शिवानन्द तिवारी, पूर्व सांसद
. असाधारण जीवन जीने वाले घनश्याम जी साधारण आदमी थे. आज पीएमसीएच अस्पताल में उनका देहांत हुआ. सिवान ज़िला के पंजुआर गाँव के निवासी थे. किशन पटनायक के नेतृत्व वाले लोहिया विचार मंच में हमलोग साथ थे. मंच का गठन 1972 में हुआ था.
शुक्ल जी मध्य विद्यालय में शिक्षक थे. लेकिन उन्होंने जेपी और प्रभावती जी के नाम पर कॉलेज की स्थापना की. वह कॉलेज जितना व्यवस्थित और पारदर्शी ढंग से संचालित होता है, उसका नज़ीर दिया जा सकता है. इसके अलावा लड़कियों के लिए कस्तूरबा गांधी के नाम पर एक हाई स्कूल की भी स्थापना उन्होंने की है. वह अब इंटर तक हो चुका है.
सबसे ताज्जुब तो यह है कि उस ग्रामीण इलाक़े में उन्होंने लड़कियों के लिए महिला बॉक्सर मेरीकॉम के नाम पर हॉकी और एथलेटिक्स के लिए स्पोर्ट्स स्कूल भी शुरू किया था. अब वह स्कूल पूरी तरह जीवंत और स्थापित हो चुका है. स्कूल की दो तीन लड़कियाँ राज्य स्तरीय हॉकी टीम के लिए चुनी भी गई हैं. ज़िला स्तरीय एक पुस्तकालय भी विद्या भवन के नाम पर चल रहा है. भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खां के नाम पर संगीत महाविद्यालय भी उनकी पहल से चलाया जा रहा है.मुझे नहीं लगता है कि बिहार के किसी भी गाँव में इतनी तरह की जीवंत संस्थाएं चल रही हों. वह भी किसी एक व्यक्ति की पहल पर.
उनकी इच्छा मुसहर और डोम समाज के बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय शुरू करने की थी. लेकिन पिछले दो तीन वर्षों से प्रोस्टेट की बीमारी बढ़ जाने और उसके कैंसर में बदल जाने की वजह से वे अपनी अंतिम परियोजना को मूर्त रूप नहीं दे पाये.
घनश्याम जी की हर परियोजना को गाँव जवार के लोगों ने आँख बंद कर समर्थन दिया. ऐसा क्यों ? वे निस्पृह व्यक्ति थे. हर तरह के लोभ लालच से मुक्त. आज के युग में शुक्ल जी का व्यक्तित्व अविश्वसनीय जैसा लगता है. एक मर्तबा कॉलेज में क्लर्क की बहाली होनी थी. कॉलेज के लिए वह आर्थिक संकट का समय था. कालेज की समिति ने तय किया कि शैक्षणिक योग्यता को ध्यान में रखते हुए सहयोग के रूप में नौकरी की आकांक्षा रखने वालों से आर्थिक मदद के रूप में एक निश्चित राशि भी ली जाएगी. शुक्ल जी की एक बहू भी वह शैक्षणिक योग्यता रखती थी. परिवार के लोग सहयोग राशि देने के लिए तैयार थे. लेकिन शुक्ल जी का शुरुआती दौर में ही निर्णय था कि मेरे परिवार का कोई भी सदस्य कॉलेज के साथ किसी भी रूप में नहीं जुड़ेगा. जब उनको यह जानकारी मिली तो उन्होंने कह दिया कि अगर ऐसा हुआ तो इसके बाद कॉलेज के साथ कोई संबंध नहीं रहेगा. अंततोगत्वा परिवार को आवेदन वापस लेना पड़ा.जब स्कूल की सेवा से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया तो उनको जो भी राशि मिली उसको उन्होंने उस कॉलेज के कोष में ही जमा कर दिया. इतना ही नहीं उनको जो पेंशन की राशि मिलती है वह भी उनके निर्देशानुसार कॉलेज के खाता में जमा हो जाता है. सबसे सुखद यह है कि उनके सभी फ़ैसलों को परिवार ने अंतिम समय तक सम्मान पूर्वक और सहर्ष स्वीकार किया.
घनश्याम जी गाँधी-लोहिया की धारा के साथ आजीवन जुड़े रहे. लोहिया विचार मंच, समाजवादी जन परिषद और अंत में योगेन्द्र यादव के साथ स्वराज अभियान और किसान आंदोलन के साथ. उनके गाँव में विभिन्न कार्यक्रमों के अवसर पर किशन पटनायक, मेधा पाटकर, सच्चिदा जी, अशोक सेकसरिया, सुनील, योगेन्द्र यादव आदि का जाना होता रहा है.
अभी हाल में वे महावीर कैंसर अस्पताल में केमोथीरेपी करा कर मिलने आए थे. उन्होंने कहा था कि मानसिक रूप से उन्होंने अपने को मौत के लिए भी तैयार कर लिया है. आज सुबह सुबह दिनारा से जानकी भगत, दिल्ली से उदयभान, सिवान से अशोक दूबे का फ़ोन आया. घनश्याम शुक्ल विरल व्यक्ति थे. उनकी स्मृति को सादर प्रणाम करता हूँ.
बालीवुड एक्टर पंकज त्रिपाठी ने लिखा इमोशन पोस्ट
घनश्याम शुक्ला ने गुरुवार को 77 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। उन्हें क्षेत्र के लोग ‘गांधीजी’ कहते थे। पंजवार निवासी घनश्याम शुक्ला का पूरा जीवन शिक्षण में ही व्यतीत हुआ। वे शिक्षक थे, अवकाश ग्रहण करने के बाद भी उनकी यह भूमिका बनी रही। घनश्याम के निधन पर बालीवुड एक्टर पंकज त्रिपाठी ने ट्विटर पर इमोशनल पोस्ट किया। लिखा, बेहतर शिक्षक एक समाज को कैसे सुंदर दिशा देता है, उसका प्रत्यक्ष उदाहरण घनश्याम शुक्ला मास्टर जी रहे हैं। विद्यालय, पुस्तकालय, डिग्री कालेज और ग्रामीण बालिकाओं हेतु मेरीकॉम स्पोर्ट्स क्लब की स्थापना जैसा वृहद कार्य उन्होंने किया। गुरु जी को सादर श्रद्धांजलि, आप याद आएंगे और प्रेरणा देते रहेंगे।
जेपी आंदोलन में भी निभाई भूमिका
बता दें कि सामाजिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेना और लोगों को सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ाना ही घनश्याम शुक्ला के जीवन का उद्देश्य था, जिसका निर्वहन उन्होंने आखिरी दम तक किया। वे 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान भी काफी सक्रिय भूमिका में रहे। उस दौरान मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कई-कई दिन उनके यहां ठहरे थे। अवकाश ग्रहण करने के बाद घनश्याम शुक्ला पूरी तरह से महिलाओं के उत्थान, खेल, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों को समर्पित हो गए। समाज सुधार के क्षेत्र में उनके प्रयासों के कारण ही लोग क्षेत्र के लोग उन्हें गांधीजी कहते थे।
गूंजा घनश्याम शुक्ला अमर रहें का नारा
घनश्याम शुक्ला ने लड़कियों की शिक्षा के लिए गांव में ही कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, प्रभा प्रकाश डिग्री कालेज, महिला स्पोट्स क्लब, बिस्मिल्लाह खान संगीत महाविद्यालय सहित दर्जनों संस्थान व संगठनों की नींव डाली। उनके पढ़ाए शिष्य आज कई जगहों पर उच्च पदों पर हैं। घनश्याम शुक्ला के निधन की सूचना मिलते ही शोक की लहर दौड़ गई। उनके अंतिम दर्शन को जनप्रतिनिधि, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता समेत बड़ी संख्या में लोग जुटने लगे। घनश्याम शुक्ला अमर रहें के नारे गूंज रहे थे। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार प्रभा प्रकाश डिग्री कालेज परिसर में ही किया गया, जहां उनके पुत्र बड़े विद्या भूषण शुक्ला ने मुखाग्नि दी।

