12 साल बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री भारत आ रहे हैं। 2011 में हिना रब्बानी खार भारत आई थीं और अब SCO की बैठक में हिस्सा लेने के लिए आज बिलावल भुट्टो गोवा पहुंच रहे हैं।
बिलावल भुट्टो पाकिस्तान के विदेश मंत्री और भुट्टो परिवार के वारिस हैं। वही भुट्टो परिवार, जिसका भारत से 4 पीढ़ी पुराना नाता है। भुट्टो परिवार ने पाकिस्तान की सियासत में प्रमुख भूमिका निभाई है। 1967 में बनी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) का नेतृत्व इसी परिवार के पास रहा है। बिलावल इस परिवार की चौथी पीढ़ी हैं।
भास्कर एक्सप्लेनर में भुट्टो फैमिली की 4 पीढ़ियों की कहानी, उनका भारत को लेकर नजरिया और बिलावल भुट्टो के भारत दौरे के मायने जानेंगे…
परनाना शाहनवाज भुट्टोः जूनागढ़ के नवाब को पाकिस्तान में विलय का आइडिया दिया
शाहनवाज भुट्टो का इतिहास जूनागढ़ की रियासत से जुड़ा हुआ है। वो ब्रिटिश भारत के सिंध क्षेत्र (लरकाना) के बहुत बड़े जमींदार थे। इनके पास तकरीबन ढाई लाख एकड़ जमीन थी। सिंध का इलाका उस समय बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा था। बॉम्बे प्रेसिडेंसी बनवाने में भी शाहनवाज भुट्टो का बड़ा योगदान था।
भुट्टो ने 1931 में सिंध को बंबई प्रांत से अलग करने की मांग करते हुए सिंधी मुसलमानों के नेता के रूप में गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। 1935 में मांग मान ली गई। 1937 के प्रांतीय चुनावों में वो जिस पार्टी से चुनाव लड़े, उसका बाद में मुस्लिम लीग में विलय हो गया। इसी बीच वह एक मुस्लिम नेता के तौर पर स्थापित हो गए और साल 1947 आते-आते वह जूनागढ़ रियासत से जुड़ गए।
अपनी दूसरी पत्नी लाखीबाई और बच्चों के साथ शाहनवाज भुट्टो।
1947 के शुरुआती महीनों में शाहनवाज जूनागढ़ के नवाब मुहम्मद महाबत खान III के दीवान (प्रधानमंत्री) बन गए। 15 अगस्त 1947 को आजादी के बाद जूनागढ़ के नवाब महाबत खान ने पाकिस्तान में जाने का ऐलान कर दिया। कहा जाता है कि नवाब को पाकिस्तान में विलय का आइडिया शाहनवाज भुट्टो ने ही दिया था।
शाहनवाज अली भुट्टो।
हालांकि फिर जनमत संग्रह के बाद जूनागढ़ को भारत में मिला लिया गया। नवाब पाकिस्तान चले गए और शाहनवाज भुट्टो अपने जमींदारी वाले जिले लरकाना चले गए। उनके पास हजारों एकड़ जमीन थी जिसके दम पर वो उस प्रांत के सबसे धनी और प्रभावशाली इंसान बनते गए और राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गए।
उन्होंने चार शादियां कीं। इनमें से उनकी दूसरी पत्नी नाच मंडली में काम करने वाली लाखीबाई भी थीं। लाखीबाई धर्म से हिंदू थीं, जिन्होंने बाद में इस्लाम अपनाया और खुर्शीद बेगम कहलाने लगीं। इनकी तीन बेटियां और एक बेटे थे। इकलौते बेटे जुल्फिकार अली भुट्टो इनकी तीसरी संतान थे।
नाना जुल्फिकार अली भुट्टोः हम भारत से एक हजार साल तक जंग लड़ेंगे।
जुल्फिकार अली भुट्टो ब्रिटिश भारत में पले-बढ़े। 1942 के आसपास मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ने के दौरान ही वह भारत विभाजन की राजनीति करने वाले संगठनों के आंदोलनों में सक्रिय थे। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय भेजा गया।
लौट कर आए तो देश का बंटवारा हो चुका था। 1957 में देश लौटते ही जुल्फिकार संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल में सदस्य बने। वो लगातार राजनीति में सक्रिय रहे और भारत विरोधी गतिविधियों में भी लगे रहे। जुल्फिकार ने विदेश मंत्री रहते हुए 1965 में ऑपरेशन जिब्राल्टर चलवाया। इसमें जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी से प्रशिक्षित करके आतंकी भेजे गए थे जो बाद में पकड़े गए। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की शुरुआत यहीं से हुई।
इस युद्ध में सीजफायर का ऐलान हुआ और फिर 1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच ताशकंद में समझौता हुआ। अयूब खान के समझौते का जुल्फिकार अली ने पूरे दमखम से विरोध किया।
इस विरोध के बाद ही वह पाकिस्तान में और पॉपुलर हुए और 1967 में उन्होंने कुछ ऐसा कह दिया जिसकी आलोचना आज तक होती है। 1967 में एक रैली में बोलते हुए उन्होंने कहा, ’हम भारत से एक हजार साल तक जंग लड़ेंगे।’ दरअसल इस दौरान पाकिस्तान में राष्ट्रवाद की लहर थी और भारत विरोधी बात करते रहने पर सियासत आगे बढ़ाने का मौका मिलता था।
साल 1971 में बांग्लादेश बनने वाले दिन जुल्फिकार अली भुट्टो अमेरिका में संयुक्त राष्ट्र के एक कार्यक्रम में थे। उन्होंने वहां उन्होंने सीजफायर के समझौते के कागज को फाड़ कर विरोध जताया और बैठक से उठकर चले गए। उनका तेवर पाकिस्तान में खूब सराहा गया।
साल 1971 में संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रम में बोलते जुल्फिकार अली भुट्टो।
इसके ठीक बाद वो पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने और 1972 में भारत आए। तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के साथ शिमला समझौते पर साइन किया। यह समझौता कहता है कि कश्मीर का मसला दोनों देश आपस में बातचीत करके हल करेंगे।
उन्होंने हजार साल वाले बयान पर यहीं पलटी मार ली। फ्रांस के एक अखबार को इंटरव्यू देते वक्त उन्होंने कहा- हमारे उपमहाद्वीप में मुसलमानों का इतिहास एक हजार साल पुराना है और उनका बयान इस संदर्भ में था। लड़ने के संदर्भ में नहीं।
जुल्फिकार अपने बयानों से अक्सर पलटते रहते थे। शिमला में समझौता करके लौटते ही उन्होंने पाकिस्तान में सबसे पहले यही बयान दिया कि कश्मीर के मामले में पाकिस्तान ने अपनी नीति में कोई समझौता नहीं किया है।
शिमला समझौते के बाद इंदिरा गांधी से अभिवादन स्वीकार्य करते जुल्फिकार अली भुट्टो।
साल 1974 में दो बरस बाद ही जब भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया तो जुल्फिकार भुट्टो तब पाकिस्तान के पीएम थे। उन्होंने वहां इससे आहत होकर कहा कि अब ये इलाका असुरक्षित हो गया है और हम घास खा लेंगे, लेकिन परमाणु बम जरूर बनाएंगे।
कुछ ही सालों बाद पाकिस्तान की राजनीति में सेना का हस्तक्षेप बढ़ा और सेना प्रमुख जिया उल हक की तानाशाही के बीच 1979 में जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दे दी गई।
मां बेनजीर भुट्टो: कश्मीर के लोगों को मौत का डर नहीं है क्योंकि वे मुसलमान हैं
बिलावल भुट्टो की मां बेनजीर भुट्टो दो बार पाकिस्तान की प्रधानमंत्री रहीं और कश्मीर को लेकर हमेशा से मुखरता दिखाती रहीं। भारत को लेकर उनका रुख बहुत विरोध का तो नहीं रहा, लेकिन यह भी नही कह सकते कि उनके मन में भारत से प्रेम था।
वो कई सार्वजनिक मौकों पर कहती थीं कि उनके तीन आदर्श हैं, उनके पिता जुल्फिकार अली भुट्टो, फ्रांस की राष्ट्रवादी संत जॉन ऑफ ऑर्क और इंदिरा गांधी। पूरब की बेटी के नाम से जानी जाने वाली बेनजीर किसी भी मुस्लिम देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं।
बेनजीर भुट्टो
पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद बेनजीर भुट्टो ने भारत और खासकर कश्मीर के खिलाफ कई बयान दिए। साल 1990 में बेनजीर भुट्टो का कश्मीर के राज्यपाल को लेकर की गई टिप्पणी और हाथ का इशारा काफी चर्चित रहा है।
इस भाषण का उन्हें बहुत लाभ हुआ और वो दोबारा सरकार में आ गईं। चुनावी माहौल के बीच उन्होंने पाक अधिकृत कश्मीर में भाषण दिया। कहा, ‘कश्मीर के लोगों को मौत का डर नहीं है क्योंकि वे मुसलमान हैं। कश्मीरियों में मुजाहिदीन का खून है। कश्मीर के लोग वकार (इज्जत) के साथ जिंदगी जीते हैं, जल्दी ही हर गांव से एक ही आवाज निकलेगी- आजादी। हर स्कूल से एक ही आवाज निकलेगी- आजादी। हर बच्चा चिल्लाएगा- आजादी, आजादी, आजादी।
इसके बाद उन्होंने हाथ का जो इशारा किया वो कश्मीर में आतंकियों को उकसाने वाला था। उन्होंने तत्कालीन कश्मीरी गवर्नर जगमोहन मल्होत्रा को संबोधित करते हुए दाहिने हाथ की खुली हथेली से बाएं हाथ की मुट्ठी को टकराते हुए कहा ‘जग, जग, मो-मो, हन-हन’। यह सब कुछ इतना आक्रामक था कि 1990 में ये सब कुछ टीवी पर टेलिकास्ट होने से रोक दिया गया।
रावलपिंडी में अपनी आखिरी रैली को संबोधित करतीं बेनजीर भुट्टो।
साल 2007 में एक आत्मघाती बम धमाके में आतंकियों ने उनकी हत्या कर दी।
बिलावल भुट्टोः पीएम नरेंद्र मोदी को कहे थे अपशब्द
बिलावल भुट्टो साल 2007 से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेयरमैन हैं और फिलहाल पाकिस्तान के विदेश मंत्री हैं। साल 2012 में ऑक्सफोर्ड से बीए कर के लौटे बिलावल कुछ साल राजनीति में सक्रिय रहे। अगस्त 2018 के आम चुनावों में उनकी पार्टी पीपीपी ने 43 सीटें जीत लीं और बिलावल पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के सदस्य बने।
बिलावल भुट्टो।
इमरान खान के तख्तापलट के बाद बिलावल को अप्रैल 2022 में मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और वो पाकिस्तान के सबसे कम उम्र के विदेश मंत्री बने। इसके बाद उन्होंने लगातार बचकाने बयान देने शुरू कर दिए। बिलावल भुट्टो ने दिसंबर 2022 में पीएम मोदी पर टिप्पणी की थी।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने कहा था, “ओसामा बिन लादेन मर चुका है पर ‘बुचर ऑफ गुजरात’ जिंदा है और वो भारत का प्रधानमंत्री है। जब तक वो प्रधानमंत्री नहीं बना था तब तक उसके अमेरिका आने पर पाबंदी थी।” इसके बाद उनकी कड़ी आलोचना हुई और भारत ने इस पर कड़ा विरोध जताया।
आखिर में जानेंगे कि बिलावल भुट्टो के SCO बैठक में शामिल होने के क्या मायने हैं?
भारत इस समय शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन का अध्यक्ष है। इसी लिहाज से भारत ने सभी सदस्य देशों को आमंत्रण भेजा है। पाकिस्तान भी उन्हीं में से एक है। ऐसे में एक्सपर्ट्स और भारत के आधिकारिक बयान पर गौर करना चाहिए।
- यह कार्यक्रम किसी भी तरह से द्विपक्षीय जुड़ाव को लेकर नहीं है। दोनों देश बहुपक्षीय मंचों पर बातचीत करते रहे हैं और एससीओ के विदेश मंत्रियों की बैठक ऐसा ही एक अवसर है। भारत का आधिकारिक बयान
- इसे भारत का रुख नर्म हो जाने के लिहाज से नहीं देखा जाना चाहिए। भारत अपनी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता निभा रहा है। संबंधों से इतर इस सम्मेलन में पाकिस्तान को बुलाना भारत की प्रतिबद्धता है। स्वस्ति राव चंदेल (मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस में यूरोप एंड यूरेशिया सेंटर की एसोसिएट फेलो)
- पाकिस्तान में रक्षा मंत्री की बहुत नहीं चलती है। वहां बड़े फैसले सेनाध्यक्ष ही करता है। कई मामलों में पीएम से भी ज्यादा सेनाध्यक्ष की चलती है। ऐसे में बिलावल से बहुत उम्मीद नहीं लगानी चाहिए। भारत को कोई संवाद करना है तो पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष से करना चाहिए। सैन्य इतिहासकार मंदीप सिंह बाजवा

