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अंधे और लँगड़े की कहानी

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शशिकांत गुप्ते

प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में बाल भारती हिंदी की पुस्तक में एक कहानी है अंधे और लंगड़े मित्रों की। यह प्रेरक कहानी है।
कहानी में लिखा है। यह दोनों ही जन्म से ही विकलांग थे।
इस कहानी से प्रेरणा यह मिलती है कि,इन दोनों मित्रों में अपनी शारीरिक क्षमता का सदुपयोग बख़ूबी किया।
दोनों मित्रों को एक ही स्थान पर जाना था। लगंडे को अंधे मित्र ने अपने कांधे पर बैठाया और दोनों ही गंतव्य स्थान पर सुरक्षित पहुँच गए।
यह तो कहानी की बात हुई।फिल्मों और नाटकों में सर्वांग सम्पन्न पुरुष या स्त्री विकलांग होने का अभिनय करतें हैं।
वह भी बाकायदा तय पारिश्रम प्राप्त कर अभिनय करतें हैं। विकलांग होने का अभिनय, मनोरंजन के लिए करना विकलांगता का मज़ाक उडाने जैसा ही तो है। फिर भी यह क्षम्य समझा जा सकता है। कारण अभिनय करने वाला और दर्शक दोनों ही जानतें है कि यह सिर्फ अभिनय ही है।
यह हुई कहानी और अभिनय की बातें।
हक़ीक़त में झाँककर देखने पर पता चलता है। बहुत से लोग आँखें होते हुए भी दृष्टिहीन हो जातें हैं। ऐसे लोगों को कहा जाता है।आँखों से अंधे लेकिन नाम नयनसुख। इनलोगों को आमजन की बुनियादी समस्याएं दिखाई ही नहीं देती है।
बहुत से लोग पाँव से नहीं जेहन से विकलांग होतें हैं। ये लोग व्यक्तिपूजक होतें है। जिस व्यक्ति की पूजा में ये लोग मग्न जातें है उसे ही भगवान समझने लगतें हैं। इनलोगों की अंधश्रध्दा का वह व्यक्ति भरपूर लाभ उठाता है। स्वाभाविक बात है, यदि किसी व्यक्ति को महिमामण्डित किया जाएगा तो वह व्यक्ति अपने ऊपर अवलंबित लोगों पर हर तरह से अपना वर्चस्व कायम करता ही है। ऐसे व्यक्ति पर अवलंबित लोग अपनी सोचने समझने की क्षमता खो देतें हैं।
यदि कोई जन्मस्थ मूक है तो वह क्षम्य है। लेकिन जिनको कुदरत ने वाणी दी हैं फिर भी उन लोगों की आवाज ही बंद है। ऐसे लोगों को स्वयंभू विकलांग मानना चाहिए।
बहुत से धूर्त लोग वाणी की स्वतंत्रता का बेजा फायदा उठाते हुए हिंसक भाषा का खुलेआम उपयोग करतें हैं।
बहुत से लोग बधिरता के शिकार हो जातें हैं। इनलोगों को बनावटी सामाचारों का कोलाहल, साम्प्रदायिक वैमनस्यता का शोर तो बखूबी सुनाई देता है। लेकिन बेरोजगरों की आवाज, महंगाई से त्रस्त जनता की रुआंसी इनलोगों को कभी भी सुनाई ही नहीं देती है।
ऐसे सर्वांग सम्पन्न लोग कबतक मानसिक रूप से विकलांग रहेंगे यह बहुत ही गम्भीर और अहम प्रश्न है?
इनदिनों प्रश्न पूछना तो दूर प्रश्न उपस्थित करना भी असिष्णुता की परिभाषा में आता है?
क्या कभी पाठ्य पुस्तक में वर्णित अंधे और लँगड़े की कहानी हक़ीक़त में बदलेगी?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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