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कहानी नहीं हक़ीक़त है?

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शशिकांत गुप्ते

न 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म मधुमती में गीतकार शैलेन्द्र द्वारा लिखे इस गीत की पंक्तियों के स्मरण हुआ और मैं गुनगुनाने लग गया।
सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं
हमें डर है हम खो न जाएँ कहीं
वो आसमां झुक रहा है ज़मीं पर
ये मिलन हमने देखा यहीं पर
मेरी दुनिया, मेरे सपने, मिलेंगे शायद यहीं पर

गीत की उक्त पंक्तियां गुनगुना ही रहा था।उसी समय मेरे व्यंग्यकार मित्र का आगमन हुआ।
व्यंग्यकार मित्र ने गाने की पंक्तियां सुनकर मुझसे पूछा कभी देखा जमी और आसमां को मिलते हुए देखा है?यह दृष्टिभ्रम है।इसे क्षितिज (Horizon) कहतें हैं।
मित्र ने मुझसे कहा आप भी तो व्यंग्यकार हो।आप ने भी भावनाओं को सच समझ लिया।गीत की पंक्ति को ध्यान से पढ़ो क्या लिखा है।मेरी दुनिया मेरे सपने मिलेंगे शायद यहीँ पर।
यह कल्पना मात्र है।यह पंक्तियां गीतकार ने Situation अर्थात फ़िल्म की परिस्थिति के आधार पर लिखी गई है।
फिल्मों में लिखे गीतों में तो आसमाँ से चांद और तारे तोड़ कर लाने का वादा किया जाता है।
भावनाओं त्याग कर यथार्थ में झांक कर देखों।कुछ शहरों के रेल्वे स्टेशनों की चकाचौंध,हवाई यात्राओं की उड़ानों में हो रहे इज़ाफ़े,और विज्ञापनों में दर्शाए जाने वाले विकास को प्रगति मत समझों?
आमजन की हरएक समस्याओं को मिटाने का दावा करने वाले दाढ़ी वाले बाबाओं के विज्ञापन भी तो प्रतिदिन प्रकाशित, प्रसारित होतें रहतें है?क्या कभी इन बाबाओं से पूछा गया कि,इन बाबाओं के पास ऐसा चमत्कार है जो कोई भी किसी भी तरह की समस्या ही न पैदा होने दे?
इसीलिए विज्ञापनों में दर्शाई जाने वाली उपलब्धियां मृग मारीचिका है।आँखों के भ्रम को ही मृग मारीचिका कहतें है।
ठीक इसीतरह ही क्षितिज भी दृष्टि भ्रम ही तो है।
व्यंग्यकार के संवादों ने मेरे मानस को झकझोर दिया।मैं स्वप्न लोक से बाहर आ गया।
चकाचौंध को दरकिनार कर मुझे पुनः स्मरण हुआ कि,सन 2020 के वैश्विक भुखमरी के सूचकांक में अपना देश भारत 107 देशों में 94 नम्बर पर है?
इस खबर ने होश उड़ा दिए और समझ में आ गया की कल्पनातीत कहानी को सच मानने की भूल नहीं करना चाहिए।
यकायक मंदिरों के बाहर भीख मांगते भिखारियों की तादात का स्मरण हुआ।
मेहमानों से वास्तविकता छिपाने ने के लिए खंडहर पर कितने भी कीमती रंग रोगन का मुलम्मा चढ़ाओ,वह ज्यादा दिन टिकेगा नहीं।कुछ ही समय मे बनावटी ऊपरी परत भरभराकर गिरती ही है।
देश की गरीबी को दीवार से ढांकने सच्चाई छिप नहीं सकती है।
हक़ीक़त जानते ही गीत की इन पंक्तियों को गुनगुना ने मन करेगा।
ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
हक़ीक़त उन्हें दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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