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कहानी : क्या वह डायन थी?

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(मेरे साधनाकालीन जीवन का अनुभूत यथार्थ)

           ~ डॉ. विकास मानव

   _सन्  1990, जनवरी का महीना। सुबह के छः बजे का समय। हाबड़ा स्टेशन, हिमगिरि एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर खड़ी थी। उसके छूटने का समय हो गया था।_

      मेरे मारबाड़ी मित्र मंटूराम के अनुरोध पर मैं कलकत्ता आया था। एक सप्ताह बाद लौट रहा था उस दिन। जब मैं मंटूराम जी से प्लेटफॉर्म खड़े होकर बातें कर रहा था, उसी समय मेरी नज़र एक औरत पर पड़ी। एकबारगी चौंक पड़ा मैं।

      औरत मुझे जानी-पहचानी-सी लगी। मगर उसे पहली बार कहाँ और कब देखा था–यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था।

      औरत की उम्र 50 से अधिक ही थी। मगर देखने में वह 35-40 साल से ज्यादा की नहीं लगती थी। बाल अभी भी घने और काले थे। चेहरे पर चमक थी। शरीर गठा हुआ था। गोरे रंग और मांसल देह पर क्रीम कलर की साड़ी आकर्षक लग रही थी।

      कीमती कश्मीरी शॉल भी ओढ़े हुए थी। हाथ में एक चमड़े की अटैची भी थी। बुक स्टॉल पर खड़ी किसी पत्रिका के पन्ने उलट-पलट रही थी और उसी बीच कभी-कभी उचटती हुई नज़रों से वह ट्रेन की ओर देख लिया करती थी। शायद हिमगिरि से ही वह भी यात्रा करने वाली थी–ऐसा लगा मुझे।

      संयोग ही कहा जायेगा इसे। मेरे सामने वाली सीट उसी की थी। जब अपने कंपार्टमेंट में घुसा तो देखा–वह अपनी सीट पर बैठी अख़बार पढ़ रही थी और जब गाड़ी चली तो उसने अख़बार से नज़रें हटा कर मेरी ओर देखा और फिर शॉल को ठीक करती हुई मुस्कराकर बोली–आपने मुझे पहचाना ?

       पहचाना तो अवश्य, मगर कब और कहाँ देखा आपको–यह समझ में नहीं आया अभी।–मैंने भी मुस्कराकर जवाब दिया।

       मेरी बात सुनकर एकबारगी खिलखिला कर हंस पड़ी और फिर फैले हुए अख़बार को समेटते हुए बोली–मैं वही डायन हूँ जिसे गांव वालों ने मार-मार कर अधमरा कर दिया था और गांव से बाहर कर दिया था।

      मस्तिष्क में एकाएक कुछ कौंध-सा गया और कुछ साल पहले की सारी घटनाएं एक-एक करके चलचित्र की तरह उभर आई मेरे मानस पटल पर।

       क्या तुम पाखी हो ?

       हाँ, मैं पाखी ही हूँ–आसाम की पाखी जिस पर आपने दया की थी और जिसने उस दया के बदले भविष्यवाणी भी की थी। फिर थोडा रूककर पाखी आगे बोली–क्या वह भविष्यवाणी सत्य हुई जो मैंने आपके लिए की थी ?

       हाँ, बिलकुल सत्य हुईं तुम्हारी की हुई भविष्यवाणियां। मगर एक अभी बाक़ी है।

      कौन-सी ?

       मौत की भविष्यवाणी।

       पाखी पहले हंसी फिर गम्भीर हो गयी। बोली–वह भी घट जायेगी। समय तो आने दीजिये।

       तूफान की गति की तरह हिमगिरि एक्सप्रेस की गति थोड़ी कम हुई। शायद आसमसोल आने वाला था। 25 वर्ष पहले भी पाखी मेरे लिए रहस्य थी और आज भी रहस्य है। पहली बार जिस रूप में उसे देखा था उसमें और आज के रूप और वेशभूषा में ज़मीन-आसमान का फर्क था।

     इतने लम्बे अरसे में इतना भारी परिवर्तन कैसे हो गया पाखी के व्यक्तित्व, वेष-भूषा और उसके जीवन में ? 

       शायद मेरे मनोभाव को समझ गयी पाखी। बोली- O5 वर्ष के बाद मिले हैं हम लोग। मेरे रूप में, मेरे व्यक्तित्व में और मेरी वेष-भूषा में परिवर्तन देखकर अवश्य आपको आश्चर्य हुआ होगा ? आप सोचते होंगे कि यह सब कैसे हो गया ?

        हाँ, यही सोच रहा हूँ और यह भी सोच रहा हूँ कि एक जादूगरनी के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। फिर बात बदल कर पूछा–कहांतक जाना है तुम्हें ?

       पठानकोट।

       वहीँ रहती हो क्या ?

       नहीं, पठानकोट से चम्बा जाना है मुझे। वहां थोड़े दिन रूककर लद्दाख चली जाउंगी। वहां एक लामा तांत्रिक हैं, बड़े ही सिद्ध पुरुष हैं। वे मुझे अपने साथ तिब्बत ले जाने वाले हैं।

        पांच साल के बड़े अन्तराल के बाद भी पाखी को भुला न सका मैं। भुला भी कैसे सकता था उस भयंकर जादूगरनी को

      गर्मियों के दिन थे। काफी तेज धूप थी। पुरातत्व विभाग की और से मैं अपने सहायक के साथ डिब्रुरुगढ़ से शिलांग जा रहा था। जीप महेंद्र चला रहा था। मैं उसके करीब बैठा बड़े इत्मीनान से बर्मी सिगार पी रहा था। लगातार तीन घंटे की यात्रा करने के पश्चात् हम लोग घने जंगलों को पार कर सुनसान घाटियों में पहुँच गए थे।

       लगभग चार-पांच मील चलने के बाद सामने कुछ झोपड़े दिखलायी दिए। महेंद्र बोला–कोई गांव है शायद। चलो, थोडा आराम कर आगे चला जायेगा। महेंद्र के इस विचार से सहमत हो गया मैं। मगर गांव के भीतर घुसते ही हम लोगों ने एक अद्भुत दृश्य देखा।

       उस प्रचण्ड धूप में एक युवती जिसकी उम्र 25 के लगभग होगी, बहुत ही कष्ट के साथ गांव के धूलभरे रास्ते पर चल रही थी। रंग गोरा था। देह से लिपटी हुई मैली-कुचैली साड़ी चिथड़े-चिथड़े हो गयी थी जिनमें से अंग-प्रत्यंग झांक रहा था।

      सिर खुला हुआ था। धूल से सने हुए बिखरे बाल और पीछे की ओर दोनों हाथ रस्सियों से बंधे हुए थे। उसका फटा हुआ आँचल बार-बार छाती से गिर-गिर पड़ता था। हाथ बंधे रहने के कारण बहुत कष्ट से वह अपने गिरे हुए आँचल को संभाल पाती थी। चेहरा बुझा अवश्य था, मगर आँखों में तेज था जिसने मुझे आकर्षित कर लिया।

     उसकी आँखों में यातना के भाव थे। वेदना पूर्ण दृष्टि से अपने चारों ओर के लोगों को देखती और फिर लम्बी साँस लेने लगती। उसके साथ लगभग 40-50 आदमियों की भीड़ भी चल रही थी। दरवेश की शक्ल में एक व्यक्ति नाचता-कूदता उस भीड़ का नेतृत्व कर रहा था।

      भीड़ जब बिलकुल करीब आ गयी, तो महेंद्र ने जीप को एक तरफ कर लिया और गति भी काफी कम कर दी। मगर थोडा आगे बढ़ने पर जीप खड़ी कर देनी पड़ी। 

       भीड़ में जो लोग उस स्त्री के करीब थे, वे लगभग नंगे ही थे। लंगोटी के आलावा उनके शरीर पर अन्य कोई वस्त्र नहीं था। वे अत्यन्त उत्साह के साथ ढोलक बजा रहे थे, नाच-कूद रहे थे। जब भीड़ के साथ वह स्त्री मेरे करीब से गुजरी तो देखा–उसकी हालात उस समय काफी दयनीय थी। पूरा शरीर गर्द से अटा हुआ था।

       वह जैसे अपने बंधे हुए हाथों का भार संभाल नहीं पा रही थी। उसकी दशा देखकर मेरा चित्त खिन्न हो गया। उस गांव में विश्राम करने का विचार त्याग दिया मैंने।

        मेरे साथ एक सहायक भी था जिसका नाम था–फूल सिंह। वह डिब्रूगढ़ का रहने वाला था। महेंद्र ने जब उससे यह पूछा–भाई क्या तमाशा है ? तो उसने बतलाया कि यह औरत डायन है।

     कब्र में दफनाए गए बच्चों की लाशों को निकालकर उन्हें खाती है। गांव वालों का कोई अनिष्ट न कर जाये–इसी ख़याल से इसे इस प्रकार गांव के बाहर निकाला जा रहा है। इसके पहले इस अंचल में डायनों को जो सज़ा दी गयी है, उसे देखते हुए यह सज़ा काफी कम है।

      फूलसिंह की बात विश्वसनीय थी। कुछ वर्ष पहले अख़बारों में इसी जिले का एक विवरण प्रकाशित हुआ था जिसमें ग्राम वासियों ने एक स्त्री को डायन समझकर जिन्दा ही आग में जला दिया था। वह विवरण काफी लोमहर्षक था।

     भीड़ जब रास्ते से हट गई तो महेंद्र ने गाड़ी स्टार्ट की। लगभग एक मील जाने के बाद एक पहाड़ी नदी मिली जिसकी चौड़ाई तो कम थी मगर जिसका प्रवाह काफी तेज था। महेंद्र गाड़ी रोकते हुए बोला–अब ! अब क्या होगा ?

      फूल सिंह ने बतलाया कि नदी पार करने के लिए 7-8 मील का चक्कर लगाना लड़ेगा। आगे का रास्ता भी जंगली है। फिर नदी पारकर रात के वक़्त जायेंगे कहाँ ? यहाँ से करीब 15-20 मील तक न कोई गांव है और न ही ठहरने की कोई जगह।

     थोडा रूककर फूलसिंह बोला–साब ! यहाँ एक डाक बँगला है। क्यों न हम सब आज की रात वहां ठहरें ?

      करीब एक फर्लांग पर नदी के किनारे ही डाक बँगला था। कभी किसी समय अंग्रेजों ने बनबाया था अपने लिए। काफी पुराना था। उसकी दशा दयनीय थी उस समय। तीन-चार कमरे अवश्य थे मगर उनकी हालत शोचनीय ही थी।

     खैर, फूलसिंह ने एक कमरे को साफ किया, हम  लोगों का बिस्तर लगाया और फिर खाना बनाने में जुट गया।

      दिन ढल चुका था। ठण्डी हवा बहने लगी थी। मैं और महेंद्र दोनों काफी थक गए थे। थोड़ी देर बाद हम लोग नदी में नहाये और फिर खाना खाकर अपने अपने विस्तर पर लेट गए।

    घड़ी की ओर देखा–  8.35. मगर रात काफी हो गयी थी। चारों ओर गहरा सन्नाटा छा गया था। महेंद्र तो विस्तर पर लेटते ही सो गया था। लेकिन मुझे नींद न जाने क्यों नहीं आ रही थी। मैं उसी स्त्री के बारे में सोच रहा था। उसकी झील जैसी गहरी, तेजपूर्ण और रहस्यपूर्ण आँखें बार-बार मेरे सामने थिरक उठती थीं।

      उसी समय सहसा अँधेरे में न जाने कैसी आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ ढलान की ओर से आई थी जहाँ फूलसिंह ने खाना पकाया था। मैंने उठकर टॉर्च जलाई और उधर रौशनी डाली। विस्मय, कौतूहल और आश्चर्य के मिले-जुले भाव से भर गया मन। जिस औरत के बारे में अभी सोच रहा था, वही बैठी हुई थी दालान में सिमिटी-सुकड़ी सी।

       टॉर्च की रौशनी ने जैसे उसे अभिभूत कर दिया। भागने की चेष्टा उसने नहीं की। विस्मित सी अपने स्थान पर बैठी रही। जब मैं उसके पास गया, तो देखा वह हम सब लोगों की थाली में जूठन बची थी, उसे इकठ्ठा कर खाने वाली थी।

     मगर मुझे देखकर उठकर खड़ी हो गयी और डर से कांपने लगी। उस समय उस स्त्री की हालत और दयनीय लगी मुझे। देखा–बदन पर काफी चोटें लगी हुई थीं। सिर भी कई जगह से फट गया था जिससे खून बहकर बालों से चिपक कर सूख चुका था। चेहरा भी काफी सूजा हुआ था।

       मैं और करीब जाकर बोला–घबराओ नहीं, हम लोग तुम्हें किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। तुमको भूख लगी है न ? चलो, आओ मेरे साथ। खाना भीतर रखा है, लेकर खा लो।

       वह पहले हिचकिचाई, सहमी मगर चारों ओर देखकर मेरे पीछे चली आई भीतर कमरे में। इस बीच फूलसिंह भी उठ गया था। उसने जब उस स्त्री को देखा तो घृणा से मुंह फेर लिया, फिर उसने कहा–साब ! आप तो जानते हैं कि यह औरत डायन है, भयंकर जादूगरनी है, गांव से निकाली गयी है।

     इसे खाना मत खिलाइए, वर्ना किसी मुसीबत में पड़ जायेंगे आप।

      मैने फूलसिंह की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। जब वह स्त्री खाना खा चुकी, तो मैंने उससे कई प्रश्न पूछे। उसका नाम सोना पाखी था, रहने वाली आसाम की थी।

    एक महीने पहले उस गांव में रहने के विचार से आई थी वह। डायन समझकर उसकी जो दुर्गति की गयी थी, जो यातना दी गयी थी और गांव से बाहर निकाला गया था, वे सारी बातें सच थीं।

       अन्त में बड़े कातर स्वर में बोली पाखी–बहुत मारा है, बहुत यातना दी है उन लोगों ने। हाड़-हाड़ दुःख रहा है। चार-पांच दिनों से भूखी-प्यासी थी। रोटी का एक टुकड़ा भी किसी नहीं दिया खाने को।

      बातचीत के सिलसिले में मैंने पाखी की आँखों में अद्भुत विशिष्टता देखी। किसी तरुणी की आँखों में जो चमक और मधुरता रहती है, उससे जरा भी कम उस युवती की आँखों में न थी। यह मैंने प्रकृति की विलक्षण बात समझी।

       पाखी डायन है या नहीं है–इस बारे में मैं कोई निर्णय न कर सका। लेकिन उसकी आँखों से निकलती हुई विलक्षण ज्योति को देखकर मैं भीतर ही भीतर एकबारगी कांप गया।

     क्या मैं तुमसे एक बात पूछ सकता हूँ ?–मैंने कहा।

      पूछिए–पाखी ने जवाब दिया।

       क्या तुम सचमुच में डायन हो, तुम्हें लोग जादूगरनी कहते हैं, क्या यह बात सच है ?

      मेरी बात सुनकर पाखी की रहस्मयी ऑंखें दप से जल उठीं। चेहरा भी थोडा हो गया कठोर उसका और उसी के साथ एक अमानवीय भाव उभर आया वहां।

      सहम गया मैं। तभी महेंद्र भी उठकर चला आया वहां। मुझे पाखी से बातें करते देखकर आश्चर्य हुआ उसे। मगर बोला कुछ नहीं।

     थोड़ी देर शून्य में निहारने के बाद पाखी बोली–हाँ साब! मैं डायन हूँ, जादूगरनी भी हूँ मगर पहले थी नहीं, बनायी गयी हूँ। फिर उसने एक लम्बी साँस ली।

      मतलब समझ में नहीं आया, पाखी ! जरा साफ साफ बताओ। पाखी इस बार हंस पड़ी। फिर बोली–क्या करेंगे कहानी सुनकर मेरी। बड़ी ही दर्दभरी जिंदगी है मेरी। कहानी भी उतनी ही दर्दभरी है। फिर सिसकने लगी वह। समझते देर न लगी। निश्चय ही कोई रहस्यमयी मगर दुखभरी जिंदगी जी रही थी पाखी। आगे कुरेदना उचित नहीं समझा मैंने। मौन साध गया मैं। मगर रहा न गया। बोला–आज रात यहीं आराम करो पाखी, कल बातें होंगीं।

      आराम तो करूँ पर गांव वालों को मालूम हो गया  कि मैंने रात को  यहाँ खाना खाया था तो शायद वे लोग और दुर्गति करेंगे मेरी। हो सकता है कि मार ही डालें जान से इसबार मुझे।

       नहीं, अब तुमको कोई मारेगा-वारेगा नहीं। कोई भी दुर्गति नहीं करेगा तुम्हारी। मैं देख लूंगा। तुम आराम करो।

       पाखी ने मेरे यहाँ खाना खाया और रात में रही भी। जब यह समाचार गांव वालों को पता चला तो सचमुच काफी हंगामा किया लोगों ने। लेकिन जब यह मालूम हुआ कि हम पैरासाइकालोजी रिसर्चर हैं तो शान्त हो गए सब.

दूसरे दिन मैं शिलांग पहुंचा। पाखी को भी साथ ले लिया था। वहां उसका इलाज कराया मैंने। दो-तीन दिनों में पूर्ण स्वस्थ हो गयी वह। पहनने के लिए कुछ साड़ियां भी खरीदकर दे दी मैंने। पाखी प्रसन्न हो गयी।

      मुर्झाया, उदास चेहरा खिल उठा गुलाब के फूल की तरह। महेंद्र ने पूछा–एक डायन के लिए इतना सब क्यों कर रहे हो मानव तुम ? क्या लाभ है तुम्हें ?

       यह बात मेरी भी समझ नहीं आ रही महेंद्र कि मैं क्यों इसकी इतनी मदद कर रहा हूँ।  क्या फायदा मुझे ? कौन- सा स्वार्थ है मेरा ?

       कभी-कभी अकेले में भी सोचता हूँ कि मेरे मन में पाखी के लिए इतनी दया, इतनी सहानुभूति क्यों है ? कौन-सा अदृश्य आकर्षण है उसमें जिसके वशीभूत होकर मेरी आत्मा इतनी स्नेहिल हो उठी है उस अनजानी तरुणी के प्रति।

       शोधकार्य वश मुझे शिलांग में लगभग एक महीने ठहरना पड़ा।  इस बीच दो-एक ऐसी अद्भुत और अविश्वसनीय घटनाएं घटीं जिससे भयभीत हो उठा मेरा मन और पाखी के प्रति सतर्क हो गया मैं। वह डायन है, वह जादूगरनी–इसमें जरा-सा भी सन्देह नहीं रह गया मेरे मन में।

       मेरे कैम्प से थोड़ी ही दूर पर बड़ा भारी कब्रिस्तान था जिसके चारों ओर घने पेड़ लगे हुए थे। 3-4 दिनों से लगातार पानी बरस रहा था। महेंद्र फूलसिंह को लेकर सरकारी काम से डिब्रूगढ़ गया हुआ था। मैं अकेला था। मौसम ख़राब होने के कारण उस दिन जल्दी ही खाना खाकर लेट गया मैं विस्तर पर। बहुत ही जल्द नींद आ गयी मुझे।

      रात का न जाने कौन-सा वक्त था जब अचानक गहरी नींद से जाग उठा मैं। कैम्प में गहरी ख़ामोशी छाई हुई थी और जागने पर उस गहरी ख़ामोशी में मुझे एक अजीब-सी अनुभूति हुई। कैम्प के दूसरी ओर खाट पर पाखी भी सोई हुई थी।

      उसे आवाज देकर पुकारा। मगर वह न तो बोली और न तो उठी ही। मैंने टॉर्च जलाई और रौशनी में देखा कि पाखी वहां नहीं है। आश्चर्य हुआ मुझे। इतनी रात को कहाँ गयी वह ?

     न जाने किस प्रेरणा से हाथ में टॉर्च लिए कैम्प के बाहर निकल आया मैं। बादल छाये हुए थे। हलकी बारिश होने लग गयी थी उस समय। चारों ओर सांय-सांय हो रहा थी। कुछ देर तक खड़ा रहा मैं। अचानक कई लोगों के खिलखिला कर हंसने की आवाजें आयीं। सतर्क हो गया मैं।

      आवाज़ कब्रिस्तान की ओर से आई थी। धीरे-धीरे चल कर जब कब्रिस्तान के करीब पहुंचा मैं तो वहां का दृश्य देखकर एकबारगी स्तब्ध रह गया मैं शरीर का सारा खून जम गया जैसे बर्फ की तरह। रोमांचित हो उठा मैं। भय और आतंक से भर गया मन।

       _कब्रिस्तान की एक पक्की कब्र पर पाखी बैठी हुई थी और उसके चारों ओर कई नर-कंकाल। वे नर-कंकाल बिलकुल जीवित व्यक्तियों  की तरह हरकतें कर रहे थे। कभी-कभी ताली पीट-पीट कर नाचते-कूदते थे, तो कभी झूम-झूम कर गाते और हँसते थे। कभी-कभी बीच-बीच में पाखी भी उन सबके किसी भाव पर खिलखिलाकर हंस पड़ती थी।_

      भय और आतंक से मेरा बुरा हाल हो रहा था। अधिक देर तक देखा न गया मुझसे वह भयानक दृश्य। दौड़कर कैम्प में वापस आया और हांफते हुए विस्तर पर गिर गया।

      पाखी कब लौट कर आई –पता न चला। रात को जो कुछ देखा था, मैंने न महेंद्र से कहा और न पाखी से ही कुछ पूछा। एक दिन पाखी ने मेरे जीवन के भूतकाल से सम्बंधित बहुत सारी बातें बतलायीं जो अक्षरशः सत्य थीं। इसीलिए उसने मेरे लिए कुछ भविष्यवाणियां भी कीं। यहाँतक कि मेंरे मृत्यु का वर्ष, महीना और तिथि भी बतला दी उसने। इससे मैं प्रभावित अवश्य हुआ। दिलचस्पी भी ज्यादा हो गयी पाखी के प्रति। लेकिन फिर भी भय और आतंक के भाव में कमी नहीं आई।

       एक दिन शाम को पाखी ‘डबल हार्स ह्विस्की’ की बोतल लेकर आई। चीख पड़ा मैं। इतनी कीमती अंग्रेजी शराब की बोतल कहाँ से मिली पाखी को ? शिलॉंग में केवल एक दुकान थी अंग्रेजी शराब की, वह भी मामूली-सी जहाँ इतनी कीमती शराब का मिलना बिलकुल असम्भव था। जब इस बारे में पूछा तो पाखी सिर्फ मुस्कराकर रह गयी। बड़ी ही रहस्यमयी मुस्कराहट थी वह। समझ में नहीं आया कुछ। बोतल और दो गिलास रखकर सामने बैठ गयी पाखी।

    फिर हंस कर बोली–साब ! बुरा मत मानियेगा, कभी कदा पी लेती हूँ। आज मन कर गया। सोचा–आज आपके साथ बैठकर पियूँगी। इतना कहकर दोनों गिलासों में उसने शराब डाली। एक मुझे थमा दिया और दूसरा खुद अपने लिए ले लिया।

       शिलांग में तो यह मिलती नहीं, फिर कहाँ से लायी तुम ?–मैंने गिलास पकड़ते हुए पूछा।

       कहीं मिलती तो है न। जहाँ मिलती है, वहीँ से लायी हूँ–पाखी ने हंसकर जवाब दिया और एक ही साँस में गट-गट कर पी गयी पूरी मदिरा। थोडा रुककर दूसरा गिलास भरा उसने और उसे भी पी गयी वह उसी तरह। मैं भौंचक्का-सा देखता रहा। शराब तेज थी। ऑंखें लाल हो उठीं। चेहरा भी हल्का गुलाबी हो उठा उसका। मेरी भी हालत विचित्र थी। चित्त अवश हो रहा था।

      बाद में ऐसा लगने लगा कि किसी भी क्षण चेतनाशून्य हो जाऊँगा मैं। हुआ भी ऐसा ही। न जाने कब और किस क्षण गिर पड़ा विस्तर पर–ख़याल ही नहीं रहा मुझे। ‘डबल हार्स’ शराब कई बार पी थी पर ऐसा हाल कभी नहीं हुआ था मेरा। आखिर बात क्या थी ?–समझ में नहीं आई।

       उस स्थिति में मैंने अपने आपको एक अद्भुत वातावरण में पाया। सबसे पहले मुझे एक गांव दिखलाई दिया। बंगाल और आसाम के सीमान्त प्रदेश का था वह कोई गांव। 15-20 झोपड़े, केलों के कई बाग़, गांव से थोड़ी दूर पर बहती हुई कोई पहाड़ी नदी जिसकी चौड़ाई तो कम थी मगर धारा तेज थी। एक पक्का घाट था जहाँ मछली मारने वाली कई नावें बन्धी हुई थीं।

    घाट से हट कर जामुन और आंवले के 3-4 पेड़ थे। मैंने देखा उन्हीं पेड़ों के झुरमुट में गुमसुम एक युवक बैठा था–सुन्दर-सा, भोला-सा। उम्र यही रही होगी कोई 20-22 साल के आस-पास।

     गोरा रंग, सुगठित देह, लम्बा कद, घने घुँघराले बाल, -बड़ी-बड़ी ऑंखें–सब मिलाकर अत्यधिक आकर्षक व्यक्तित्व था उस युवक का। चूड़ीदार पायजामा और सिल्क का कुर्ता पहने था वह। सिर उठा कर सामने की ओर देख लिया करता था वह। उसके चेहरे के भाव और आँखों की भाषा से ऐसा लगता था कि वह युवक किसी का बेसब्री से इंतज़ार कर

रहा हो।

   अनुमान सत्य था। वह सचमुच ही इंतज़ार कर रहा था और वह जिसका इंतज़ार कर रहा था, वह थी एक किशोरी लड़की।

      साँझ की स्याह कालिमा फ़ैल चुकी थी। चारों तरफ वातावरण में गहरी नीरवता छा हुई थी। नदी की ओर से झाड़ियों के दर्दभरे गीतों के करुण स्वर आकर हवा की लहरियों में तैर रहे थे। कुछ गीतों को सुनकर चिन्तित हो उठता था वह युवक। अचानक उसके चेहरे पर एक चमक थिरक उठी। अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया वह और थोडा आगे बढ़ आया।

        मैंने देखा कि एक लड़की जिसकी उम्र 14-15 से अधिक नहीं होगी, जल्दी-जल्दी चलकर उस युवक के पास पहुंची। लड़की भी काफी सुन्दर और आकर्षक थी। उसके गोरे रंग पर और सुडौल देह पर चम्पई रंग का कुर्ता और धानी रंग का पायजामा बड़ा अच्छा लग रहा था। पीठ पर बालों की दो चोटियाँ लहरा रही थीं। वह हांफ रही थी।

      शायद बहुत दूर से चलकर आई थी। करीब पहुंचकर युवक ने दोनों हाथों को फैला कर उस किशोरी को अपने आगोश में ले लिया। लड़की काफी देर तक युवक के सीने से लगी रही और जब अलग हुई तो एकबारगी चौंक पड़ा मैं।

     पहचानने में देर न लगी मुझे। वह लड़की और कोई नहीं, पाखी थी–अक्षतयौवना पाखी। दूसरे क्षण उसका स्वर सुनाई पड़ा मुझे। वह कह रही थी–गिरिजेश ! कल वह तांत्रिक फिर आया था।

       क्या कहता था वह ?–युवक ने पाखी के बालों को सहलाते हुए पूछा।

        बस, वही पुरानी बात। उसे रुपये चाहिए या उसके बदले में मेरा हाथ। थोडा रूककर पाखी आगे कहने लगी–मैं जानती हूँ कि माँ कभी भी उसका रूपया वापस नहीं कर पाएंगीं। और किसी दिन वह कुटिल तांत्रिक मुझे जबरदस्ती ले जायेगा अपने साथ। मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि वह मुझे अपनी भैरवी बनाना चाहता है।

      भैरवी बना कर अपनी साधना की पूर्ति के साथ-ही-साथ अपनी वासना की भी पूर्ति करना चाहता है वह नराधम।

     अन्तिम शब्दों के साथ पाखी का गला भर आया। सिसकते हुए आगे बोली वह–क्या तुम यह चाहते हो कि मेरा यह शरीर उसकी अदम्य वासना की पूर्ति का साधन बने ? बोलो गिरिजेश, कुछ तो बोलो ! कुछ तो जवाब दो ! निर्विकार भाव से सब कुछ सुनने के बाद गिरिजेश पाखी का हाथ थाम कर बोला–नहीं, पाखी नहीं, तुमको उस पापी के चंगुल में कभी भी नहीं पड़ने दूंगा। घबराओ नहीं। मैं शीघ्र ही रुपयों का इन्तजाम कर कुछ करता हूँ। माँ से कह देना और यह भी कह देना कि अब किसी तरह की चिंता करने की जरुरत नहीं है।

       इसके बाद गिरिजेश और पाखी में जो बातें हुईं उससे मुझे यह समझते देर न लगी कि वे दोनों बचपन के साथी थे। दोनों का अगाध प्रेम था एक दूसरे के लिए। शीघ्र ही विवाह-बन्धन में बन्ध जाना चाहतीं थीं दोनों की आत्माएं। मगर मार्ग में  सबसे बड़ा विघ्न था–वह तांत्रिक भोलानंद गिरि।

        पाखी के पिता महेश्वर राय चौधरी से उसकी मित्रता थी। एकबार उनकी बीमारी में पांच सौ रूपये देकर भोलानंद गिरि ने सहायता की थी। इस उपकार के कारण वह महेश्वर राय चौधरी के परिवार का एक घनिष्ठ सदस्य बन गया। जब चौधरी साहब की मृत्यु हुई तो भोलानंद गिरि ने मौके का फायदा उठा कर पाखी की माँ शोभा से शारीरिक सम्बन्ध बनाना चाहा।

      मगर वह साध्वी स्त्री इसके लिए तैयार न हुई। तभी उसकी गंदी दृष्टि पाखी पर पड़ी। उस समय उसकी उम्र 13-14 वर्ष के करीब होगी। पाखी किशोरावस्था में प्रवेश कर रही थी। उसके यौवन की कलिका खिल रही थी जिसका रसपान करने के लिए आकुल हो उठी उस कृतघ्न तांत्रिक की कलुषित आत्मा।

       वह जानता था कि पाखी कभी भी अपने आप को उसे सौंपने के लिए तैयार न होगी। ज़ोर-जबरदस्ती नहीं करना चाहता था वह पाखी के साथ। इसलिए वह अपने रुपयों की बराबर मांग करने लगा। जानता था वह परिस्थिति ऐसी है कि शोभा रुपये कभी भी वापस न कर सकेगी।

      एक दिन अवसर देखकर भोलानंद गिरि बड़ी ही आत्मीयता से शोभा से बोला–यदि रूपये लौटाने की स्थिति न हो तो कोई बात नहीं, पाखी है न ! उसको ही मुझे दे दो। यदि चाहो तो और रुपये दे दूंगा। पाखी बड़ी हो रही है। शादी-वादी का झंझट भी तुम्हें नहीं उठानी पड़ेगी। उसे दीक्षा देकर भैरवी बना लूंगा। उसका लोक-परलोक दोनों बन जायेगा। मेरे बाद मेरे मठ-आश्रम और मेरी ज़मीन-जायदात की वही मालकिन होगी। बोलो तैयार हो ? 

      भोलानंद गिरि की बात सुनकर शोभा एकबारगी तिलमिला उठी। ज़हर का घूंट पीकर रह गयी। बोला न गया उससे कुछ। धीरे से उठी और कमरे के भीतर चली गयी वह। भोलानंद गिरि थोड़ी देर खड़ा रहा,  फिर पैर पटकते हुए वह भी चला गया।

         पूरी रात पति के चित्र को सामने रखकर रोती रही शोभा। पाखी को जब ये सारी बातें मालूम हुईं तो क्रोध और आक्रोश से उसका चेहरा लाल हो उठा।

       दूसरे दिन भोलानंद गिरि ने एक आदमी को भेजकर कहलाया कि यदि दीपावली तक शोभा रुपया वापस नहीं करती तो वह पाखी को जबरदस्ती ले जायेगा। शोभा और पाखी दोनों परेशान हो उठीं इस बात को जानकर। भोलानंद गिरी का पूरे क्षेत्र पर प्रभाव था। लोग उससे डरते भी थे। इसीलिये माँ और बेटी उसका विरोध भी नहीं

कर सकतीं थीं।

  अब मेरे सामने दूसरा दृश्य था। देखा–वह पहाड़ी नदी लगभग एक मील आगे जाकर बांई ओर मुड़ गयी थी। उस स्थान पर एक विशाल मठ था जिसके एक ओर मीलों तक फैला मैदान था और दूसरी ओर था पहाड़ियों से घिरा हुआ जंगल जिसकी छाती को चीरती हुई नदी की प्रखर धारा आगे बढ़ गयी थी।

       मैंने देखा–मठ काफी पुराना था। उसके भीतर कई बड़े-बड़े कमरे थे। एक कमरे में प्रकाश हो रहा था। कमरा काफी लम्बा चौड़ा था। एक ओर काली की आदम कद मूर्ति थी। मूर्ति के सामने बड़ा- सा हवन-कुण्ड था जिसमें से धुंआ निकलकर  कमरे के रहस्यमय वातावरण में छाता जा रहा था। एक ओर पंचमुखी दीपाधार में दीपक जल रहा था जिसके निकट एक चांदी की थाली में पूजन की सामग्री रखी हुई थी। नारियल और जवा-पुष्प भी रखे थे वहां।

       कमरे के दूसरी ओर एक बड़ा-सा पलंग था जिस पर गद्दा, तकिया लगा हुआ था और रेशमी चादर बिछी हुई थी। तरह-तरह के सुगन्धित फूलों से सजा हुआ था वह पलंग। तभी मेरी नजर एक भीमकाय व्यक्ति पर पड़ी। काफी मोटा-ताजा था वह। उसका पेट बाहर को निकला हुआ था।

       उसकी वेशभूषा तांत्रिक सन्यासी जैसी थी। दाड़ी-मूंछ और सिर के बाल सफाचट थे। उम्र यही रही होगी करीब 50 साल की। लेकिन देखने में इतनी उम्र का लगता नहीं था वह। ऑंखें लाल थीं। ऐसा लगता था कि उसने आकण्ठ मदिरा पी रखी हो।

       सन्यासी जैसा वह व्यक्ति बाहर टहल रहा था। उसका कोहडे जैसा सिर था और दोनों हाथ पीछे की ओर सटे हुए थे कमर पर। जब मैं उस भयंकर व्यक्ति की ओर देख रहा था, उसी समय फाटक की ओर से कुछ लोग आते दिखाई दिए। उन लोगों की वेशभूषा तांत्रिक सन्यासियों जैसी ही थी।

      दो-तीन व्यक्ति एक लड़की को कसकर पकड़े हुए थे। शेष लोग उनके पीछे चल रहे थे। उनके हाथों में लाठियां थीं। लड़की को तुरंत पहचान लिया मैंने। वह पाखी ही थी। उसका बुरा हाल था। कहीं कहीं से खून भी टपक रहा था। बाल खुलकर पीठ पर बिखरे हुए थे। बराबर चीख-चीख कर रोये जा रही थी पाखी। साथ ही उन राक्षसों के बन्धन से मुक्त होने की कोशिश भी कर रही थी वह।

       पाखी को देखकर वह भीमकाय व्यक्ति ‘हो-हो’ कर हंसने लगा। समझते देर न लगी। भोलानंद गिरि था वह। निश्चित ही उसने पाखी को जबरदस्ती पकड़वा कर मंगवाया था। उसके आदेश पर लोग उसको एक कमरे में ले गए। थोड़ी देर बाद जब पाखी कमरे से बाहर निकली तो देखकर दंग रह गया एकबारगी। आश्चर्य से मेरी ऑंखें खुली की खुली रह गयीं।

       अनिर्वचनीय आभा से ‘दप-दप’ कर रहा था उसका चेहरा। मुद्रा गम्भीर थी और एक प्रकार की विलक्षण शान्ति भी थी वहां। ऑंखें अधमुंदी-सी थीं उसकी। सुगठित युवा देह पर लाल रंग की रेशमी साड़ी थी। लेकिन शरीर का ऊपरी भाग अनावृत था। साड़ी का रेशमी आँचल यौवन के मधु-कलश की मर्यादा की रक्षा करने में असमर्थ था। दोनों कुच- कुम्भों को स्पर्श करती हुई माणिक और स्फटिक की मालाएं गले में झूल रहीं थीं।

       कलाइयों में लाल चूड़ियाँ थीं और शुभ्र् ललाट पर सिंदूर का गोल टीका भी था। धीरे- धीरे पग उठाती हुई पाखी मंदिर वाले कमरे की ओर बढ़ रही थी।

      हे भगवान ! वेशभूषा में, चाल-ढाल में, व्यवहार में और भाव में इतनी जल्दी कैसे परिवर्तन हो गया पाखी के भीतर ?–समझ में नहीं आया मेरे। बस अवाक् और भौंचक्का-सा देखता रह गया मैं पाखी की ओर। ऐसा लगता था–मानो पाखी के रूप में कोई देवकन्या स्वयं स्वर्ग से उतर आई हो।

मैंने देखा–भगवती महाकाली के सामने उस तांत्रिक ने पाखी के सभी अंगों की विधिवत् पूजा की। इस समय पाखी के शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं था। वह सर्वांग नग्न थी। पूजा के अन्त में तांत्रिक ने मदिरा से भरी हुई चांदी की कटोरी पाखी को दी।

     एक ही घूंट में सारी मदिरा पी गयी वह और दूसरे ही क्षण उसका चेहरा लाल हो उठा। अपूर्व आभा से चमक उठा उसका चेहरा और बिखर गए लावण्य के कण उसके मुख मण्डल पर।

       अपनी भैरवी को अपनी साधन पीठिका बना लिया था पाखी को भोलानंद गिरि ने। उसकी प्रतीक्षा की घडी अब समाप्त हो गयी थी। संकल्प साकार हो उठा था। आशा फलवती हो गयी थी उस तांत्रिक की। उसकी साधना, कामना और वासना की बलिवेदी पर पाखी का यौवन कुर्बान हो गया।

       एक अबोध सुंदरी किशोरी ने अपना आत्मसमर्पण कर दिया और भेंट चढ़ा दिया था अपनी सम्पूर्ण आशाओं और अभिलाषाओं को।

       रात का तीसरा प्रहर था। अनुष्ठान पूरा हो चुका था। मूर्ति के सामने जल रहे पंचमुखी दीप की ज्योति मन्द पड़ गयी थी। तांत्रिक भोलानंद गिरि अपनी भैरवी को लेकर मद्य-सम्भोग मुद्रा में लीन था उस समय।

      तभी दूर से मुझे गुरिजेश आता दिखाई पड़ा। उसके कन्धे पर बन्दूक लटक रही थी और हाथ में एक पोटली थी। शायद उसमें रुपया था। कमरे का दरवाजा भीतर से बन्द था।

      मगर ज़ोर का धक्का देकर उसने दरवाजा खोल दिया। चीखते हुए बोला–पाखी, मैं रुपया लेकर आ गया हूँ, बाहर निकलो।

       गिरिजेश की आवाज़ सुनकर पाखी तो बाहर नहीं निकली, हाँ, भोलानंद गिरि अवश्य आँख मलते हुए दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया।

       पाखी कहाँ है ?–दहाड़ते हुए गिरिजेश ने पूछा।

       पाखी यहीं है। मगर अब तुम उससे नहीं मिल सकते।

       क्यों ?–चीख पड़ा गिरिजेश।

       इसलिए कि पाखी पर अब मेरा अधिकार है। वह मेरी भैरवी बन चुकी है, देवी को साक्षी मान कर।

       ऐसा नहीं हो सकता।–यह कहकर गिरिजेश ने कमरे के भीतर घुसना चाहा मगर तभी चौड़े फाल का चमचमाता हुआ एक छुरा आकर पूरा उसकी पीठ में घुस गया। गिरकर ज़मीन पर तड़पने लगा गिरिजेश। दूसरे ही क्षण गिरिजेश के हाथ की पोटली खुल गयी और सारा रुपया बिखर गया चारों तरफ।

       _जिस समय यह लोमहर्षक घटना घटी, उसी समय मुझे एक झटका-सा लगा, और उसी के साथ मैं चीख पड़ा। मेरी आँख खुली तो देखा पाखी मेरे ऊपर झुकी हुई मुस्करा रही थी।_

       बिस्तर से उठकर बैठते हुए धीरे से बोला–यह सब मैंने क्या देखा, पाखी ?

       पाखी की मुस्कराहट उदासी में डूब गयी। बोली–आपने मेरे अतीत को जानना चाहा था न ?

       तो तुम्हारी इतनी दयनीय हालात क्यों हो गयी पाखी ?

       मेरे इस प्रश्न के उत्तर में पाखी ने सिसकते हुए जो कुछ बतलाया मुझे, उसे सुनकर जहाँ एक ओर उसकी अघोर तांत्रिक शक्ति का मुझे एहसास हुआ, वहीँ दूसरी ओर आत्मा भी द्रवित हो उठी मेरी। करुणा से भर गया मन मेरा।

      पूरे दस साल भैरवी के रूप में रही पाखी उस अघोरी तांत्रिक के साथ। उससे पाखी को तामसिक शक्ति की कई अलौकिक सिद्धियां प्राप्त हुईं। इसी बीच पाखी दो बच्चों की माँ भी बनी।

       मगर उन दोनों को अघोरी भोलानंद गिरि ने नहीं छोड़ा। बलि देकर दोनों बच्चों की आत्माओं को सिद्ध कर अपने अधिकार में कर लिया उसने। क्रोध, घृणा और क्षोभ से पागल हो गयी पाखी। कौन माँ अपने शिशुओं को अपने ही आँखों के सामने बलि होते हुए देख सकती है भला।

      साब ! ऐसी अलौकिक सिद्धि और तांत्रिक शक्ति से क्या फायदा जो मन और आत्मा की शान्ति ही छीन ले।–पाखी ने उदास स्वर में कहा–गिरिजेश को बहुत चाहती थी मैं। उससे आत्मा की गहराई से प्रेम करती थी। कभी-कभी आज भी उसकी याद में डूब जाती हूँ। उसने मेरे लिए अपनी जान भी दे दी। मगर मैं उसके लिए कुछ न कर सकी। मुझे उस राक्षस ने न पत्नी बनने दिया और न तो माँ ही। आप ही सोचिये साब ! ऐसी औरत की ज़िन्दगी क्या होगी ? सब-कुछ गंवाकर , सब कुछ लुटाकर अन्धकार में भटक रही हूँ मैं।

       भोलानंद गिरि का क्या हुआ ? कहाँ है वह ?–विषण्ण मन से पूछा मैंने।

       पाखी हंस पड़ी। विषाद में डूबी उसकी हंसी। बोली–होगा क्या ? जो होना चाहिए वही हुआ। दोनों बच्चों की सिद्ध आत्माओं ने अपनी बलि का प्रतिशोध ले लिया उस नराधम से। एक रात अपने कमरे में मरा हुआ पाया गया। बड़ी ही घृणित मृत्यु हुई थी उसकी। चेहरा विकृति हो गया था। आँखें बाहर को निकल आयीं थीं। सारा शरीर गलकर दुर्गन्धमय हो उठा था।

     मगर साब ! बदला लेने के बावजूद भी उन दोनों बच्चों की आत्माओं को मुक्ति नहीं मिली। वे बराबर मेरे साथ रहती हैं।

       ऐं..तुम्हारे साथ ?-आश्चर्य से बोला मैं।

       हाँ साब ! वे हमेशा हमारे साथ ही रहती हैं। अभी पाखी ने अपना वाक्य पूरा किया ही था कि मैंने देखा कि हल्के कोहरे की शक्ल में दो छायाएं उसके चारों ओर घूमने लगीं। वे बराबर चक्कर काट रही थीं। भय से सिहर उठा मैं।

       साब ! आप घबराइये नहीं, डरने की कोई बात नहीं है। ये दोनों बच्चों की छायाएं है। जब कभी मैं इनके सम्बन्ध में सोचती हूँ, उस समय ये बच्चे मेरे पास आ जाते हैं। कल कीमती शराब की बोतल ये ही दोनों लाये थे कलकत्ता से।

       ऐं..क्या कहती हो तुम ?

       हाँ साब! सच कह रही हूँ। इतना कहकर पाखी ने बच्चों को कुछ इशारा किया। कुछ ही क्षणों के बाद मैंने देखा– मेरे सामने कीमती शराब की बोतल,  टोकरी में भरे फल, मिठाइयां रखी हुई थीं। अवाक्, स्तब्ध रह गया मैं।

       एक प्रकार से कहानी यहीं समाप्त हो जाती है। एक एक कर सारी घटनाएं  मेरे मानस पटल पर उभर कर चली गयीं। मैं सब कुछ भूल चुका था। O5 वर्ष के लम्बे अरसे के बाद यदि पाखी हाबड़ा स्टेशन पर नहीं मिलती तो शायद इस कहानी को लिपिबद्ध भी नहीं कर पाता मैं। O5 साल बाद हम दोबारा मिले थे। अब कब मिलेंगे ? कोई नहीं कह सकता।

 ट्रेन से उतरते समय पाखी बोली–आपने मेरे प्रति जो उपकार किया था उसे मैं कभी नहीं भूल सकूंगी। क्या दूँ उन उपकारों के बदले ? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।

    मैंने देखा–पाखी के आँखों में आंसू छलक आये थे। प्रणाम की मुद्रा में उसके दोनों हाथ जुड़े हुए थे। चार पांच महोनों के बाद उसका लद्दाख से पत्र आया। वह बनारस आना चाहती थी। अपने दोनों बच्चों की आत्मा को प्रेतयोनि से मुक्ति दिलाने के लिए। 

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