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*शिमला के धामी में पत्थर मेला:एक दूसरे पर पत्थरबाजी करते हैं लोग, काली को चढ़ाया जाता है घायल का खून*

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शिमला: हिमाचल देवभूमि के साथ साथ मेले, त्योहारों का प्रदेश है. प्रदेश की वादियों में जितनी मोहक सुंदरता बसती है, उतनी ही गहराई यहां की लोक परंपराओं में भी झलकती है. ऐसे ही शिमला जिले से 30 किलोमीटर दूर धामी क्षेत्र में मनाया जाने वाला अनोखा पत्थर मेला, जो हर साल दीपावली के अगले दिन आयोजित होता है. ये मेला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि वो परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है. ये आस्था और साहस का प्रतीक मानी जाती है. ऐसा मेला शायद ही कहीं और मनाया जाता हो.

इस मेले में एक दूसरे पर खूब पत्थर बरसाए जाते हैं. मेले में दो गुटों के बीच होने वाली पत्थरबाजी तब तक चलती है, जब तक किसी का खून जमीन पर न गिर जाए, जैसे ही किसी के रक्त की पहली बूंद जमीन पर गिरती है, मेले में पत्थरबाजी रुक जाती है. ये दृश्य जितना रोमांचक होता है, उतना ही आस्था से भरा भी.

हुआ मेले का आयोजन

आज मंगलवार को ‘पत्थर मेले’ में एक-दूसरे पर जमकर पत्थर बरसाए गए. करीब 25 मिनट तक पत्थरबाजी होती रही. इसके बाद, धामी के सुभाष को एक पत्थर लगा और उनके शरीर से खून निकलने के बाद पत्थरबाजी बंद हो गई. घायल व्यक्ति के खून से मां भद्रकाली के चबूतरे पर तिलक लगाया गया.

शिमला के धामी में होता है पत्थर मेला

ऐसे हुई मेले की शुरुआत

इस मेले में पत्थर बरसाने की शुरुआत कब हुई इसकी सही तारीख तो किसी को नहीं मालूम, लेकिन इसकी शुरुआत कैसे हुई इसके बारे में साहित्यकार एस आर हरनोट बताते हैं कि \

‘सैकड़ों साल पहले धामी रियासत में स्थित मां भीमाकाली के मंदिर में इलाके की सुख-शांति और राज परिवार के सुनहरे भविष्य के लिए मानव बलि दी जाती थी. धामी रियासत के राजा राणा की रानी इस मानव बलि के खिलाफ थी. राजा की मौत के बाद जब सती होने का फैसला लिया, तो उन्होंने नरबलि पर प्रतिबंध लगवा दिया था. इसके बाद यहां पशुबलि शुरू की गई. मान्यता है कि माता ने पशु बलि स्वीकार ना करने पर इस पत्थर के खेल की शुरुआत हुई जो आज भी चला आ रहा है.’

खूंद कुल के लोग होते हैं पत्थरबाजी में शामिल

राज परिवार के सदस्य करते हैं खेल की शुरुआत

इस परंपरा को निभाने के लिए जिस जगह पर पत्थरों के खेल को खेला जाता है, उसे चौरा कहते हैं. यहीं पर बलि रुकवाने वाली रानी का (शारड़ा चौराहा) स्मारक भी बना है. इस मेले में पत्थर मारने वालों को खूंद कहते हैं. मेले वाले दिन सबसे पहले राज परिवार के सदस्य और राज पुरोहित भगवान श्री नरसिंह मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं. उसके बाद ढोल-नगाड़ों के साथ हजारों लोग चौरा पर पहुंचते हैं. राज परिवार के साथ कटैड़ू और तुनड़ु, दगोई, जगोठी के खूंद कुल के होते हैं, जबकि दूसरी टोली में जमोगी खूंद के लोग शामिल होते हैं. दोनों टोलियां पूजा अर्चना करती हैं. राजपरिवार का सदस्य पत्थर फेंक कर खेल की शुरुआत करता है, उसके बाद दोनों टोलियों के बीच पत्‍थर का खेल शुरू होता हैं.

माता सती ने बंद करवाई थी नरबलि

कैसे रुकती है पत्थरबाजी

दोनों खुंद टोलियां आमने सामने से एक दूसरे पर पत्थर बरसाती हैं. ये पत्थरबाजी का दौर तब तक चलता रहता है, जब तक कि दोनों टोलियों में से किसी एक व्यक्ति के शरीर से खून नहीं निकल जाता. पत्थरबाजी में जैसे ही कोई घायल होता है तो तीन महिलाएं अपने दुपट्टे को लहराती हुई आती हैं, जो पत्थरबाजी को रोकने का संकेत है. इसके बाद घायल आदमी का खून भद्रकाली के चबूतरे पर चढ़ाया जाता है.

कौन-कौन ले सकता है पत्थरबादी में भाग

40 साल से इस मेले का आयोजन करवा रहे मेला सचिव रणजीत सिंह ने बताया कि ‘इस मेले का आयोजन धामी क्षेत्र की खुशहाली के लिए किया जाता है. माना जाता है कि प्राचीन समय में बुरी आत्माओं को भगाने और सुख समृद्धि के मानव बलि दी जाती थी, लेकिन 15वीं सदी में रानी ने सती होने के दौरान नरबलि को बंद करवा दिया था. उन्हें नरबलि पसंद नहीं थी. उन्होंने खुंद वंश के कटेड़ू, तुनड़ू, दगोई, जगोठी को एक तरफ, जबकि दूसरी तरफ जमोगी खुंद को दो टोलियों में बांट दिया. इन दोनों टोलियों के बीच ही पत्थर का खेल होता है. खूंद वंश के अलावा अन्य लोग इस खेल में भाग नहीं लेते हैं. दूसरे लोगों के इस खेल में भाग लेने पर कोई मनाही नहीं है, लेकिन किसी भी तरह की चोट लगने की जिम्मेदारी उसकी अपनी होती है.’

खून निकलने पर रुक जाती है पत्थरबाजी

मेला देखने दूर दूर से आते हैं लोग

आज तक इस खेल में कोई बड़ी गंभीर चोट किसी को नहीं लगी. मेले को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं और पत्थरबाजी का आनंद लेते हैं. आज तक इस मेले में हिस्सा लेने वाले लोग पत्थर से चोट लगने की परवाह नहीं करते. इस पत्थर मेले में खून निकलने को लोग अपना सौभाग्य समझते हैं.

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