शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी आज पूर्णरूप से व्यंग्यकार की भूमिका प्रकट हुए।
मिलते ही सहज बोल पड़े,देखो हनुमानजी का स्मरण भारत में हो रहा है। और श्रीलंका में क्या हो रहा है? वहाँ तो बहुत ही भयावह स्थिति बन गई है। श्रीलंका के वातावरण में पंचतत्वों में अन्य चार तत्वों की तुलना में अग्नि तत्व ज्यादा सक्रिय हो गया है।
भारत का दुर्भाग्य ही है, भारत को ऐसे पड़ौसी देश मिले हैं। एक देश का नाम ही पाक है, उसके सारे कर्म नापाक हैं। मैने कहा यहाँ कर्म शब्द का प्रयोग उचित नहीं है। कर्म की जगह हरतक लिखना ठीक रहेगा।
सीतारामजी आज बहुत व्यथित हैं।
मैने अपनी अल्प बुद्धि से कहा, यह जो कुछ हो रहा है, वह इस कहावत को चरितार्थ कर रहा है,जैसी करनी वैसी भरनी।
एक उपदेशक रचना का स्मरण हुआ।
यहाँ नेकी बदी दो रास्ते हैं, गौर से सुन ले
तुझे जाना है जिस मज्जिल पे
अपना रास्ता चुन ले
कदम उठने से पहले
सोच ले अंजाम क्या होगा?
भलाई कर भला होगा,
बुराई कर बुरा होगा
कोई देखे न देखे,
पर खुदा तो देखता होगा
यह सुन सीतारामजी कहने लगे यह सब पुस्तकी ज्ञान है।
व्यवहार में सब उलटा पुलटा है।
इनदिनों अंजाम से कोई डरता नहीं है। बुरे कर्म करने वाले सभी आश्वश्त है कि जब सँया भए कोतवाल तो डर काहेका
उसी समय राधेश्यामजी का आगमन हुआ। राधयेशामजी ने सीतारामजी और मुझसे निवेदन किया,जल्दी मेरे घर चलो।
मेरा पोता कल से जिद कर रहा है।
मैने कहा बच्चा है। समझाओ समझ जाएगा।
राधेश्यामजी कहने लगे हरतरह से समझा दिया लेकिन मानता ही नहीं। आज तो उसने गजब ही कर दिया,कहता है, यदि खिलौना नहीं मिलेगा तो मै जोर जोर से हनुमान चालीसा पढ़ूंगा। कागज के गत्ते का भोंगा बना लिया है। और एक हाथ में हनुमान चालीसा पुस्तक पकड़कर सारे घर में घूम रहा है।
मैने कहा खिलौने की जिद कर रहा है तो दिला दो खिलौना।
राधयेशामजी ने कहा उसकी जिद भी बड़ी विचित्र है। वह कहता है मुझे रिमोट से चलने वाला खिलौना चाहिए।
खिलौना भी कोई ऐसा वैसा नहीं बुलडोजर वाला खिलौना ही चाहिए।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

