। अपनी हिंदुस्तानियत बचाओ।
मोदी के सत्ता नीति से लोकतंत्र को खतरा है?
हाँ, नरेंद्र मोदी की सत्ता नीति से भारतीय लोकतंत्र को गंभीर खतरे हैं — और इसे
केवल राजनीतिक आलोचना के रूप में नहीं, बल्कि एक सैद्धांतिक, ऐतिहासिक और समकालीन
दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
सत्ता नीति बनाम लोकतांत्रिक मूल्योंलोकतंत्र केवल बहुमत से सत्ता पाने की व्यवस्था नहीं है — यह संविधान, संस्थानों कीस्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों और बहुलवाद पर आधारित एक मूल्य प्रणाली है। नरेंद्र मोदी की
सत्ता नीति को समझने के लिए इस मूलभूत लोकतांत्रिक संरचना के संदर्भ में उसका विश्लेषण
करना आवश्यक है।

  1. लोकतंत्र का केंद्रीय मूल्य:
    लोकतंत्र का केंद्रीय मूल्य असहमति का सम्मान है लेकिन मोदी की सत्ता शैली में
    असहमति को देशद्रोह की श्रेणी में रखा जाता है। पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता, छात्र,
    लेखक और बुद्धिजीवी — जो भी मोदी सरकार के विरोध में बोलता है, वह या तो “अर्बन
    नक्सल” कहा जाता है या “टुकड़े-टुकड़े गैंग” का हिस्सा। UAPA, राजद्रोह जैसे कड़े कानूनों का

दुरुपयोग कर आलोचना को दबाया जा रहा है। लोकतंत्र तब मरता है जब असहमति को
अपराध बना दिया जाए।

  1. संविधान की अवहेलना और संस्थानों का क्षरण :
    मोदी की सत्ता नीति के तहत: संसद का महत्त्व लगातार घटाया गया है। महत्वपूर्ण
    विधेयक जैसे कृषि कानून, CAA, बिना पर्याप्त बहस के पारित किए गए। राष्ट्रपति, राज्यपाल,
    चुनाव आयोग, CBI, ED, IT — ये सभी संवैधानिक संस्थाएँ कार्यपालिका के अधीन नजर
    आती हैं। RTI कानून को कमजोर करना, सुप्रीम कोर्ट के Collegium में हस्तक्षेप की कोशिश,
    ये लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला है। संस्थानों की निष्पक्षता लोकतंत्र की रीढ़ है, और जब वे
    सत्ताधीश के औजार बन जाएँ, तो लोकतंत्र खोखला हो जाता है।
  2. धर्म और राष्ट्रवाद का घातक मेल :
    मोदी की सत्ता शैली: धर्म को राजनीति के केंद्र में लाया गया है। “रामराज्य” की बात
    एक नैतिक आदर्श नहीं, राजनीतिक हथियार बन चुकी है। मॉब लिंचिंग, लव जिहाद, धर्मांतरण
    कानून, गौ रक्षा जैसी चीज़ें राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनीं। अयोध्या में राम मंदिर का
    निर्माण धार्मिक आस्था से अधिक एक राजनीतिक विजय के रूप में प्रस्तुत किया गया। जब
    सरकार धर्म के आधार पर जनभावनाओं को भड़काकर सत्ता में रहे, तो लोकतंत्र भीड़ तंत्र में
    बदल जाता है।
  3. मीडिया पर नियंत्रण और ‘सूचना का आतंक’ :
    टीवी चैनलों पर बहस का केंद्र “हिंदू बनाम मुसलमान”, “देशभक्त बनाम देशद्रोही” बना दिया
    गया है। सरकारी विज्ञापन और डर के बल पर बड़े मीडिया घरानों को काबू किया गया है।
    डिजिटल मीडिया और यूट्यूब पत्रकारों पर राजकीय उत्पीड़न बढ़ा है — रवीश कुमार जैसे
    स्वतंत्र पत्रकार हाशिए पर हैं। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, लेकिन मोदी काल में यह
    सरकार का मुखपत्र बन गया है।
  4. वोट आधारित नहीं, भावनाओं आधारित राजनीति
    मोदी की सत्ता नीति जनकल्याण से अधिक भावनाओं को नियंत्रित करने की नीति है —
    “56 इंच का सीना”, “सर्जिकल स्ट्राइक”, “पाकिस्तान को सबक”, “मुस्लिम आबादी का खतरा”
    जैसे भावनात्मक विमर्श। इससे जनता की बुनियादी समस्याएँ — बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा,
    महंगाई — दब जाती हैं। लोकतंत्र तर्क का शासन है, लेकिन जब उसे भावनाओं के तूफ़ान में
    डुबो दिया जाए, तब तानाशाही चुपचाप जन्म लेती है।
  5. चुनाव प्रक्रिया में असंतुलन और “इलेक्टोरल ऑटॉक्रेसी”

इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के ज़रिए राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता ख़त्म कर दी गई।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता संदेह के घेरे में है — आचार संहिता उल्लंघन पर प्रधानमंत्री को
छूट मिलती है।
सोशल मीडिया और डेटा का दुरुपयोग — जैसे Cambridge Analytical – स्टाइल प्रचार के
माध्यम से मतदाता भावनाओं को नियंत्रित करना। जब चुनाव लोकतंत्र का उत्सव नहीं,
तकनीकी नियंत्रण का ज़रिया बन जाए, तब लोकतंत्र केवल दिखावा रह जाता है।

  1. एक व्यक्ति का वर्चस्व और संगठन का क्षय :
    भाजपा अब Modi-centric party बन चुकी है, न कि संगठनात्मक विमर्श वाली पार्टी।
    पार्टी के वरिष्ठ नेता (आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी) को मार्गदर्शक मंडल में डालकर
    दरकिनार किया गया। कैबिनेट और संसद केवल स्वीकृति की मुहर लगाते हैं, न कि विमर्श का
    मंच। व्यक्तिवादी नेतृत्व लोकतंत्र नहीं, राजतंत्र की छाया बनता है।
    लोकतंत्र खतरे में क्यों है?
    “लोकतंत्र का अंत टैंकों से नहीं, तालियों से होता है” — यह अमेरिकी लेखक टिमोथी
    स्नाइडर का वाक्य नरेंद्र मोदी की सत्ता नीति पर पूरी तरह लागू होता है।
    लेकिन मोदी के नेतृत्व में: लोकतंत्र की संस्थाएँ कमज़ोर की जा रही हैं। अल्पसंख्यकों को भय
    और बहुसंख्यकों को वर्चस्व का नशा दिया जा रहा है। विकास की जगह विभाजन की राजनीति
    हो रही है। और जनता को तर्क से नहीं, भावना और प्रचार से नियंत्रित किया जा रहा है। यह
    एक खतरनाक प्रयोग है — जिसमें चुनाव रहते हैं, लेकिन लोकतंत्र नहीं।
    क्या समाधान है?
    संवैधानिक शिक्षा का प्रसार: जनता को संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की जानकारी दी
    जाए। स्वतंत्र मीडिया और न्यायपालिका: इन संस्थाओं की स्वायत्तता को नागरिक आंदोलनों से
    सुरक्षित रखा जाए।
    धर्मनिरपेक्षता की पुनर्स्थापना: राजनीति को धर्म के प्रभाव से अलग करने का जनदबाव बने।
    नागरिक आंदोलन: शाहीन बाग जैसे आंदोलनों की ऊर्जा को दीर्घकालीन लोकतांत्रिक संघर्ष में
    बदला जाए।
    साझा विपक्ष: लोकतंत्र की रक्षा के लिए सभी लोकतांत्रिक ताकतों को साझा मंच पर लाया
    जाए।

कुछेक प्रतिक्रियाए :

राजनीतिक दलों का लक्ष्य क्या सत्ता हासिल करना ही है ? पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था।
पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं। – Patrika Deskआपकी
बात
सत्ता नहीं, देश की सेवा हो लक्ष्य :
राजनीतिक दलों का मूल लक्ष्य देश की सेवा करना होना चाहिए। साथ ही समाज में अमन-चैन
व भाईचारे की भावना को बनाए रखते हुए जनता को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए
संघर्ष करना चाहिए। मुश्किल यह है कि वर्तमान दौर में राजनीतिक दलों ने अपने कर्तव्य से
विमुख होकर सत्ता हासिल करना ही अपना लक्ष्य बना लिया है और देशभक्ति को सत्ता की भूख
के पीछे भूल गए हैं। अब भी वक्त है कि राजनीतिक दल देश हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।
जिन दलों ने अपने सिद्धांतों व नीतियों की अनदेखी की, उनका पतन ही हुआ है।- सुनील कुमार
माथुर,
जोधपुर
सत्ता पर कब्जे का खेल :
आजकल राजनीतिक दल साम, दाम, दंड व भेद का प्रयोग कर सत्ता पर काबिज रहना चाहते
हैं। हम देखते हैं कि आचार संहिता लागू होने से चुनाव परिणाम आने तक अपराध बढ़ जाते हैं।
एक दूसरे पर लांछन व दोषारोपण करने का दौर रहता है, जो जनता को भयभीत भी करता है।
साफ है राजनीतिक दलों का लक्ष्य सत्ता हासिल करना ही है। –शिवराज सिंह, झाबुआ, मध्य
प्रदेश
नेताओं की खरीद-फरोख्त :
राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों मे बड़े- बड़े वादे किए जाते हैं। भोली-भाली आम
जनता को इनके माध्यम से ‘सुशासन के सब्जबाग’ दिखाए जाते हैं। चुनाव के परिणाम के बाद
किसी दल को बहुमत मिल जाए, तो उस दल की पौ-बारह वरना अन्य दलों के साथ उनका
जोड़-तोड़ शुरू हो जाता है। नेताओं की खरीद-फरोख्त के किस्से आने लगते हैं। -नरेश कानूनगो,
देवास, मध्यप्रदेश
सत्ता पाना ही लक्ष्य

वर्तमान समय में राजनीतिक दलों का लक्ष्य किसी भी तरह सत्ता को हासिल करना रह गया है।
जनता को गुमराह करके सत्ता हासिल करना और धन कमाना ही राजनीतिक दलों का प्रमुख
लक्ष्य रह गया है। – सुरेंद्र बिंदल, जयपुर
राजनीतिक दलों का लक्ष्य :
राजनीतिक दलों का लक्ष्य केवल सत्ता पाना ही होता है। सत्ता के लिए वे कुछ भी करने को
तैयार रहते हैं। इसके लिए वे समाज को विभाजित भी कर देते हैं। –सौरव साहनी, वैशाली,
बिहार
सत्ता के लालची दल :
नेताओं को न तो महंगाई दिख रही है और न ही बेरोजगारी। कानून व्यवस्था भी भगवान भरोसे
है। उनको तो सिर्फ अपनी कुर्सी दिख रही है। जनता जाए भाड़ में। दल बदलने का तो रिवाज
बन गया है। जिस दल से स्वार्थ सिद्ध हो रहा है, नेता उसी दल में जा रहे हैं। -अर्जुन सिंह बारड़,
अनादरा, सिरोही
विपक्ष की भूमिका भी निभाए :
सभी राजनीतिक दल सत्ता में नहीं हो सकते। इसलिए राजनीतिक दलों को विपक्ष का भी
उत्तरदायित्व होना चाहिए,जिससे जन मुद्दों की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित किया जा
सके। –मनु प्रताप सिंह, चींचडौली, खेतड़ी
सत्ता का प्रश्न एक नैतिक-राजनीतिक द्वंद्व — सत्ता — यह शब्द जितना साधारण लगता है,
उतना ही गूढ़ और बहुआयामी है। क्या सत्ता का मुख्य सरोकार जनता की सेवा होता है या
केवल सत्ता में बने रहना? यह प्रश्न सिर्फ़ राजनीतिक विज्ञान की शुष्क बहस नहीं है, बल्कि
लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा एक केंद्रीय प्रश्न है। जब सत्ता सेवा से कटकर केवल स्थायित्व की
ओर झुकती है, तो वह लोकतंत्र को खोखला कर देती है।

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